;

मत्स्यावतार की कथा /मत्स्य भगवान की कथा का पाठ करता एवं सुनता है वह स्वर्ग को जाता है

            ॐ गणपतये नमः ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मत्स्यावतार की कथा 

प्राचीन कालमें सत्यव्रत नामके एक राजा थे। वे बड़े ही उदार और भगवान के  परम भक्त थे। एक दिन वे कृतमाला नदीमें जलसे पितरोंका तर्पण कर रहे  थे उसी समय   उनकी अञ्जलिके जलमें  एक छोटी-सी मछली आ गयी। राजाने उसे जलमें फेंक देनेका | विचार किया। तब  मछलीने कहा-'महाराज! मुझे | जलमें न फेंको। यहाँ ग्राह आदि जल-जन्तुओंसे मुझे भय है।' यह सुनकर  सत्यव्रत ने उसे अपने  कलशके जलमें डाल दिया। मछली उसमें पड़ते ही बडी हो गई और पुनः  सत्यव्रत से  बोली 'राजन्! मुझे इससे बड़ा स्थान दो।' उसकी यह बात सुनकर राजाने उसे एक बड़े जलपात्र में डाल दिया। उसमें भी बडी  होकर  मछली राजासे  बोली -  मुझे कोई  विस्तृत स्थान दो।' तब उन्होंने पुन: उसे सरोवर के जल में डाला; किंतु वहाँ भी बढ़कर वह सरोवरके बराबर हो गया और बोला-'मुझे इससे बड़ा स्थान दो।' तब सत्यव्रत ने उसे फिर समुद्रमें ही ले जाकर डाल दिया। वहाँ वह मछली  क्षणभरमें एक लाख योजन बडी हो गई उस अद्भुत  मछली को देखकर  सत्यव्रतको बड़ा  आश्चर्य  हुआ। वे बोले'आप कौन हैं? निश्चय ही आप भगवान् श्रीविष्णु जान पड़ते हैं। नारायण! आपको नमस्कार है। जनार्दन! आप किसलिये अपनी मायासे मुझे मोहित कर रहे हैं?
 मत्स्यभगवान्ने अपने प्यारे भक्त सत्यव्रतसे कहा-'सत्यव्रत! आजसे सातवें दिन तीनों लोक प्रलयकालकी जलराशिमें डूबने लगेंगे। उस समय मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पास एक बहुत बड़ी नौका आयेगी। तुम सभी जीवों, पौधों और अन्नादिके बीजोंको लेकर सप्तर्षियोंके साथ उसपर बैठकर विचरण करना। जब तेज आँधी चलनेके कारण नाव डगमगाने लगेगी तब मैं इसी रूपमें आकर तुम लोगोंकी रक्षा करूँगा।' भगवान् राजासे इतना कहकर अन्तर्धान हो गये। तब  राजा सत्यव्रत उनके बताये हुए समयकी प्रतीक्षा करते हुए वहीं रहने लगे। जब नियत समयपर समुद्र अपनी सीमा लाँधकर बढ़ने लगा, तब वे पूर्वोक्त नौकापर बैठ गये। उसी समय एक | सींग धारण करनेवाले सुवर्णमय मत्स्यभगवान का | प्रादुर्भाव हुआ। उनका विशाल शरीर दस लाख योजन लंबा था। उनके सींगमें नाव बांधकर राजाने उनसे 'मत्स्य 'नामक पुराणका श्रवण किया, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। राजा सत्यव्रत मत्स्यकी नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा स्तुति भी करते थे। हयग्रीव नामका एक राक्षस था। वह ब्रह्माके मुखसे निकले हुए वेदोंको चराकर पातालमें छिपा हुआ था। भगवान् मत्स्यने हयग्रीवको मारकर वेदोंका भी उद्धार किया। समस्त जगतके परम कारण मत्स्यभगवान को  हम सब नमस्कार करते हैं।

        जो मत्स्य भगवान की कथा का पाठ करता एवं सुनता है वह स्वर्ग को जाता है 

Post a Comment

0 Comments