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श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ अर्थ सहित जाने श्री विष्णु के 1000 नामों को

                                         श्री राधे 

              श्री विष्णु सहस्रनाम अर्थ सहित

                   ॥ श्री गणेशाय नमः॥, ॥श्री सरस्वत्यै नमः ॥, ॥श्री गुरुभ्यो नमः ॥ 

                                                  'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय         

                                                                                                                                                                                                                         
श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ
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 ॐ वासुदेवः परं ब्रह्म । परमात्मा परात्परः ॥ 

1 -वासुदेवः-सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें बसानेवाले तथा समस्त भूतोंमें सर्वात्मारूपसे बसनेवाले, चतुर्म्यहमें वासुदेवस्वरूप,
2 -परं ब्रह्म- सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म-निर्गुण
3- परमात्मा-परम श्रेष्ठ, नित्य-शुद्धबुद्ध-मुक्तस्वभाव,
4-परात्परः-पर अर्थात् प्रकृतिसे भी परे विराजमान परमात्मा

पर धाम पर ज्योतिः परं तत्त्वं परं पदम् ।
परः शिवः परो ध्येयः परं ज्ञानं परा गतिः ॥ 

5 -परं धाम-सर्वोत्तम वैकुण्ठधाम, निर्गुण परमात्मा,
6 -परं ज्योतिः-सूर्य आदि ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाले सर्वोत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप,
7 -परं तत्त्वम्-परम तत्व, उपनिषदोंसे जाननेयोग्य सर्वोत्तम रहस्य,
8- परं पदम्-प्राप्त करनेयोग्य सर्वोत्कृष्ट पद, मोक्षस्वरूप,
9 -परः शिवः-परम कल्याणरूप,
10 -परो ध्येयः-ध्यान करनेयोग्य सर्वोत्तम देव, चिन्तनके सर्वश्रेष्ठ आश्रय,
11 -परं ज्ञानम्-भ्रान्तिशून्य उत्कृष्ट बोधस्वरूप परमात्मा,
12 -परा गतिः-सर्वोत्तम गति, मोक्षस्वरूप 

परमार्थः परश्रेष्ठः परानन्दः परोदयः ।
 परोऽव्यक्तात्परं व्योम परमर्द्धिः परेश्वरः ॥  

13- परमार्थ:-मोक्षरूप परम पुरुषार्थ, परम सत्य
14-परश्रेष्ठः- श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ
15-परानन्दः-परम आनन्दमय, असीम आनन्दकी निधि,
16- परोदयः-सर्वाधिक अभ्युदयशाली,
17- अव्यक्तात्परः-अव्यक्तपदवाच्य मूलप्रकृतिसे परे,
18- परं व्योम-नित्य एवं अनन्त आकाशस्वरूप निर्गुण परमात्मा,
19 -परमर्द्धि:-सर्वोत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न,
20- परेश्वरः-पर अर्थात् ब्रह्मादि देवताओंके भी ईश्वर

निरामयो निर्विकारो निर्विकल्पो निराश्रयः ।
 निरञ्जनो निरालम्बो निलेपो निरवग्रहः ॥

21- निरामयः-रोग-शोकसे रहित,
22- निर्विकारः-उत्पत्तिः, सत्ता, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और विनाश-इन छः विकारोंसे शून्य,
23- निर्विकल्प:-सन्देहरहित, संकल्पशून्य,
24- निराश्रयः-स्वयं ही सबके आश्रय होनेके कारण अन्य किसी आश्रयसे रहित,
25- निरञ्जन:-वासना और आसक्तिरूपी मलसे शून्य, तमोगुणरहित,
26- निरालम्ब:-आधारशून्य, स्वयं ही सबके आधार, 
27- निलेपः-जलसे कमलकी भाँति रागद्वेषादि दोषोंसे अलिप्त, 
28- निरवप्रहः-विनबाधाओंसे रहित 

 निर्गुणो निष्कलोचन्नोऽभयोऽचिन्योऽचलोऽञ्चितः ।
 अतीन्द्रियोऽमितोऽपारो नित्योऽनीहोऽव्ययोऽक्षयः ॥

29- निर्गुणः-सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंसे रहित परमात्मा, 
30- निष्कल:-अवयवशून्य ब्रह्म, 
31- अनन्तः-असीम एवं अविनाशी परमेश्वर,
32- अभयः-काल आदिके भयसे रहित, 
33 -अचिन्त्यः-मनको गतिसे परे होनेके कारण चिन्तनमें न आनेवाले, 
34 -अचल:-अपनी मर्यादासे विचलित न होनेवाले,
35 -अशितः-सबके द्वारा पूजित, 
36 -अतीन्द्रियः-इन्द्रियोंके अगोचर,
37- अमितःमाप या सीमासे रहित, महान्, अपरिच्छिन, 
38- अपारः-पाररहित, अनन्त, 
39- नित्यः-सदा रहनेवाले, सनातन, 
40- अनीहः-चेष्टारहित ब्रह्म,
41- अव्ययः-- विनाशरहित, 
42 -अक्षयः-कभी क्षीण न होनेवाले

सर्वज्ञः सर्वगः सर्वः सर्वदः सर्वभावनः।
सर्वशास्ता सर्वसाक्षी पूज्यः सर्वस्य सर्वदृक ॥

43 -सर्वज्ञः-परोक्ष और अपरोक्ष सबके ज्ञाता,
44 -सर्वगः-कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले,
45 -सर्वः-सर्वस्वरूप,
46 -सर्वदः-भक्तोंको सर्वस्व देनेवाले,
47 -सर्वभावनः-सबको उत्पन्न करनेवाले,
48 -सर्वशास्ता-सबके शासक,
49 -सर्वसाक्षीभूत, भविष्य और वर्तमान-सबपर दृष्टि रखनेवाले,
50 -सर्वस्य पूज्यः-सबके पूजनीय,
51 -सर्वदृक -सबके द्रष्टा 

सर्वशक्तिः सर्वसारः सर्वात्मा सर्वतोमुखः।
सर्ववासः सर्वरूपः सर्वादिः सर्वदुःखहा ॥

52 -सर्वशक्ति:-सब प्रकारकी शक्तियोंसे  सम्पन्न,
53 -सर्वसार:-सबके बल,
54-सर्वात्मा-सबके आत्मा,
55 -सर्वतोमुखः-सव ओर मुखवाले, विराट्स्वरूप,
56 -सर्ववास:-सम्पूर्ण विश्वके वासस्थान,
57- सर्वरूपः-सब रूपोंमें स्वयं ही उपलब्ध होनेवाले, विश्वरूप,
58 -सर्वादिः-सबके आदि कारण,
59 -सर्वदुःखहा-सबके दुःखोंका नाश करनेवाले

 सर्वार्थः सर्वतोभद्रः सर्वकारणकारणम् ।
सर्वातिशयितः सर्वाध्यक्षः सर्वेश्वरेश्वरः ॥

60 -सर्वार्थ:-समस्त पुरुषार्थरूप,
61 -सर्वतोभद्रः-सब ओरसे कल्याणरूप,
62 -सर्वकारणकारणम्-विश्वके कारणभूत प्रकृति आदिके भी कारण,
63 -सर्वातिशयित:-सबसे सब बातोंमें बढ़े हुए. ब्रह्मा और शिव आदिसे भी अधिक महिमावाले,
64 -सर्वाध्यक्षः-सबके साक्षी, सबके नियन्ता,
65 -सर्वेश्वरेश्वरः-सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर, ब्रह्मादि देवताओंके भी नियामक

षड्विंशको महाविष्णुमहागुह्यः महाविभुः।
नित्योदितो नित्ययुक्तो नित्यानन्दः सनातनः ॥

66 -षड्विंशकः-पच्चीस' तत्त्वोंसे विलक्षण छब्बीसवाँ तत्त्व, पुरुषोत्तम,
67 -महाविष्णु:-सब देवताओंमें महान् सर्वव्यापी भगवान् विष्णु,
68 -महागुह्यः-परम गोपनीय तत्त्व,
69 -महाविभु:प्राकृत आकाश आदि व्यापक तत्त्वोंसे भी महान् एवं व्यापक,
70 -नित्योदित:-सूर्य आदिकी भांति अस्त न होकर नित्य-निरन्तर उदित रहनेवाले,
71 -नित्ययुक्त:-चराचर प्राणियोंसे नित्य संयुक्त अथवा सदा योगमें स्थित रहनेवाले,
72 -नित्यानन्दःनित्य आनन्दस्वरूप,
73 -सनातनः-सदा एकरस रहनेवाले
मायापतियोगपतिः कैवल्यपतिरात्मभूः।
जन्ममृत्युजरातीतः कालातीतो भवातिगः ॥

74 -मायापतिः-मायाके स्वामी,
75 -योगपति:-योगपालक, योगेश्वर,
76 -कैवल्यपतिःमोक्ष प्रदान करनेका अधिकार रखनेवाले, मुक्तिके स्वामी,
76 -आत्मभूः-स्वतः प्रकट होनेवाले, स्वयम्भू,
77 -जन्ममृत्युजरातीत:-जन्म, मरण और वृद्धावस्था आदि शरीरके धर्मोसे रहित,
79 -कालातीतः-कालके वशमें न आनेवाले,
80 -भवातिग:-भवबन्धनसे अतीत

पूर्णः सत्यः शुद्धबुद्धस्वरूपो नित्यचिन्मयः ।
 योगप्रियो योगगम्यो भवबन्धैकमोचकः ॥

81 -पूर्ण:-समस्त ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य और गुणोंसे परिपूर्ण,
82 -सत्यः-भूत, भविष्य और वर्तमान- तीनों कालोंमें सदा समानरूपसे रहनेवाले, सत्यस्वरूप,
83 -शुद्धबुद्धस्वरूपः-स्वाभाविक शुद्ध
और ज्ञानसे सम्पत्र, प्रकृतिके संसर्गसे रहित बोधस्वरूप परमात्मा,
84 -नित्यचिन्मयः-नित्य चैतन्यस्वरूप,
85 -योगप्रियः-चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप योगके प्रेमी,
86 -योगगम्यः-ध्यान अथवा समाधिके द्वारा अनुभवमें आनेयोग्य,
87 - भवबन्धैकमोचकःसंसार-वन्धनसे एकमात्र छुड़ानेवाले

पुराणपुरुषः प्रत्यक्चैतन्यः पुरुषोत्तमः ।
 वेदान्तवेद्यो दुर्जेयस्तापत्रयविवर्जितः ॥ 

88 -पुराणपुरुषः-ब्रह्मा आदि पुरुषोंकी अपेक्षा भी प्राचीन, आदि पुरुष, 
89 -प्रत्यक्कैतन्यःअन्तर्यामी चेतन, 
90-पुरुषोत्तमः-क्षर और अक्षर पुरुषोंसे श्रेष्ठ,
91 -वेदान्तवेद्यः-उपनिषदोंके द्वारा जाननेयोग्य, 
92 -दुज्ञेयः-कठिनतासे अनुभवमें आनेवाले,
93 -तापत्रयविवर्जितः-आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों तापोंसे रहित 

ब्रह्मविद्याश्रयोऽनघः स्वप्रकाशः स्वयम्प्रभुः ।
 सर्वोपाय उदासीनः प्रणवः सर्वतः समः ॥ 

94 -ब्रह्मविद्याश्रयः-ब्रह्मविद्याके आश्रय, उसके द्वारा जाननेमे आनेवाले ब्रह्म, 
95 -अनघ:पापरहित, शुद्ध, 
96 -स्वप्रकाश:-अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले, 
97 -स्वयम्प्रभुः-दूसरेकी सामर्थ्यकी अपेक्षासे रहित, स्वयं समर्थ, 
98 -सर्वोपायः-सर्वसाधनरूप, 
99 -उदासीन:रागद्वेषसे ऊपर उठे हुए, पक्षपातरहित, 
100 -प्रणवः-ओंकाररूप शब्दब्रह्म, 
101 -सर्वतः समः-सब ओर समान दृष्टि रखनेवाले 

 सर्वानवद्यो दुष्प्राप्यस्तुरीयस्तमसः परः। 
कूटस्थः सर्वसंश्लिष्टो वाङ्मनोगोचरातिगः ॥ 

102 -सर्वानवद्यः-सबको प्रशंसाके पात्र, सबके द्वारा स्तुल्य, 
103 -दुष्पाप्यः-अनन्य चित्तसे भजन न करनेवालोंके लिये दुर्लभ, 
104 -तुरीयःजाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति- इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत चतुर्थावस्थास्वरूप, 
105 -तमसः परःतमोगुण एवं अज्ञानसे परे, 
106 -कूटस्थ:-निहाईकी भाँति अविचलरूपसे स्थिर रहनेवाला निर्विकार आत्मा, 
109 -सर्वसंश्लिष्टः-सर्वत्र व्यापक होनेके कारण सबसे संयुक्त, 
108 -वाङ्मनोगोचरातिग:-वाणी और मनकी पहुँचसे वाहर 

संकर्षणः सर्वहरः कालः सर्वभयंकरः । 
अनुल्लयश्चित्रगतिर्महारूद्रो दुरासदः ॥ 

109 -संकर्षण:-कालरूपसे सबको अपनी । ओर खींचनेवाले, चतुर्दूहमें सङ्कर्षणरूप, शेषावतार बलराम, 
110 -सर्वहरः-प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले.
111 -काल:-युग, वर्ष, मास, पक्ष आदि रूपसे सम्पूर्ण विश्वको अपना ग्रास बनानेवाले, कालपदवाच्य यमराज, 
112 -सर्वभयंकर:-मृत्युरूपसे सबको भय पहुँचानेवाले, 
113 -अनुल्लद्ध्यःकाल आदि भी जिनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकते, ऐसे सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर, 
114 -चित्रगतिः-विचित्र लीलाएँ करनेवाले लोलापुरुषोत्तम अथवा विचित्र गतिसे चलनेवाले, 
115 -महारुद्रःमहान् दुःखोंको दूर भगानेवाले, ग्यारह रुद्रोकी अपेक्षा भी महान् महेश्वररूप, 
116 -दुरासदः-बड़े-बड़े दानवोंके लिये भी जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे - दुर्धर्ष वीर 

मूलप्रकृतिरानन्दः प्रद्युम्नो विश्वमोहनः ।
महामायो विश्ववीज परशक्तिः सुखैकभूः ॥

117 -मूलप्रकृतिः-सम्पूर्ण विश्वके महाकारणस्वरूप,
118 -आनन्दः-सब ओरसे सुख प्रदान करनेवाले, आनन्दस्वरूप,
119 -प्रद्युम्नः-महान् बलवाले कामदेव, चतुर्दूहमें प्रद्युम्नस्वरूप,
120 -विश्वमोहन:-अपने अलौकिक रूपलावण्यसे सम्पूर्ण विश्वको मोहित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण,
121-महामायः-मायावियोंपर भी माया डालनेवाले महान् मायावी,
122 -विश्वबीजम्-जगत्की उत्पत्तिके आदि कारण,
123 -परशक्तिः-महान् सामर्थ्यशाली,
124 -सुखैकभूः-सुखके एकमात्र उत्पत्तिस्थान

सर्वकाम्योऽनन्तलीलः सर्वभूतवशंकरः ।
 अनिरुद्धः सर्वजीवो हृषीकेशो मनःपतिः ॥

125सर्वकाम्यः-सबकी कामनाके विषय,
126 अनन्तलील:-जिनकी लीलाओका अन्त नहीं है-ऐसे भगवान,
127 सर्वभूतवशंकरः-सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने वशमें करनेवाले,
128अनिरुद्धःसंग्राममें जिनकी गतिको कोई रोक नहीं सकता-ऐसे पराक्रमी, शूरवीर, चतुर्दूहमें अनिरुद्धस्वरूप,
129 सर्वजीवः-सबको जीवन प्रदान करनेवाले, सबके आत्मा,
130 हषीकेश:-इन्द्रियोंके स्वामी,
131 मनःपतिः-मनके स्वामी, हृदयेश्वर

 निरुपाधिप्रियो हंसोऽक्षरः सर्वनियोजकः।
 ब्रह्मप्राणेश्वरः सर्वभूतभृद् देहनायकः ॥

132 निरूपाधिप्रियः-जिनकी बुद्धिसे उपाधिकृत भेदभ्रम दूर हो गये है, उन ज्ञानी परमहंसोके भी प्रियतम,
133 हंसः-हसरूप धारण करके सनकादिकोंको उपदेश करनेवाले,
134 अक्षरःकभी नष्ट न होनेवाले, आत्मा,
135सर्वनियोजक:सबको विभिन्न कर्मोंमें लगानेवाले, सबके प्रेरक, सबके स्वामी,
136 ब्रह्मप्राणेश्वर:-ब्रह्माजीके प्राणोंके स्वामी,
137 सर्वभूतभृत्-सम्पूर्ण भूतोंका भरणपोषण करनेवाले,
138देहनायक:- शरीरका  सञ्चालन करनेवाले

क्षेत्रज्ञः प्रकृतिस्वामी पुरुषो विश्वसूत्रधक।
अन्तर्यामी  त्रिधामान्तःसाक्षी निर्गुण ईश्वरः ॥

139 -क्षेत्रज्ञः-सम्पूर्ण क्षेत्रों (शरीरों) में स्थित होकर उनका ज्ञान रखनेवाले,
140 -प्रकृतिस्वामीजगत्की कारणभूता प्रकृतिके स्वामी,
141 -पुरुषःसमस्त शरीरोंमें शयन करनेवाले अन्तर्यामी,
142 -विश्वसूत्रक-संसाररूपी नाटकके सूत्रधार,
143-अन्तर्यामी-अन्तःकरणमें विराजमान परमेश्वर,
144 -त्रिधामा-भू:-भुवः स्वःरूप तीन धामवाले, त्रिलोकीमें व्याप्त,
145 -अन्तःसाक्षी-अन्तःकरणके द्रष्टा,
146 -निर्गुण:-गुणातीत,
147 -ईश्वरः-सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न

योगिगम्यः पद्मनाभः शेषशायी श्रियः पतिः।
 श्रीशिवोपास्यपादाब्जो नित्यश्रीः श्रीनिकेतनः ॥

148 -योगिगम्यः-योगियोंके अनुभवमें आनेवाले,
149 -पद्मनाभः-अपनी नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले,
150 -शेषशायी-शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले,
151-श्रियःपतिःलक्ष्मीके स्वामी,
152-श्रीशिवोपास्यपादाब्ज:पार्वतीसहित भगवान् शिव जिनके चरणकमलोकी उपासना करते हैं, वे भगवान् विष्णु,
153 -नित्यश्री:कभी विलग न होनेवाली लक्ष्मीकी शोभासे युक्त,
154-श्रीनिकेतन:-भगवती लक्ष्मीके हृदय-मन्दिरमें निवास करनेवाले

नित्यवक्षःस्थलस्थश्रीः श्रीनिधिः श्रीधरोहरिः।
वश्यश्रीनिश्चलश्रीदो विष्णुः क्षीराब्धिमन्दिरः ॥

155 -नित्यवक्षःस्थलस्थश्री:-जिनके वक्षःस्थलमें लक्ष्मी सदा निवास करती हैं ऐसे भगवान् विष्णु,
156 -श्रीनिधिः-शोभाके भण्डार, सब प्रकारको सम्पत्तियोके आधार,
157-श्रीधरःजगजननी श्रीको हृदयमें धारण करनेवाले,
158-हरिः-पापहारी, भक्तोका मन हर लेनेवाले-
159- वश्यश्रीः-लक्ष्मीको सदा अपने वशमें रखनेवाले,
 160 -निश्चलश्रीदः-स्थिर सम्पत्ति प्रदान करनेवाले,
161 -विष्णु:-सर्वत्र व्यापक,
162- क्षीराब्धिमन्दिर:-क्षीरसागरको अपना निवासस्थान बनानेवाले

कौस्तुभोद्भासितोरस्को माधवो जगदार्तिहा ।
 श्रीवत्सवक्षा निःसीमकल्याणगुणभाजनम् ॥

163 -कौस्तुभोद्धासितोरस्कः-कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्भासित हृदयवाले,
164-माधवःजगन्माता लक्ष्मीके स्वामी अथवा मधुवंशमें प्रादुर्भूत भगवान् श्रीकृष्ण,
165-जगदार्तिहा-समस्त संसारकी पीडा दूर करनेवाले,
166 -श्रीवत्सवक्षा:वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न धारण करनेवाले,
167 -निःसीपकल्याणगुणभाजनम्-सीमारहित कल्याणमय गुणोंके आधार

पीताम्बरी जगन्नाथो जगत्राता जगत्पिता।
 जगन्धुर्जगत्स्रष्टा जगद्धाता जगन्निधिः ॥

168 -पीताम्बरः-पीत वस्त्रधारी,
169 -जगन्नाथ:-जगत्के स्वामी,
170- जगत्त्रातासम्पूर्ण विश्वके रक्षक,
171 -जगत्पिता-समस्त संसारके जन्मदाता,
172-जगबन्धुः-बन्धुकी भांति जगत्के जीवोंकी सहायता करनेवाले,
173- जगत्स्त्रष्टा-जगत्को सृष्टि करनेवाले ब्रह्मारूप,
174- जगद्धाता-अखिल विश्वका धारण-पोषण करनेवाले विष्णुरूप,
175-जगन्निधिः-प्रलयके समय सम्पूर्ण जगत्को बीजरूपमें धारण करनेवाले

जगदेकस्फुरद्वीयों नाहवादी जगन्मयः ।
सर्वाश्चर्यमयः सर्वसिद्धार्थः सर्वरञ्जितः ।।

176-जगदेकस्फुरदीर्यः-संसारमें एकमात्र विख्यात पराक्रमी
177- नाहंवादी-अहङ्काररहित,
178- जगन्मयः-विश्वरूप,
179- सर्वाश्चर्यपयःजिनका सब कुछ आश्चर्यमय है-ऐसे अथवा सम्पूर्ण आश्चर्योंसे युक्त,
180 -सर्वसिद्धार्थ:-पूर्णकाम होनेके कारण जिनके सभी प्रयोजन सदा सिद्ध है-ऐसे परमेश्वर,
181 -सर्वरञ्जितः-देवता, दानव और मानव आदि सभी प्राणी जिन्हें रिझानेको चेष्टामें लगे रहते हैं--ऐसे भगवान् 

सर्वामोधोद्यमो ब्रह्मरुद्रायुत्कृष्टचेतनः ।
 शम्भोः पितामहो ब्रह्मपिता शक्राद्यधीश्वरः ॥

182- सर्वामोधोद्यमः-जिनके सम्पूर्ण उद्योग सफल होते हैं, कभी व्यर्थ नहीं जाते-ऐसे भगवान् विष्णु,
183-ब्रह्मरूद्राद्युत्कृष्टचेतन:-ब्रह्मा और रुद्र आदिसे उत्कृष्ट चेतनावाले,
184- शम्भोः पितामहःशङ्करजीके पिता भगवान् ब्रह्माको भी जन्म देनेवाले श्रीविष्णु,
186- शक्राद्यधीश्वरः-इन्द्र आदि देवताओंके स्वामी

सर्वदेवप्रियः सर्वदेवमूर्तिरनुत्तमः ।
सर्वदेवैकशरणं सर्वदेवैकदेवता ।।

187-सर्वदेवप्रियः-सम्पूर्ण देवताओंके प्रिय,
188 -सर्वदेवमूर्ति:-समस्त देवस्वरूप,
189- अनुत्तमः-जिनसे उत्तम दूसरा कोई नहीं है, सर्वश्रेष्ठ,
190- सर्वदेवैकशरणम्-समस्त देवताओंके एकमात्र आश्रय,
191-सर्वदेवैकदेवता-सम्पूर्ण देवताओंके एकमात्र आराध्य देव

यज्ञभुग्यज्ञफलदो यज्ञेशो यज्ञभावनः । 
यज्ञत्राता यज्ञपुमान्वनमाली द्विजप्रियः ॥

192-यज्ञभुक्-समस्त यज्ञोंके भोक्ता, 
193- यज्ञफलदः-सम्पूर्ण यज्ञोका फल देनेवाले, 
194 -यज्ञेशः-यज्ञोंके स्वामी, 
195- यज्ञभावनः-अपनी वेदमयी वाणीके द्वारा यज्ञोंको प्रकट करनेवाले,
196 -यज्ञत्राता-यज्ञविरोधी असुरोंका वध करके यज्ञोंकी रक्षा करनेवाले,
197- यज्ञपुमान्-यज्ञपुरुष, यज्ञाधिष्ठाता देवता, 
198- वनमाली-परम मनोहर वनमाला धारण करनेवाले, 
199-द्विजप्रियःब्राह्मणोंके प्रेमी और प्रियतम 

 द्विजैकमानदो विप्रकुलदेवोऽसुरान्तकः । 
 सर्वदुष्टान्तकृत्सर्वसजनानन्यपालकः ॥ 

200-द्विजैकमानदः-ब्राह्मणोंको एकमात्र  सम्मान देनेवाले, 
201-विप्रकुलदेवः - ब्राह्मण- वंशको अपना आराध्यदेव माननेवाले, 
202-असुरान्तकः-संसारमें अशान्ति फैलानेवाले असुरोंके प्राणहन्ता,
203 -सर्वदुष्टान्तकृत्-समस्त दुष्टोंका अन्त करनेवाले, 
204- सर्वसज्जनानन्यपालकःसम्पूर्ण साधु पुरुषोके एकमात्र पालक

सप्तलोकैकजठरः सप्तलोकैकमण्डनः । 
सृष्टिस्थित्यन्तकृचक्री  शार्ङ्गभन्वा गदाधरः ॥ 

205- सप्तलोकैकजठर:-भूलोक, भुवलोक, स्वलोक, महलोंक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक-इन सातों लोकोंको अपने एकमात्र उदरमें स्थापित करनेवाले, 
206- सप्तलोकैकमण्डन:सातो लोकोंके एकमात्र शृङ्गार-अपनी ही शोभासे समस्त लोकोंको विभूषित करनेवाले, 
207- सृष्टिस्थित्यन्तकृत्-संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले,
208- चक्री-सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले, 
209- शार्ङ्गधन्वा-  शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले, 
210 -गदाधरः-कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले 


शङ्खभृनन्दकी , पद्यपाणिर्गरुड़वाहनः । 
अनिर्देश्यवपुः सर्वपूज्यत्रैलोक्यपावन  ॥ 

211 -शङ्खभृत्-एक हाथमें पाञ्चजन्य नामक शङ्ख लिये रहनेवाले, 
212- नन्दकी-नन्दक नामक खड्ग (तलवार) बाँधनेवाले, 
213-पद्यपाणि:हाथमें कमल धारण करनेवाले, 
214- गरुडवाहन:पक्षियोंके राजा विनतानन्दन गरुड़पर सवारी करनेवाले, 
215 -अनिर्देश्यवपुः-जिसके दिव्यस्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन या संकेत न किया जा सके-ऐसे अनिर्वचनीय शरीरवाले,
216 -सर्वपूज्यः-देवता, दानव और मनुष्य आदि-सबके पूजनीय,
217- त्रैलोक्यपावन:-अपने दर्शन और स्पर्श आदिसे त्रिभुवनको पावन बनानेवाले   

अनन्तकीर्तिनिःसीमपौरुषः सर्वमङ्गलः। 
सूर्यकोटिप्रतीकाशो यमकोटिदुरासदः ।। 

218. -अनन्तकीर्तिः-शेष और शारदा भी जिनकी कीर्तिका पार न पा सके-ऐसे अपार सुयशवाले,
219- निःसीमपौरुषः-असीम पुरुषार्थवाले,अमितपराक्रमी, 
220- सर्वमङ्गल:-सबका मङ्गल करनेवाले अथवा सबके लिये मङ्गलरूप,
221- सूर्यकोटिप्रतीकाशः-करोड़ों सूर्योक समान तेजस्वी,
222- यमकोटिदुरासदः-करोड़ों यमराजोंके लिये भी दुर्धर्ष

कन्दर्पकोटिलावण्यो दुर्गाकोट्यरिमर्दनः।
समुद्रकोटिगम्भीरस्तीर्थकोटिसमाह्वयः ॥

223-कन्दर्पकोटिलावण्यः-करोड़ों कामदेवोंके समान मनोहर कान्तिवाले, 
224-दुर्गाकोट्यरिमर्दनः-करोड़ों दुर्गाओंके समान शत्रुओको रौंद डालनेवाले,
225- समुद्रकोटिगम्भीर:-करोड़ों समुद्रोंके समान गम्भीर, 
226 -तीर्थकोटिसमाह्वयः -करोड़ों तीर्थोके समान पावन नामवाले 

ब्रह्मकोटिजगत्स्रष्टा वायुकोटिमहाबलः ।
 कोटीन्दुजगदानन्दी शम्भुकोटिमहेश्वरः ॥

227-ब्रह्मकोटिजगत्स्रष्टा-करोड़ों ब्रह्माओंके समान संसारकी सृष्टि करनेवाले, 
228- वायुकोटिमहाबल:-करोड़ो वायुओंके तुल्य महाबली,
229 -कोटीन्दुजगदानन्दी-करोड़ो चन्द्रमाओंकी भांति जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले,
230- शम्भुकोटिमहेश्वरः-करोड़ों शङ्करोंके समान महेश्वर (महान् ऐश्वर्यशाली) 

कुबेरकोटिलक्ष्मीवाशक्रकोटिविलासवान्। 
हिमवत्कोटिनिष्कम्पः कोटिब्रह्माण्डविग्रहः ॥ 

231- कुबेरकोटिलक्ष्मीवान-करोड़ों कुबेरोंके समान सम्पत्तिशाली,
232-शक्रकोटिविलासवान्करोड़ों इन्द्रोंके सदृश भोग-विलासके साधनोंसे परिपूर्ण, 
233 हिमवत्कोटिनिष्कम्पः-करोड़ों हिमालयोंकी भाँति अचल, 
234- कोटिब्रह्माण्डविग्रहः-अपने श्रीविग्रहमें कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेवाले, महाविराटप

कोट्यश्वमेधपापघ्नः  यज्ञकोटिसमार्चनः ।
 सुभाकोटिस्वास्थ्यहेतुः कामधुकोटिकामदः ॥ 

235-कोट्यश्वमेधपापघ्नः-करोड़ों अश्वमेघ यज्ञोंके समान पापनाशक,  
236- यज्ञकोटिसमार्चनः-करोड़ों यज्ञोंके तुल्य पूजन-सामग्रीसे पूजित होनेवाले, 
237- सुधाकोटिस्वास्थ्यहेतुःकोटि-कोटि अमृतके तुल्य स्वास्थ्य-रक्षाके साधन, 
238-कामधुकोटिकामदः-करोड़ों कामधेनुओंके समान मनोरथ पूर्ण करनेवाले

ब्रह्मविद्याकोटिरूपः शिपिविष्टः शुचिश्रवाः ।
विश्वम्भरस्तीर्थपादः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥

239- ब्रह्मविद्याकोटिरूप:-करोड़ों ब्रह्मविद्याओंके तुल्य ज्ञानस्वरूप, 
240- शिपिविष्टःसूर्य-किरणोंमें स्थित रहनेवाले, 
241 -शुचिश्रवाःपवित्र यशवाले,
242- विश्वम्भर:-सम्पूर्ण विश्वका भरण-पोषण करनेवाले, 
243 -तीर्थपादः-तीर्थोकी भाँति पवित्र चरणोंवाले, अथवा अपने चरणोंमें ही समस्त तीर्थोको धारण करनेवाले, 
244- पुण्यश्रवणकीर्तन:-जिनके नाम, गुण, महिमा तथा स्वरूप आदिका श्रवण और कीर्तन परम पवित्र एवं पावन है-ऐसे भगवान्

आदिदेवो जगजैत्रो मुकुन्दः कालनेमिहा। 
वैकुण्ठोऽनन्तमाहात्म्यो महायोगेश्वरोत्सवः ॥ 

245 -आदिदेव:-आदि देवता, सबके आदि कारण एवं प्रकाशमान, 
246 -जगजैत्र:विश्वविजयी, 
247 -मुकुन्दः-मोक्षदाता,
248 -कालनेमिहा-कालनेमि नामक दैत्यका वध करनेवाले, 
249 -वैकुण्ठः-परमधामस्वरूप,
250 -अनन्तमाहात्म्यः-जिनकी महिमाका अन्त नहीं हैऐसे महामहिम परमेश्वर, 
251 -महायोगेश्वरोत्सवःबड़े-बड़े योगेश्वरोंके लिये जिनका दर्शन उत्सवरूप है-ऐसे भगवान् 

 नित्यतृप्तो लसद्धावो निःशङ्को नरकात्तकः ।
दीनानाथैकशरणं - विश्वकव्यसनापहः ॥

252 -नित्यतृप्तः-अपने-आपमें ही सदा तृप्त रहनेवाले, 
253 -लसद्भावः-सुन्दर स्वभाववाले, 
254 -निःशङ्क:-अद्वितीय होनेके कारण भयशङ्कासे रहित, 
255 -नरकान्तकः-नरकके भयका नाश अथवा नरकासुरका वध करनेवाले, 
256 -दीनानाथैकशरणम्-दीनों और अनाथोंको एकमात्र शरण देनेवाले, 
257 -विश्वैकव्यसनापहः-संसारके एकमात्र संकट हरनेवाले 

 जगत्कृपाक्षमो नित्यं कृपालुः सज्जनाश्रयः। 
योगेश्वरः सदोदीणों वृद्धिक्षयविवर्जितः ॥

258 -जगत्कृपाक्षमः-सम्पूर्ण विश्वपर कृपा करनेमें समर्थ, 
259 -नित्यं कृपालुः-सदा स्वभावसे ही कृपा करनेवाले,
260 -सज्जनाश्रयः-सत्पुरुषोंके शरणदाता, 
261 -योगेश्वरः-सम्पूर्ण योगों तथा उनसे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंके स्वामी,
262 -सदोदीर्ण:-सदा अभ्युदयशील, नित्य उदार, सदा सबसे श्रेष्ठ,
263 -वृद्धिक्षयविवर्जितः-वृद्धि और हासरूप विकारसे रहित ॥

अधोक्षजो विश्वरेताः प्रजापतिशताधिपः ।   
 शक्रब्रह्मार्चितपदः शम्भुब्रह्मो ध्र्वधामगः  ।। 

264-अधोक्षजः-इन्द्रियोंके विषयोंसे ऊपर उठे हुए. अपने स्वरूपसे क्षीण न होनेवाले, 
265 -विश्वरेताः-सम्पूर्ण विश्व जिनके वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, वे परमेश्वर, 
266 -प्रजापतिशताधिपः-सैकड़ों प्रजापतियोंके स्वामी, 
267 -शक्रब्रह्मार्चितपदःइन्द्र और ब्रह्माजीके द्वारा पूजित चरणोंवाले.
 268 -शम्भुब्रह्मोवंधामगः-भगवान् शङ्कर और ब्रह्माजीके धामसे भी ऊपर विराजमान वैकुण्ठधाममें निवास करनेवाले 

 सूर्यसोमेक्षणो विश्वभोक्ता सर्वस्य पारगः । 
जगत्सेतुर्धर्मसेतुधरो विश्वधुरन्धरः ।। 

269 -सूर्यसोमेक्षण:-सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रवाले,
 270 -विश्वभोक्ता-विश्वका पालन करनेवाले, 
271 -सर्वस्य पारगः-सबसे परे विराजमान, 
272 -जगत्सेतुः-संसार-सागरसे पार होनेके लिये सेतुरूप, 
273-धर्मसेतुधरः- धर्ममर्यादाका पालन करनेवाले, 
274 -विश्वधुरन्धरःशेषनागके रूपसे समस्त विश्वका भार वहन करनेवाले 

  निर्ममोऽखिललोकेशो निःसङ्गोऽद्भुतभोगवान्।
 वश्यमायो वश्यविश्वो विश्वक्सेनः सुरोत्तमः ।।

275 -निर्ममः-आसक्तिमूलक ममतासे रहित,
276 -अखिललोकेशः-सम्पूर्ण लोकोंका शासन करनेवाले,
277 -निःसङ्गः-आसक्तिरहित,
278 -अद्भुतभोगवान्-आश्चर्यजनक भोगसामग्रीसे सम्पन्न,
279 -वश्यमायः-मायाको अपने वशमें रखनेवाले,
 280 -वश्यविश्वः-समस्त जगत्को अपने अधीन रखनेवाले,
281 -विपक्सेनः-युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही दैल्यसेनाको तितर-बितर कर डालनेवाले,
282-सुरोत्तमः-समस्त देवताओमे श्रेष्ठ

 सर्वश्रेयःपतिदिव्योऽनय॑भूषणभूषितः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यः । सर्वदैत्येन्द्रदर्पहा ॥

283 -सर्वश्रेयःपतिः-समस्त कल्याणोंके स्वामी,
284 -दिव्यः-लोकोत्तर सौन्दर्य-माधुर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न,
285 -अनर्थ्यभूषणभूषितःअमूल्य आभूषणोंसे विभूषित,
286 -सर्वलक्षणलक्षण्यः-समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त,
287 -सर्वदैत्येन्द्रदर्पहा-समस्त दैत्यपतियोंका दर्प दलन करनेवाले

समस्तदेवसर्वस्वं सर्वदैवतनायकः ।
समस्तदेवकवचं सर्वदेवशिरोमणिः ॥

288 -समस्तदेवसर्वस्वम्-सम्पूर्ण देवताओंके सर्वस्व,
289-सर्वदैवतनायकः- समस्त देवताओके नेता,
290 -समस्तदेवकवचम्-सब देवताओकी कवचके समान रक्षा करनेवाले,
291 -सर्वदेवशिरोमणिः-सम्पूर्ण देवताओंके शिरोमणि

  समस्तदेवतादुर्गः   प्रपन्नाशनिपञ्जरः ।
 समस्तभयन्नामा भगवान् विष्टरश्रवाः ॥

292 -समस्तदेवतादुर्ग:-मजबूत किलेके समान समस्त देवताओंकी रक्षा करनेवाले,
293 प्रपन्नाशनिपञ्जरः-शरणागतोंकी रक्षाके लिये वज्रमय पिजड़ेके समान,
294 -समस्तभयन्नामा -जिनका नाम सब प्रकारके भयोंको दूर करनेवाला है-ऐसे विष्णु,
295 -भगवान्-पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री,ज्ञान और वैराग्यसे सम्पन्न,
296 -विष्टरश्रवाःकुशाकी मुष्टिके समान कानोंवाले 

 विभुः सर्वहितोदों हतारिः स्वर्गतिप्रदः ।
सर्वदैवतजीवेशो - ब्राह्मणादिनियोजकः ॥

297 विभुः-सर्वत्र व्यापक, 
298 सर्वहितोदर्क:-सबके लिये हितकर भविष्यका निर्माण करनेवाले, 
299 हतारि:-जिनके शत्रु नष्ट हो चुके है, शत्रुहीन, 
300स्वर्गतिप्रदः-स्वर्गीयउच्चगति प्रदान करनेवाले, 
301सर्वदैवतजीवेशःसमस्त देवताओंके जीवनके स्वामी,
302 ब्राह्मणादिनियोजक:- ब्राह्मण आदि वर्गों को अपने-अपने धर्ममें नियुक्त करनेवाले 


ब्रह्मशम्भुपरार्धायुब्रह्मज्येष्ठः शिशुस्वराट् ।
 विराट् भक्तपराधीनः स्तुत्यः स्तोत्रार्थसाधकः ।।

303 -ब्रह्मशम्भुपरार्धायु:-ब्रह्मा और शिवकी अपेक्षा भी अनन्तगुनी आयुवाले,
304 -ब्रह्मज्येष्ठःब्रह्माजीसे भी ज्येष्ठ,
305 -शिशुस्वरा-बालमुकुन्दरूपसे शोभा पानेवाले,
306 -विराट्-विशेष शोभासम्पन्न, अखिल ब्रह्माण्डमय विराट् रूपधारी भगवान,
307 -भक्तपराधीनः-प्रेमविवश होकर भक्तोंके अधीन रहनेवाले,
308 -स्तुत्यः-स्तुति करने योग्य,
309-स्तोत्रार्थसाधकः-स्तोत्रमें कहे हुए अर्थको सिद्ध करनेवाले

 परार्थकर्ता कृत्यज्ञः स्वार्थकृत्यसदोज्झितः।
 सदानन्दः सदाभद्रः सदाशान्तः सदाशिवः ।।

310 -परार्थकर्ता-परोपकार करनेवाले,
311 -कृत्यज्ञ:-कर्तव्यका ज्ञान रखनेवाले,
312-स्वार्थकृत्यसदोज्झितः-स्वार्थसाधनके कार्योंसे सदा दूर रहनेवाले,
313 -सदानन्दः-सदा आनन्दमन, सत्पुरुषोको आनन्द प्रदान करनेवाले अथवा सत् एवं आनन्दस्वरूप,
314-सदाभद्रः-सर्वदा कल्याणरूप,
315 -सदाशान्तः--नित्य शान्त,..
316 -सदाशिव:-निरन्तर कल्याण करनेवाले 

सदाप्रियः सदातुष्टः सदापुष्टः सदार्चितः ।
सदापूतः पावनाप्रयो   वेदगुह्यो वृषाकपिः ।।

317 -सदाप्रियः-सर्वदा सबके प्रियतम,
318 -सदातुष्टः-निरन्तर संतुष्ट रहनेवाले,
319 -सदापुष्ट:-क्षुघा-पिपासा तथा आधि-व्याधिसे रहित होनेके कारण सदा पुष्ट शरीरवाले,
320-सदार्चित:भक्तोंद्वारा निरन्तर पूजित,
321 -सदापूतः-नित्य पवित्र,
322 -पावनाप्रयः- पवित्र करनेवालोंमें अग्रगण्य,
323 -वेदगुह्यः- वेदोंके गूढ़ रहस्य,
324 -वृषाकपिः-. वृष-धर्मको, अकम्पित (अविचल) रखनेवाले श्रीविष्णु


 सहस्त्रनामा - त्रियुगचतुर्मूर्तिश्चतुर्भुजः ।
भूतभव्यभवन्नाथो   ..... महापुरुषपूर्वजः ॥

325-सहस्त्रनामा-हजारों नामवाले,
326 -त्रियुगः सत्ययुग, त्रेता और द्वापर नामक त्रियुगस्वरूप,
327-चतुर्मूर्ति:-राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्ररूप चार मूर्तियोवाले,
328-चतुर्भुजः-चार भुजाओवाले,
329 -भूतभव्यभवन्नाथः-भूत, भविष्य और वर्तमान-सभी प्राणियोंके स्वामी,
330-महापुरुषपूर्वजः-महापुरुष ब्रह्मा आदिके भी पूर्वज


  • नारायणो मझुकेशः सर्वयोगविनिःसृतः ।
  • वेदसारो यज्ञसार: सामसारस्तपोनिधिः ॥


331-नारायणः-जलमें शयन करनेवाले,
332-मझुकेश:-मनोहर धुंघराले केशोवाले,
333 -सर्वयोगविनिःसृतः-नाना प्रकारके शास्त्रोक्त साधनोंसे जानने में आनेवाले, समस्त योग-साधनोंसे प्रकट होनेवाले,
334 -वेदसारः-वेदोंके सारभूत तत्त्व, ब्रह्म,
335-यज्ञसारः-यज्ञोंके सारतत्त्वयज्ञपुरुष विष्णु,
336 -सामसार:- सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा गाये जानेवाले सारभूत परमात्मा,
337 -तपोनिधिः-तपस्याके. भंडार नर-नारायणस्वरूप ॥

साध्यश्रेष्ठः पुराणर्षिनिष्ठा शान्तिः परायणम्।
शिवस्त्रिशूलविध्वंसी श्रीकण्ठैकवरप्रदः ॥

338-साध्यश्रेष्ठः-साध्य देवताओंमें श्रेष्ठ, साधनसे प्राप्त होनेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ,
339-पुराणर्षिः-पुरातन ऋषि नारायण,
340 -निष्ठासबकी स्थितिके आधार-अधिष्ठानस्वरूप,
341-शान्तिः-परम शान्तिस्वरूप,
342 -परायणम्परम प्राप्यस्थान,
343 -शिव:-कल्याणस्वरूप,
344 -त्रिशूलविध्वंसी-आध्यात्मिक आदि त्रिविध शूलोका नाश करनेवाले अथवा प्रलयकालमें महारुद्ररूप होकर त्रिशूलसे समस्त विश्वका विध्वंस करनेवाले,
345 -श्रीकण्ठैकवरप्रदः-भगवान् शङ्करके एकमात्र वरदाता

नरः कृष्णो हरिर्धर्मनन्दनो धर्मजीवनः । 
आदिकर्ता सर्वसत्यः  सर्वस्त्रीरत्नदर्पहा ॥

346 -नरः-बदरिकाश्रममें तपस्या करनेवाले ऋषिश्रेष्ठ नर, नरके अवतार अर्जुन, 
347.-कृष्ण:भक्तोंके मनको आकृष्ट करनेवाले देवकीनन्दन श्रीकृष्ण, सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा, 
348 -हरिः-गजेन्द्रकी पुकार सुनकर तत्काल प्रकट हो ग्राहके प्राणोंका अपहरण करनेवाले भगवान् श्रीहरि, 
349 -धर्मनन्दनः-धर्मके यहाँ पुत्ररूपसे अवतीर्ण होनेवाले भगवान् नारायण अथवा धर्मराज युधिष्ठिरको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण,
350 -धर्मजीवन:पापाचारी असुरोका मूलोच्छेद करके धर्मको जीवित रखनेवाले, 
351 -आदिकर्ता-जगत्के आदि कारण ब्रह्माजीको उत्पन्न करनेवाले, 
352-सर्वसत्यःपूर्णतः सत्यस्वरूप, 
353 -सर्वस्त्रीरत्नदर्पहा -जितेन्द्रिय होनेके कारण सम्पूर्ण सुन्दरी स्त्रियोंका अभिमान चूर्ण करनेवाले

त्रिकालजितकन्दर्प उर्वशीसामुनीश्वरः।                
 आद्यःकविहयग्रीवः सर्ववागीश्वरेश्वरः ॥     

354त्रिकालजितकन्दर्पः-भूत, भविष्य और वर्तमान-तीनों कालोंमें कामदेवको परास्त करनेवाले, 
355उर्वशीसक-उर्वशी अप्सराकी सृष्टि करनेवाले भगवान् नारायण, 
356 मुनीश्वरः-तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ नर-नारायणस्वरूप, 
357आद्यः-आदिपुरुष विष्णु, 
358 कवि:-त्रिकालदर्शी विद्वान, 
359 हयग्रीवः-हयग्रीव नामक अवतार धारण करनेवाले भगवान्, 
360 सर्ववागीश्वरेश्वरः- ब्रह्मा आदि समस्त वागीश्वरोंके भी ईश्वर 

 सर्वदेवमयो ब्रह्मगुरूर्वागीश्वरीपतिः।
 अनन्तविद्याप्रभवो मूलाविद्याविनाशकः ॥ 

361 -सर्वदेवमयः-सम्पूर्ण देवस्वरूप, 
362 -ब्रह्मगुरु:-ब्रह्माजीको वेदका उपदेश करनेवाले गुरु, 
363-वागीश्वरीपतिः-वाणीकी अधीश्वरी सरस्वती देवीके स्वामी, 
364 -अनन्तविद्याप्रभवः-असंख्य विद्याओंकी उत्पत्तिके हेतु, 
365 -मूलाविद्याविनाशकः- भव-बन्धनको हेतुभूत मूल अविद्याका विनाश करनेवाले 

  सर्वज्ञयदो नमज्जाङानाशको मधुसूदनः । 
अनेकमन्त्रकोटीशःशब्दब्रह्मैकपारगः ॥ 

366 -सार्वज्ञयदः-सर्वज्ञता प्रदान करनेवाले, 
367 -नमजाड्यनाशक:-प्रणाम करनेवाले भक्तोंकी जड़ताका नाश करनेवाले,
368 -मधुसूदनः- मधु नामक दैत्यका वध करनेवाले, 
369 -अनेकमन्त्रकोटीशः-अनेक करोड़ मन्त्रोंके स्वामी, 
370 -शब्दब्रह्मैकपारगः- शब्दब्रह्म (वेद-वेदाङ्गों) के एकमात्र पारङ्गत विद्वान् 

आदिविद्वान् वेदकर्ता वेदात्मा श्रुतिसागरः। 
ब्रह्मार्थवेदाहरणः सर्वविज्ञानजन्मभूः ॥

371 -आदिविद्वान्-सर्वप्रथम वेदका ज्ञान प्रकाशित करनेवाले, 
372 -वेदकर्ता-अपने निःश्वासके साथ वेदोंको प्रकट करनेवाले,
373 -वेदात्मा-वेदोंके सार तत्त्व-उनके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले सिद्धान्तभूत परमात्मा,
374 -श्रुतिसागरःवैदिक ज्ञानके समुद्र, 
375 -ब्रह्मार्थवेदाहरण:मत्स्यरूप धारण करके ब्रह्माजीके लिये वेदोंको ले आनेवाले,
376 -सर्वविज्ञानजन्मभूः-सब प्रकारके विज्ञानोंकी जन्मभूमि 

 विद्याराजो ज्ञानमूर्तिज्ञानसिन्धुरऽखण्डधीः ।
 मत्स्यदेवो महाभङ्गो जगद्वीजवहिनधक ॥

377 -विद्याराजः-समस्त विद्याओंके राजा, 
378-ज्ञानमूर्तिः-ज्ञानस्वरूप, 
379 -ज्ञानसिन्धुःज्ञानके सागर, 
380 -अखण्डधी:-संशय-विपर्यय आदिके द्वारा कभी खण्डित न होनेवाली बुद्धिसे युक्त,
381-मत्स्यदेवः-मत्स्यावतारधारी भगवान्,
382-महाभङ्गः-मत्स्य-शरीरमें ही महान् शृङ्ग धारण करनेवाले,
383 -जगद्वीजवहिनधक-संसारकी बीजभूत ओषधियोंके सहित नौकाको अपने सींगमे बांधकर धारण करनेवाले मत्स्य-भगवान्ली

 लीलाव्याप्ताखिलाम्भोधिऋग्वेदादिप्रवर्तकः ।
आदिकूर्मोऽखिलाधारस्तृणीकृतजगद्धरः ॥

384 -लीलाव्याप्ताखिलाम्भोधिः-अपने मत्स्य-शरीरसे लीलापूर्वक सम्पूर्ण समुद्रको आच्छादित कर लेनेवाले,
 385 -ऋग्वेदादिप्रवर्तकः-ऋग्वेद, यजुर्वेद आदिके प्रवर्तक
386-आदिकूर्मःसर्वप्रथम कच्छपरूपमें प्रकट होनेवाले भगवान,
387 -अखिलाधारः-अखिल ब्रह्माण्डके आधारभूत, 
388 -तृणीकृतजगद्धरः-समस्त जगत्के भारको तिनकेके समान समझनेवाले

अमरीकृतदेवौघः पीयूषोत्पत्तिकारणम् ।
 आत्माधारो धराधारो यज्ञाङ्गो धरणीधरः ।। 

389 -अमरीकृतदेवौघः-अमृत पिलाकर देवसमुदायको अमर बनानेवाले, 
390 -पीयूषोत्पत्तिकारणम्-क्षीरसागरसे अमृतके निकालनेमें प्रधान कारण,
391 -आत्माधारः-अन्य किसी आधारकी अपेक्षा न रखकर अपने ही आधारपर स्थित रहनेवाले,
392-धराधारः-पृथ्वीके आधार,
393 -यज्ञाङ्गः-यज्ञमय शरीरवाले भगवान् वराह, 
394 -धरणीधरः-अपनी दादोंपर पृथ्वीको धारण करनेवाले

 हिरण्याक्षहरः पृथ्वीपतिः श्राद्धादिकल्पकः ।
 समस्तपितृभीतिघ्रः समस्तपितृजीवनम् ॥

395 -हिरण्याक्षहर:-वराहरूपसे ही हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध करनेवाले,
396 -पृथ्वीपतिःउक्त अवतारमें ही पृथ्वीको पनीरूपमें ग्रहण करनेवाले, अथवा पृथ्वीके पालक,
396 -श्राद्धादिकल्पक:पितरोंके लिये श्राद्ध आदिकी व्यवस्था करनेवाले, 
397-समस्तपित्भीतिघ्नः-सम्पूर्ण पितरोंके भयका निवारण करनेवाले, 
399 -समस्तपितृजीवनम्-समस्त पितरोंके जीवनाधार

  हव्यकव्यकभुग्धव्यकव्यैकफलदायकः । 
रोमान्तीनजलधिः क्षोभिताशेषसागरः ॥ 

400 -हव्यकव्यैकभुक्-हव्य और कव्य (यज्ञ और श्राद्ध) के एकमात्र भोक्ता, 
401 -हव्यकव्यैकफलदायकः-यज्ञ और श्राद्धके एकमात्र फलदाता, 
402 -रोमान्तीनजलधिः- अपने रोमकूपोंमें समुद्रको लीन कर लेनेवाले महावराह, 
403 -क्षोभिताशेषसागरः-वराहरूपसे पृथ्वीकी खोज करते समय समस्त समुद्रको क्षुब्ध कर डालनेवाले 


  महावराहो यज्ञघ्नध्वंसको याज्ञिकाश्रयः ।
श्रीनृसिंहो दिव्यसिंहः सर्वानिष्टार्थदुःखहा ।।

404 -महावराहः-महान् वराहरूपधारी भगवान्, 
405 -यज्ञघ्नध्वंसकः-यज्ञमें विघ्न डालनेवाले असुरोके विनाशक,
406 -याज्ञिकाश्रयः- यज्ञ करनेवाले ऋत्विजोंके परम आश्रय, 
407 -श्रीनृसिंहःअपने भक्त प्रह्लादको बात सत्य करनेके लिये नृसिंहरूप धारण करनेवाले भगवान,
408 -दिव्यसिंहःअलौकिक सिंहकी आकृति धारण करनेवाले, 
409 -सर्वानिष्टार्थदुःखहा-सब प्रकारकी अनिष्ट वस्तुओं और दुःखोंका नाश करनेवाले 

 एकवीरोऽद्भुतबलोया यन्त्रमन्त्रैकभञ्जनः ।
 ब्रह्मादिदुः सहज्योतियुगान्ताग्न्यतिभीषणः ॥

410 -एकवीर:-अद्वितीय वीर,
411 -अद्भुतबल:-अद्भुत शक्तिशाली,
412 -यन्त्रमन्त्रैकभञ्जन:-शत्रुके यन्त्र-मन्त्रीको एकमात्र भंग करनेवाले, 
413 -ब्रह्मादिदुःसहज्योति:-जिनके श्रीविग्रहकी ज्योति ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुःसह है, ऐसे नृसिंह भगवान्,
414 -युगान्ताग्न्यतिभीषण:-प्रलयकालीन अग्निके समान अत्यन्त भयङ्कर 

कोटिवज्राधिकनखो जगदुष्पेक्ष्यमूर्तिक । 
 मातृचक्रप्रमथनो, महामातृगणेश्वरः ॥  


415 कोटिवज्राधिकनखः-करोड़ों वज्रोंसे भी अधिक तीक्ष्ण नखोवाले,
416 जगदुष्प्रेक्ष्यमूर्तिक-सम्पूर्ण जगत् जिसकी ओर कठिनतासे देख सके, ऐसी भयानक मूर्ति धारण करनेवाले,
417 मातृचक्रप्रमथनः-डाकिनी, शाकिनी, पूतना आदि मातृ-मण्डलको मथ डालनेवाले,
418 महामातगणेश्वरः-अपनी शक्तिभूत दिव्य महामातृगणोंके अधीश्वर 

अचिन्त्यामोघवीर्याधः समस्तासुरघस्मरः ।
 हिरण्यकशिपुच्छेदी काल: संकर्षणीपतिः ॥ 

419 अचिन्त्यामोघवीर्यातयः-कभी व्यर्थ न जानेवाले अचिन्त्य पराक्रमसे सम्पन्न, 
420 समस्तासुरघस्मरः-समस्त असुरोको ग्रास बनानेवाले, 
421 हिरण्यकशिपुच्छेदी- हिरण्यकशिपु नामक दैत्यको विदीर्ण करनेवाले, 
422 काल:-असुरोके लिये कालरूप, 
423संकर्षणीपतिः-संहारकारिणी शक्तिके स्वामी 

कृतान्तवाहनः सद्यःसमस्तभयनाशनः । 
सर्वविघ्नान्तकः सर्वसिद्धिदः सर्वपूरकः ।।

424 -कृतान्तवाहन:-कालको अपना वाहन बनानेवाले, 
425 -सद्यःसमस्तभयनाशन:-शरणमें आये हुए भक्तोंके समस्त भयोंका तत्काल नाश करनेवाले,
426 -सर्वविघ्नान्तकः-सम्पूर्ण विनोंका अन्त करनेवाले, 
427 -सर्वसिद्धिदः-सब प्रकारको सिद्धि प्रदान करनेवाले, 
428 -सर्वपूरकः-सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले 

समस्तपातकध्वंसी सिद्धिमन्त्राधिकाहयः । 
भैरवेशो हरार्तिनः कालकोटिदुरासदः ।। 

429 -समस्तपातकध्वंसी-सब पातकोंका नाश करनेवाले,
430 -सिद्धिमन्त्राधिकाहयःनाममें ही सिद्धि और मन्त्रोंसे अधिक शक्ति रखनेवाले,
431 -भैरवेश:-भैरवगणोंके स्वामी, 
432 -हरार्तिनः-भगवान् शङ्करकी पीड़ाका नाश करनेवाले, 
433 -कालकोटिदुरासदः-करोड़ों कालोंके लिये भी दुर्धर्ष 

दैत्यगर्भस्राविनामा स्फुटब्रह्माण्डगर्जितः ।
स्मृतमानाखिलत्राताऽद्धतरूपो महाहरिः ।।

434 -दैत्यगर्भस्राविनामा-जिनका नाम सुनकर ही दैत्यपलियोंके गर्भ गिर जाते हैं ऐसे भगवान् नृसिंह.
435 -स्फुटब्रह्माण्डगर्जित:जिनके गर्जनपर सारा ब्रह्माण्ड फटने लगता है, 
436-स्मृतमात्राखिलत्राता-स्मरण करनेमात्रसे सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाले, 
437 -अद्धतरूपःआश्चर्यजनक रूप धारण करनेवाले,
438-महाहरिःमहान् सिंहको आकृति धारण करनेवाले

 ब्रह्मचर्यशिरःपिण्डी दिक्पालोऽर्धाङ्गभूषणः ।
 द्वादशार्कशिरोदामा रुद्रशीकनूपुरः ।। 

439 -ब्रह्मचर्यशिरःपिण्डी-अपने शिरोभागमें ब्रह्मचर्यको धारण करनेवाले, 
440-दिक्पाल:-समस्त दिशाओंका पालन करनेवाले, 
441 -अर्धाङ्गभूषण:आधे अङ्गमें आभूषण धारण करनेवाले नृसिंह, 
442 -द्वादशार्कशिरोदामा- मस्तकमें बारह सूर्योके समान तेज धारण करनेवाले, 
443 -रुद्रशीकनूपुरः-जिनके चरणोंमें प्रणाम करते समय रुद्रका मस्तक एक नुपूरकी भाँति शोभा धारण करता है, वे भगवान्

योगिनीग्रस्तगिरिजात्राता भैरवतर्जकः । 
वीरचक्रेश्वरोऽत्युप्रो यमारिः कालसंवरः॥ 

444-योगिनीग्रस्तगिरिजात्राता- योगिनियोंक चंगुलमें फंसी हुई पार्वतीकी रक्षा करनेवाले, 
445-भैरवतर्जकः-भैरवगणोंको डाँट बतानेवाले, 
446-वीरचक्रेश्वरः-वौरमण्डलके ईश्वर, ... 
447 -अत्युप्रः-अत्यन्त भयङ्कर, 
448-यमारिःयमराजके शत्रु, 
449 -कालसंवरः- कालको आच्छादित करनेवाले 

 क्रोधेश्वरो रुद्रचण्डीपरिवारादिदुष्टभुक । 
सर्वाक्षोभ्यो मृत्युमृत्युः कालमृत्युनिवर्तकः ॥ 

450 -क्रोधेश्वर:-क्रोधपर शासन करनेवाले, 
451 -रुद्रचण्डीपरिवारादिदुष्टभुक-रुद्र और चण्डीके पार्षदोंमें रहनेवाले दुष्टोंके भक्षक,
452 -सर्वाक्षोभ्यः-किसीके द्वारा भी विचलित नहीं किये जा सकनेवाले, 
453 -मृत्युमृत्युः-मौतको भी मारनेवाले, 
454-कालमृत्युनिवर्तकः-काल और मृत्युका निवारण करनेवाले 

असाध्यसर्वरोगनः सर्वदुर्ग्रहसौम्यकृत् । 
गणेशकोटिदर्पघ्नो दुःसहाशेषगोत्रहा ।। 

455 -असाध्यसर्वरोगनः-सम्पूर्ण असाध्य रोगोंका नाश करनेवाले,
456-सर्वदुर्घहसौम्यकृत्  समस्त दुष्ट ग्रहोंको शान्त करनेवाले,
457 -गणेशकोटिदर्पघ्नः-करोड़ों गणपतियोंका अभिमान चूर्ण करनेवाले, 
458 -दुःसहाशेषगोत्रहा-समस्त दुस्सह शत्रुओंके कुलका नाश करनेवाले 

देवदानवदुर्दशों जगदयदभीषकः। 
समस्तदुर्गतित्राता जगद्धक्षकभक्षकः ॥ 

459 -देवदानवदुर्दर्श:-देवता और दानवोंको भी जिनकी ओर देखने में कठिनाई होती है-ऐसे भगवान् नृसिंह,
460 -जगदयदभीषकः-संसारके भयदाता असुरोको भी भयभीत करनेवाले, 
461 -समस्तदुर्गतित्राता-सम्पूर्ण दुर्गतियोंसे उद्धार करनेवाले,
462 -जगद्धक्षकभक्षकः-जगत्का भक्षण करनेवाले कालके भी भक्षक 

उप्रेशोऽम्बरमार्जारः कालमूषकभक्षकः । 
अनन्तायुधदोर्दण्डी नृसिंहो वीरभद्रजित् ।। 

463 -उप्रेशः-उग्र शक्तियोंपर शासन करनेवाले,
464 -अम्बरमार्जारः-आकाशरूपी बिलाव, 
465 -कालमूषकभक्षकः-कालरूपी चूहेको खा जानेवाले, 
466 -अनन्तायुधदोर्दण्डीअपने बाहुदण्डोंको ही अक्षय आयुधोंके रूपमें धारण करनेवाले, 
467 -नृसिंहः-नर तथा सिंह दोनोंकी आकृति धारण करनेवाले, 
468 -वीरभद्रजित्  वीर भद्रपर विजय पानेवाले 

योगिनीचक्रगुह्येशः शक्रारिपशुमांसभुक ।
 रुद्रो नारायणो मेषरूपशङ्करवाहनः ॥

469 -योगिनीचक्रगुह्येश:-योगिनीमण्डलके रहस्योंके स्वामी,
470 -शक्रारिपशुमांसभुक-इन्द्रके शत्रुभूत दैत्यरूपी पशुओका भक्षणकरनेवाले, 
471 -रुद्रः-प्रलयकालमें सबको रुलानेवाले रुद्र अथवा भयङ्कर आकारवाले नृसिंह, 
472-नारायणः-नार अर्थात् जीवसमुदायके आश्रयः अथवा नार-जलको निवासस्थान बनाकर रहनेवाले शेषशायी, 
473 -मेषरूपशङ्करवाहन:- मेषरूपधारी शिवको वाहन बनानेवाले 

मेषरूपशिवत्राता, दुष्टशक्तिसहस्रभुक्। 
तुलसीवल्लभो वीरो वामाचाराखिलेष्टदः ।। 

474 -मेषरूपशिवत्राता-मेषरूपधारी शिवके रक्षक,
475 -दुष्टशक्तिसहस्त्रभुक-सहस्रों दुष्टशक्तियोंका विनाश करनेवाले, 
476 -तुलसीवल्लभः-तुलसीके प्रेमी, 
477 -वीरः-शूरवीर, 
478 -वामाचाराखिलेष्टदः-सुन्दर आचरणवालोका सम्पूर्ण अभीष्ट सिद्ध करनेवाले 

महाशिवः शिवारूढो भैरवैककपालक ।
 झिल्लिचक्रेश्वरः शक्रदिव्यमोहनरूपदः ॥

479 -महाशिव:-परम मङ्गलमय, 
480 -शिवारूढः-कल्याणमय वाहनपर आरूढ़ होनेवाले, अथवा ध्यानस्थ भगवान् शिवके हृदयकमलपर आसीन होनेवाले,
481-भैरवैककपालधक्-रुद्ररूपसे हाथमें एक भयानक कपाल धारण करनेवाले,
482 -झिल्लिचक्रेश्वरः-झींगुरोके समुदायके स्वामी, 
483 -शक्रदिव्यमोहनरूपदः-इन्द्रको दिव्य एवं मोहक रूप देनेवाले 

गौरीसौभाग्यदो मायानिधिर्मायाभयापहः।
 ब्रह्मतेजोमयो ब्रह्मश्रीमयश्च त्रयीमयः ॥

484 -गौरीसौभाग्यदः-भगवती पार्वतीको सौभाग्य प्रदान करनेवाले, 
485 -मायानिधिःमायाके भंडार, 
486-मायाभयापहः-मायाजनित भयका नाश करनेवाले, 
487 -ब्रह्मतेजोमयः- ब्रह्मतेजसे सम्पन्न भगवान् वामन, 
488 -ब्रह्मश्रीमयश्च ब्राह्मणोचित श्रीसे परिपूर्ण विप्रहवाले, 
489 -त्रयीमयः-ऋक्, यजुः और साम-इन तीन वेदोंद्वारा प्रतिपादित स्वरूपवाले 

सुब्रह्मण्यो बलिध्वंसी वामनोऽदितिदुःखहा ।
उपेन्द्रो नृपतिर्विष्णुः कश्यपान्वयमण्डनः ॥ 

490 -सुब्रह्मण्यः -ब्राह्मण, वेद, तप और ज्ञानको भलीभाँति रक्षा करनेवाले,
491-बलिध्वंसीराजा बलिको स्वर्गसे हटानेवाले, 
492 -वामन:वामनरूपधारी भगवान्, 
493 -अदितिदुःखहादेवमाता अदितिके दुःख दूर करनेवाले,
494 -उपेन्द्रःइन्द्रके छोटे भाई, द्वितीय इन्द्र,
495-नपति:-राजा, जो 'नराणां च नराधिपः' के अनुसार भगवान्की दिव्य विभूति है,
496 -विष्णु:-बारह आदित्योमेसे एक, 
497-कश्यपान्वयमण्डन:-कश्यपजीके कुलकी शोभा बढ़ानेवाले 

बलिस्वाराज्यदः सर्वदेवविप्रान्नदोऽच्युतः।
 उरुक्रमस्तीर्थपादत्रिपदस्थत्रिविक्रमः  ॥

498 -बलिस्वाराज्यदः-राजा बलिको [अगले मन्वन्तरमें इन्द्र बनाकर] स्वर्गका राज्य प्रदान करनेवाले, करनेवाले, 
499-सर्वदेवविप्रान्नदः-सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्राह्मणोंको अन्न देनेवाले, 
500 -अच्युतः-अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले, 
501 -उरुक्रमः-बलिके यज्ञमें विराट्रूप होकर लम्बे डगसे त्रिलोकीको नापनेवाले,
502 -तीर्थपादःगङ्गाजीको प्रकट करनेके कारण तीर्थरूप चरणोंवाले, 
503 -त्रिपदस्थः-तीन स्थानोपर पैर रखनेवाले, 
504-त्रिविक्रमः-तीन बड़े-बड़े डगवाले 

व्योमपादः स्वपादाम्भःपवित्रितजगत्त्रयः। 
ब्रह्मेशाभिवन्द्यापिद्रुतधर्माहिधावनः ।। 

505 -व्योमपादः-सम्पूर्ण आकाशको चरणोंसे नापनेवाले,

506 -स्वपादाम्भ:पवित्रितजगत्त्रयःअपने चरणोंके जल (गङ्गाजी) से तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले, 

507 -ब्रह्मेशाधभिवन्द्याधिः-ब्रह्मा और शहर आदि देवताओंके द्वारा वन्दनीय चरणोवाले, 
508-द्रुतधर्मा-शीघ्रतापूर्वक धर्मका पालन करनेवाले,
509 -अहिधावनः-सर्पकी भाँति तेज दौड़नेवाले

  अचिन्त्याछुतविस्तारो विश्ववृक्षो महाबलः । 
  राहुमूर्धापराङ्गच्छिद् भृगुपत्नीशिरोहरः ।।

510 -अचिन्त्याद्भुतविस्तार:-किसी तरह चिन्तनमें न आनेवाले अद्भुत विस्तारसे युक्त, 
511 -विश्ववृक्षः-संसार-वृक्षरूप,
512 -महाबलःमहान् बलसे युक्त,
513-राहुमूर्धापराङ्गच्छिद् राहुके मस्तक और धड़को काटकर अलग करनेवाले, 
514 -भृगुपत्नीशिरोहर:-भृगुपत्नीके मस्तकका अपहरण करनेवाले 

 पापात्रस्तः सदापुण्यो दैत्याशानित्यखण्डकः ।
 पूरिताखिलदेवाशो विश्वार्थकावतारकृत् ।।

515 -पापात्रस्त:-पापसे डरनेवाले, 
516 -सदापुण्यः-निरन्तर पुण्यमें प्रवृत्त,
517 -दैत्याशानित्यखण्डकः-धर्मविरोधी दैत्योंकी आशाका सदा खण्डन करनेवाले,
518-पूरिताखिलदेवाशःसम्पूर्ण देवताओंकी आशा पूर्ण करनेवाले, 
519-विश्वार्थकावतारकृत्-एकमात्र विश्वका कल्याण करनेके लिये अवतार लेनेवाले 

 स्वमायानित्यगुप्तात्मा भक्तचिन्तामणिः सदा। 
वरदः कार्तवीर्यादिराजराज्यप्रदोऽनघः ॥ 

520- स्वमायानित्यगुप्तात्मा-अपनी मायासे निरन्तर अपने स्वरूपको छिपाये रखनेवाले, 
521-भक्तचिन्तामणिः-सदा भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये चिन्तामणिके समान, 
522 -वरदः-भक्तोंको वर प्रदान करनेवाले, 
523-कार्तवीर्यादिराजराज्यप्रदःकृतवीर्य-पुत्र अर्जुन आदि राजाओको राज्य देनेवाले
524-अनघः-स्वभावतः पापसे रहित 

विश्वश्लाघ्योऽमिताचारो दत्तात्रेयो मुनीश्वरः। 
पराशक्तिसदाश्लिष्टो योगानन्दसदोन्प्रदः ॥ 

525 -विश्वश्लाघ्यः-समस्त संसारके लिये प्रशंसनीय,
526 -अमिताचार:-अपरिमित आचारवाले,
527 -दत्तात्रेय:-अत्रिकुमार दत्त, जो भगवान्के अवतार हैं, 
528 -मुनीश्वरः-मुनियोंके स्वामी, 
529 -पराशक्तिसदाश्लिष्टः-सदा पराशक्तिसे युक्त,
530 -योगानन्दसदोन्पदः-निरन्तर योगजनित आनन्दमे विभोर रहनेवाले 

समस्तेन्द्रारितेजोहत्परमामृतपद्यपः ।
अनसूयागर्भरत्र ..भोगमोक्षसुखप्रदः ॥ 

531 -समस्तेन्द्रारितेजोहत्-इन्द्रसे शत्रुता रखनेवाले सम्पूर्ण दैत्योंका तेज हर लेनेवाले, 
532-परमामृतपद्यप:-परम अमृतमय कमलका रस पान करनेवाले,
533 -अनसूयागर्भरत्नम्-अत्रिपनी अनसूयाजीके गर्भके रत्न, 
534 -भोगमोक्षसुखप्रदःभोग और मोक्षका सुख प्रदान करनेवाले 

जमदग्निकुलादित्यो रेणुकाद्भुतशक्तिधक । 
मातृहत्यादिनिर्लेपः स्कन्दजिद्विप्रराज्यदः ।।

535 -जमदग्निकुलादित्यः-मुनिवर जमदग्निक वंशको सूर्यके समान प्रकाशित करनेवाले परशुरामजी,
536 -रेणुकाद्भुतशक्तिधृक्-माता रेणुकाकी अद्भुत शक्ति धारण करनेवाले, 
537 -मातृहत्यादिनिर्लेपःमातृहत्या आदि दोषोंसे निर्लिप्त रहनेवाले परशुरामजी,
 538 -स्कन्दजित्- कार्तिकेयजीको जीतनेवाले, 
539 -विप्रराज्यदः-ब्राह्मणोंको राज्य देनेवाले

सर्वक्षत्रान्तकृतीग्दर्पहा कार्तवीर्यजित्। 
सप्तद्वीपवतीदाता शिवार्चकयशःप्रदः ।।

540-सर्वक्षत्रान्तकृत्-समस्त क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले,
541-वीरदर्पहा-बड़े-बड़े वीरोका दर्प दलन करनेवाले, 
542 -कार्तवीर्यजित्-कृतवीर्यपुत्र अर्जुनको परास्त करनेवाले, 
543 -सप्तद्वीपवतीदाता-ब्राह्मणोंको सातो द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका दान करनेवाले, 
544-शिवार्चकयशःप्रदः-शिवकी पूजा करनेवालेको यश देनेवाले 

 भीमः परशुरामश्च शिवाचार्यैकविश्वभूः ।
 शिवाखिलज्ञानकोशो भीष्माचार्योऽग्निदेवतः ।।

545 -भीमः-भयङ्कर पराक्रम करनेवाले, 
546 -परशुरामः-परशुरामरूपधारी भगवान्, 
547 -शिवाचार्यैकविश्वभूः-भगवान् शङ्करको गुरु बनाकर विद्या सीखनेवाले संसारमै एकमात्र पुरुष, 
548 -शिवाखिलज्ञानकोश:-भगवान् शङ्करसे सम्पूर्ण ज्ञानका कोष प्राप्त करनेवाले, 
549-भीष्याचार्यःपाण्डवोंके पितामह भीष्मजीके आचार्य, 
550 -अनिदेवतः-अग्निदेवताके उपासक 

 द्रोणाचार्यगुरुर्विश्वजैत्रधन्वा कृतान्तजित् । 
अद्वितीयतपोमूर्तिब्रह्मचर्येकदक्षिणः .. ॥

551-द्रोणाचार्यगुरु:-आचार्य द्रोणके गुरु, 
552-विश्वजैत्रधन्वा-विश्वविजयी धनुष धारण करनेवाले, 
553 -कृतान्तजित्-कालको भी परास्त करनेवाले,
554-अद्वितीयतपोमूर्तिः-अद्वितीय तपस्याके मूर्तिमान स्वरूप,
 555-ब्रह्मचर्यैकदक्षिण:ब्रह्मचर्यपालनमें एकमात्र दक्ष 

 मनुश्रेष्ठः सतां सेतुर्महीयान् वृषभो विराट् । 
आदिराजः क्षितिपिता सर्वस्त्रकदोहकृत् ।।

556 -मनुश्रेष्ठः-मनुष्यों में श्रेष्ठ राजा पृथु, 
557 -सतां सेतुः-सेतुके समान सत्पुरुषोंकी मर्यादाके रक्षक, अथवा सत्पुरुषोंके लिये सेतुरूप,
558-महीयान्बड़ोंसे भी बड़े महापुरुष, 
559-वृषभ:कामनाओंकी वर्षा करनेवाले श्रेष्ठ राजा, 
560-विराटतेजस्वी राजा, 
561 -आदिराज:-मनुष्योंमें सबसे प्रथम राजाके पदसे विभूषित, 
562 -क्षितिपितापृथ्वीको अपनी कन्याके रूपमें स्वीकार करनेवाले,
563-सर्वस्त्रकदोहकृत्  -गोरूपधारिणी पृथ्वीसे समस्त रत्नोंके एकमात्र दुहनेवाले 

पृथुर्जन्यायेकदक्षो गी:श्रीकीर्तिस्वयंवृतः । 
जगवृत्तिप्रदचक्रवर्तिश्रेष्ठोऽभूयास्त्रक ॥                                   

564-पृथुः-अपने यशसे प्रख्यात पृथु नामक राजा, 
565 -जन्माघेकदक्षः-उत्पत्ति, पालन और संहारमें एकमात्र कुशल, 
566 -गी:श्रीकीर्तिस्वयंवृतः-वाणी, लक्ष्मी और कीर्तिके द्वारा स्वयं वरण किये हुए, 
567 -जगवृत्तिप्रदः-संसारको जीविका प्रदान करनेवाले, 
568 -चक्रवर्तिश्रेष्ठः-चक्रवर्ती राजाओंमें श्रेष्ठ,
569-अद्वयाखक-अद्वितीय शस्त्रधारी वीर 

सनकादिमुनिप्राप्यभगवद्भक्तिवर्धनः ।
 वर्णाश्रमादिधर्माणां कर्ता वक्ता प्रवर्तकः ।।

570 -सनकादिमुनिप्राप्यभगवद्भक्तिवर्धनः-सनकादि मुनियोंसे प्राप्त होने योग्य भगवद्भक्तिका विस्तार करनेवाले, 
571 -वर्णाश्रमादिधर्माणां कर्ता-वर्ण और आश्रम आदिके धौक बनानेवाले,
572 -वक्ता-वर्ण और आश्रम आदिके   धर्मो का उपदेश करनेवाले, 
573-प्रवर्तकः-उक्त धर्मोका प्रचार करनेवाले 

 सूर्यवंशध्वजो रामो राघवः सदगुणार्णवः । 
काकुत्स्थो वीरराजायों राजधर्मधुरन्धरः ।। 

574 -सूर्यवंशध्वजः-सूर्यवंशकी कीर्तिपताका फहरानेवाले श्रीरघुनाथजी, 
575 -रामःयोगीजनोके रमण करनेके लिये नित्यानन्दस्वरूप परमात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी, 
576-राघवः-रघुकुलमें जन्म ग्रहण करनेवाले, 
577 -सद्गुणार्णवः-उत्तम गुणोंके सागर, 
578 -काकुत्स्थ:-ककुत्स्थ-पदवी धारण करनेवाले राजा पुरञ्जयकी कुल-परम्परामें अवतीर्ण, 
579 -वीरराजार्यः-वीर राजाओंमें श्रेष्ठ, 
580 -राजधर्मधुरन्धरः-राजधर्मका भार वहन करनेवाले 

नित्यस्वस्थाश्रयःसर्वभद्रग्राहीशुभैकद्क।
 नररत्नं रखगों धर्माध्यक्षो महानिधिः ॥ 

581 -नित्यस्वस्थाश्रयः-सदा अपने स्वरूप स्थित रहनेवाले महात्माओंके आश्रय, 
582-सर्वभद्रग्राही-समस्त कल्याणोंकी प्राप्ति करानेवाले, 
583-शुभैकदृक-एकमात्र शुभकी ओर ही दृष्टि रखनेवाले, 
584-नररत्नम्-मनुष्योंमे श्रेष्ठ,
585 -रत्नगर्भ:-अपनी माताके गर्भके रत्न अथवा अपने भीतर रत्नमय गुणोंको धारण करनेवाले, 
586 -धर्माध्यक्षः-धर्मक साक्षी,
587 -महानिधिःअखिल भूमण्डलके सम्राट् होनेके कारण बहुत बड़े कोषवाले 

सर्वश्रेष्ठाश्रयः सर्वशस्त्रास्त्रप्रामवीर्यवान् । 
जगदीशो दाशरथिः सर्वरत्नाश्रयो नृपः ॥ 

588 -सर्वश्रेष्ठाश्रयः-सबसे श्रेष्ठ आश्रय,
589 -सर्वशस्त्रास्त्राग्रामवीर्यवान्-समस्त अस्त्रशस्त्रोंके समुदायकी शक्ति रखनेवाले, 
590 -जगदीशः-सम्पूर्ण जगत्के स्वामी,
591 -दाशरथि:-अयोध्याके चक्रवर्ती नरेश महाराज दशरथके प्राणाधिक प्रियतम पुत्र, 
592  -सर्वरत्नाश्रयो नृपः-सम्पूर्ण रत्रोंके आश्रयभूत राजा  

समस्तधर्मसूः सर्वधर्मद्रष्टाखिलार्तिहा। 
अतीन्द्रो ज्ञानविज्ञानपारद्रष्टा क्षमाम्बुधिः ।।

593 -समस्तधर्मसूः-समस्त धर्मोको उत्पत्र करनेवाले,
594 -सर्वधर्मद्रष्टा सम्पूर्ण धर्मोपर दृष्टि रखनेवाले, 
595-अखिलार्तिहा-सबकी पीड़ा दूर करनेवाले अथवा समस्त पीड़ाओंके नाशक, 
596-अतीन्द्रः-इन्द्रसे भी बढ़कर ऐश्वर्यशाली, 
597-ज्ञानविज्ञानपारद्रष्टा-ज्ञान और विज्ञानके पारंगत,
598 -क्षमाम्बुधिः-क्षमाके सागर 

सर्वप्रकृष्टः शिष्टेष्टो हर्षशोकाधनाकुलः ।
पित्राज्ञात्यक्तसाम्राज्यः सपत्नोदयनिर्भयः ।।  

599 -सर्वप्रकृष्टः-सबसे श्रेष्ठ, 
600 -शिष्टेष्टः-शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, 
601 -हर्षशोकाधनाकुल:-हर्ष और शोक आदिसे विचलित न होनेवाले,
602 -पित्राज्ञात्यक्तसाम्राज्य:-पिताकी आज्ञासे समस्त भूमण्डलका साम्राज्य स्याग देनेवाले, 
603-सपत्नोदयनिर्भयः-शत्रुओंके उदयसे भयभीत न होनेवाले 

गुहादेशार्पितैश्वर्यः  शिवस्पर्धाजटाधरः ।
 चित्रकूटाप्तरत्नाद्रिर्जगदीशो वनेचरः ॥

604 -गुहादेशार्पितैश्वर्यः-वनवासके समय पर्वतकी कन्दराओको ऐश्वर्य समर्पित करनेवाले-अपने निवाससे गुफाओंको भी ऐश्वर्य-सम्पन्न बनानेवाले, 
605-शिवस्पर्धाजटाधरः-शङ्करजीकी जटाओंसे होड़ लगानेवाली जटाएँ धारण करनेवाले,
606 -चित्रकूटाप्तरत्नाद्रिः-चित्रकूटको निवास स्थल बनाकर उसे रत्नमय पर्वत (मेरुगिरि) की महत्ता प्राप्त करानेवाले,
607-जगदीशः-सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर,
608-वनेचरः-वनमें विचरनेवाले 

यथेष्टामोघसर्वास्त्रो देवेन्द्रतनयाक्षिहा ।
 ब्रह्मेन्द्रादिनतैषीको मारीचनो विराधहा ॥ 

609 -यथेष्टामोघसर्वास्त्र:-जिनके सभी अस्त्र इच्छानुसार चलनेवाले एवं अचूक हैं,
610 -देवेन्द्रतनयाक्षिहा-देवराजके पुत्र जयन्तकी आँख फोड़नेवाले, 
611 -ब्रह्मेन्द्रादिनतैषीक:-जिनके चलाये हुए सींकके बाणको ब्रह्मा आदि देवताओंने भी मस्तक झुकाया था, ऐसे प्रभावशाली भगवान् श्रीराम, 
612-मारीचनः-मायामय मृगका रूप धारण करनेवाले मारीच नामक राक्षसके नाशक,
613-विराधहा-विराधका वध करनेवाले 

 ब्रह्मशापहताशेषदण्डकारण्यपावनः ।
 चतुर्दशसहस्रोग्ररक्षोभैकशरैकक ॥

614 -ब्रह्मशापहताशेषदण्डकारण्यपावनः -ब्राह्मण (शुक्राचार्य) के शापसे नष्ट हुए दण्डकारण्यको अपने निवाससे पुनः पावन बनानेवाले 
615 -चतुर्दशसहस्रोग्ररक्षोप्रैकशरैकधूक-चौदह हजार भयङ्कर राक्षसोको मारनेकी शक्तिसे युक्त एकमात्र बाण धारण करनेवाले 

खरारित्रिशिरोहन्ता दूषणनो जनार्दनः ।
जटायुषोऽपिगतिदोऽगस्त्यसर्वस्वमन्त्रराट् ॥ 

616 -खरारि:-खर नामक राक्षसके शत्रु, 
617 -त्रिशिरोहन्ता-त्रिशिराका वध करनेवाले, 
618 -दूषणनः-दूषण नामक राक्षसके प्राण लेनेवाले, 
619 -जनार्दनः-भक्तलोग जिनसे अभ्युदय एवं निःश्रेयसरूप परम पुरुषार्थकी यांचना करते हैं, 
620 -जटायुषोऽप्रिगतिदः-जटायुका दाह-संस्कार करके उन्हें उत्तम गति प्रदान करनेवाले,
621 -अगस्त्यसर्वस्वमन्त्रराट्-जिनका नाम महर्षि अगस्त्यका सर्वस्व एवं मन्त्रोंका राजा है 

 लीलाधनुष्कोट्यपास्तदुन्दुभ्यस्थिमहाचल:- । 
सप्ततालव्यधाकृष्टध्वस्तपातालदानवः ॥ 

622-लीलाधनुष्कोट्यपास्तदुन्दुभ्यस्थिमहाचल:-खेल-खेलमें ही दुन्दुभि नामक दानवकी हड्डियोके महान् पर्वतको धनुषकी नोकसे उठाकर दूर फेंक देनेवाले, 
623 -सप्ततालव्यधाकृष्टध्वस्तपातालदानवः-सात तालवृक्षोंके वेधसे आकृष्ट होकर आये हुए पातालवासी दानवका विनाश करनेवाले 

सुप्रीवराज्यदोऽहीनमनसैवाभयप्रदः ।
हनुमद्रमुख्येशः समस्तकपिदेहभृत् ।। 

624 -सुग्रीवराज्यदः-सुग्रीवको राज्य देनेवाले, 
625-अहीनमनसैवाभयप्रदः-उदार चित्तसे अभय-दान देनेवाले,
626 -हनुमद्रमुख्येश:हनुमानजी तथा भगवान् शङ्करके प्रधान आराध्यदेव.
627-समस्तकपिदेहभृत्-सम्पूर्ण वानरोंके शरीरोंका पोषण करनेवाले

सनागदैत्यवाणकव्याकुलीकृतसागरः ।
सम्लेच्छकोटिबाणैकशुष्कनिर्दग्धसागरः ।। 

628- सनागदैत्यबाणैकव्याकुलीकृतसागरः-एक ही बाणसे नाग और दैत्योसहित समुद्रको क्षुब्ध कर देनेवाले,
629-सम्लेच्छकोटिबाणैकशुष्कनिर्दग्धसागरः-एक ही बाणसे करोड़ों म्लेच्छोसहित समुद्रको सुखा देने और जला डालनेवाले 

 समुद्राद्भुतपूर्वकवद्धसेतुर्यशोनिधिः . ।
असाध्यसाधको लङ्कासमूलोत्साददक्षिणः ।। 

630 -समुद्राद्भुतपूर्वकवद्धसेतुः-समुद्र में पहले-पहल एक अद्भुत पुल बांधनेवाले, 
631 -'यशोनिधिः-सुयशके भंडार,
632-असाध्यसाधकः-असम्भवको भी सम्भव कर दिखानेवाले,
633-लङ्कासमूलोत्साददक्षिण:-लङ्काको जड़से नष्ट कर डालने में दक्ष 


वरदृप्तजगच्छल्यपौलस्त्यकुलकन्तनः ।       
रावणिनः प्रहस्तच्छित्कुम्भकर्णभिदुग्रहा  ।।

634-वरदृप्तजगच्छल्यपौलस्त्यकुलकृन्तन:वर पाकर घमंडसे भरे हुए तथा संसारके लिये कण्टकरूप रावणके कुलका उच्छेद करनेवाले,
635 -रावणिनः-लक्ष्मणरूपसे रावणके पुत्र मेघनादका वध करनेवाले,
636 -प्रहस्तच्छित्-प्रहस्तका मस्तक काटनेवाले, 
637 -कुम्भकर्णभित्- कुम्भकर्णको विदीर्ण करनेवाले, 
638 - दुग्रहा -भयङ्कर राक्षसोंका वध करनेवाले

 रावणकशिरश्छेत्ता निःशङ्केन्द्रकराज्यदः । 
स्वर्गास्वर्गत्वविच्छेदी देवेन्द्रानिन्द्रताहरः ।। 

639 -रावणकशिरश्छेत्ता-रावणके सिर काटनेवाले एकमात्र वोर,
 640-निःशङ्केन्द्रकराज्यदः-निःशङ्क होकर इन्द्रको एकमात्र राज्य देनेवाले, 
641 -स्वर्गास्वर्गत्वविच्छेदी-स्वर्गकी अस्वर्गताको मिटा डालनेवाले,
642-देवेन्द्रानिन्द्रताहरः-देवराज इन्द्रकी अनिन्द्रता दूर करनेवाले 

 रक्षोदेवत्वहद्धर्माधर्मत्वन्नः पुरुष्टुतः। 
नतिमात्रदशास्यारिदत्तराज्यविभीषणः ॥

643 -रक्षोदेवत्वत्-राक्षसलोग जो देवताओंको हटाकर स्वयं देवता बन बैठे थे, उनके उस देवत्वको हर लेनेवाले, 
644-धर्माधर्मत्वनः-धर्मकी अधर्मताका नाश करनेवाले, (राक्षसोंके कारण धर्म भी अधर्मरूपमें परिणत हो रहा था, भगवान् रामने उन्हें मारकर धर्मको पुनः अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित किया).
645-पुरुष्टुतःबहुत लोगोंके द्वारा स्तुत होनेवाले, 
646 -नतिमात्रदशास्यारिः-नत मस्तक होनेतक ही रावणको शत्रु माननेवाले, 
647-दत्तराज्यविभीषणः-विभीषणको राज्य प्रदान करनेवाले 

सुधावृष्टिमृताशेषस्वसैन्योजीवनककृत् ।
 देवब्राह्मणनामैकधाता सर्वामरार्चितः ॥ 

 648 -सुधावृष्टिमृताशेषस्वसैन्योज्जीवनैककृत्-सुधाकी वर्षा कराकर अपने समस्त मरे हुए सैनिकोंको जीवन प्रदान करनेवाले,
649 -देवब्राह्मणनामैकधाता-देवता और ब्राह्मणके नामोंके एकमात्र रक्षक, वे यदि न होते तो देवताओं एवं ब्राह्मणोका नाम-निशान मिट जाता, 
650 -सर्वामरार्चित:सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित 

ब्रह्मसूर्येन्द्ररुद्रादिवन्दार्पितसतीप्रियः । 
 अयोध्याखिलराजाम्यः सर्वभूतमनोहरः ॥ 

651-ब्रह्मसूर्येन्द्ररुद्रादिवृन्दाप्तिसतीप्रियःब्रह्मा, सूर्य, इन्द्र तथा रुद्र आदि देवताओंके समूहद्वारा शुद्ध प्रमाणित करके समर्पित की हुई सती सीताके प्रियतम, 
652 -अयोध्याखिलराजाग्य:अयोध्यापुरीके सम्पूर्ण राजाओमें अप्रगण्य, 
653 -सर्वभूतमनोहर:-अपने सौन्दर्य-माधुर्यके कारण सम्पूर्ण प्राणियोंका मन हरनेवाले 

 स्वाम्यतुल्यकृपादण्डो हीनोत्कृष्टकसप्रियः । 
श्वपक्ष्यादिन्यायदर्शी होनार्थाधिकसाधकः ।। 

654- स्वाम्यतुल्यकृपादण्डः-प्रभुताके अनुरूप ही कृपा करने और दण्ड देनेवाले, 
655 -हीनोत्कृष्टकसप्रियः-ऊँच-नीच-सबके सचे प्रेमी, 
656 -श्वपक्ष्यादिन्यायदर्शी-कुत्ते और पक्षी आदिके प्रति भी न्याय प्रदर्शित करनेवाले, 
657 -हीनार्थाधिकसाधकः-असहाय पुरुषोंके कार्यकी अधिक सिद्धि करनेवाले 


वधव्याजानुचितकृत्तारकोऽखिलतुल्यकृत् । 
पावित्र्याधिक्यमुक्तात्मा प्रियात्यक्तः स्मरारिजित् ।।

658 -वधव्याजानुचितकृत्तारकः-अनुचित कर्म करनेवाले लोगोंका वधके बहाने उद्धार करनेवाले, 
659 -अखिलतुल्यकृत्-सबके साथ उसकी योग्यताके अनुरूप बर्ताव करनेवाले, 
660 -पावित्र्याधिक्यमुक्तात्मा-अधिक पवित्रताके कारण नित्यमुक्त स्वभाववाले, 
661 -प्रियात्यक्तः-प्रिय पत्नी सीतासे कुछ कालके लिये वियुक्त, 
662 -स्मरारिजित्-कामदेवके शत्रु भगवान् शिवको भी जीतनेवाले

साक्षात्कुशलवच्छाद्राबितो ह्यपराजितः । 
कोसलेन्द्रो वीरबाहुः सत्यार्थत्यक्तसोदरः ॥ 

663 -साक्षात्कुशलवच्छाद्रावितः-कुश और लवके रूपमें स्वयं अपने-आपसे युद्ध में हार जानेवाले, 
664 -अपराजित:-वास्तवमें कभी किसीके द्वारा भी परास्त न होनेवाले, 
665 -कोसलेन्द्रः-कोसल देशके ऐश्वर्यशाली सम्राट, 
666 -वीरबाहुः-शक्तिशालिनी भुजाओंसे युक्त, 
667 -सत्यार्थत्यक्तसोदरः-सत्यकी रक्षाके लिये अपने भाई लक्ष्मणका त्याग करनेवाले 

 शरसंधाननिधूर्तधरणीमण्डलो जयः। 
ब्रह्मादिकामसांनिध्यसनाथीकृतदैवतः ॥      

668  -शरसंधाननिधूर्तधरणीमण्डल:बाणोंके संधानसे समस्त भूमण्डलको कंपा देनेवाले,
669-जयः-विजयशील, 
670 -ब्रह्मादिकामसांनिध्यसनाधीकृतदैवतः-ब्रह्मा आदिकी कामनाके अनुसार समीपसे दर्शन देकर समस्त देवताओंको सनाथ करनेवाले ॥ 

ब्रह्मलोकाप्तचाण्डालाद्यशेषप्राणिसार्थकः  । 
स्वीतगर्दभश्वादिश्चिरायोध्यावनककृत् ॥

671-ब्रह्मलोकाप्तचाण्डालाद्यशेषप्राणिसार्थकः-चाण्डाल आदि समस्त प्राणियोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाकर कृतार्थ करनेवाले, 
672-स्वीतगर्दभश्वादिः-गदहे और कुत्ते आदिको भी स्वर्गलोकमें ले जानेवाले, 
673 -चिरायोध्यावनैककृत्-चिरकालतक अयोध्याकी एकमात्र रक्षा करनेवाले 

रामो द्वितीयसौमित्रिलक्ष्मणः प्रहतेन्द्रजित्। 
विष्णुभक्तः सरामाधिपादुकाराज्यनिर्वृतिः ।। 

674 -रामः-मुनियोंका मन रमानेवाले भगवान् श्रीराम,
675 -द्वितीयसौमित्रिः-सुमित्राकुमार लक्ष्मणको साथ रखनेवाले,
676 -लक्ष्मणः-शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न लक्ष्मणरूप, 
677  -प्रहतेन्द्रजित्   लक्ष्मण रूपसे मेघनादका वध करनेवाले.
678 -विष्णुभक्तः-विष्णुके अवतारभूत भगवान् श्रीरामके भक्त भरतरूप,
 679 -सरामाद्भिपादुकाराज्यनिर्वृति:-श्रीरामचन्द्रजीको चरणपादुकाके साथ मिले हुए राज्यसे संतुष्ट होनेवाले भरतरूप ॥ 

भरतोऽसहागन्धर्वकोटिनो लवणान्तकः 
शत्रुनो वैद्यराडायुर्वेदगभौषधीपतिः ॥ 

680-भरत:-प्रजाका भरण-पोषण करनेवाले कैकेयीकुमार भरतरूप, 
681 -असह्यगन्धर्वकोटिनः-करोड़ो दुःसह गन्धर्वोका वध करनेवाले,
682 -लवणान्तकः-लवणासुरको मारनेवाले शत्रुघ्नरूप, 
683- शत्रुघ्रः-शत्रुओका वध करनेवाले सुमित्राके छोटे कुमार, 
684 -वैद्यराडा -वैद्योंके राजा धन्वन्तरिरूप, 
685 -आयुर्वेदभौषधीपतिः आयुर्वेदके भीतर वर्णित ओषधियोंके स्वामी

नित्यामृतको धन्वन्तरियंज्ञो जगद्धरः ।
 सूर्यारिघ्रःसुराजीवो दक्षिणेशो द्विजप्रियः ।।

686-नित्यामृतकरः-हाथोंमें सदा अमृत लिये रहनेवाले. 
687 -धन्वन्तरि:-धन्वन्तरि नामसे प्रसिद्ध एक वैद्य, जो समुद्रसे प्रकट हुए और भगवान् नारायणके अंश थे, 
688 -यज्ञः-यज्ञस्वरूप
689 -जगद्धरः-संसारके पालक, 
690 -सूर्यारिघ्रःसूर्यके शत्रु (केतु) को मारनेवाले, 
691- सुराजीवःअमृतके द्वारा देवताओंको जीवन प्रदान करनेवाले, 
692-दक्षिणेश:-दक्षिण दिशाके स्वामी धर्मराजरूप, 
693 -द्विजप्रियः-ब्राह्मणोंके प्रियतम  

छिन्नमूर्धापदेशार्कः शेषाङ्गस्थापितामरः ।
 विश्वार्थाशेषकृद्राहुशिरश्छेताक्षताकृतिः ॥

694-छिन्नमूर्धापदेशार्क:-जिसका मस्तक कटा हुआ है तथा जो कहनेमात्रके लिये सूर्य'स्वर्भानु' नाम धारण करता है. ऐसा राहु नामक ग्रह
695-शेषाङ्गस्थापितामरः-जिसके शेष अङ्गों में अमरत्वकी स्थापना हुई है, ऐसा राहु, 
696-विश्वार्थाशेषकृत्-संसारके सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले भगवान्,
697-राहुशिरश्छेत्ता- राहुका मस्तक काटनेवाले, 
698 -अक्षताकृतिः-स्वयं किसी प्रकारको भी क्षतिसे रहित शरीरवाले 

 वाजपेयादिनामाग्निर्वेदधर्मपरायणः । 
 श्वेतद्वीपपति सांख्यप्रणेता सर्वसिद्धिराट् ॥

699 -वाजपेयादिनामाग्निः-वाजपेय आदि नाम धारण करनेवाले अग्नि देवता, 
700-वेदधर्मपरायणः-वेदोक्त धर्मके परम आश्रय,
701-श्वेतद्वीपपतिः-श्रेतद्वीपके स्वामी, 
702 --सांरख्यप्रणेता-सांख्यशास्त्रको रचना करनेवाले कपिलस्वरूप, 
703 -सर्वसिद्धिराट्-सम्पूर्ण सिद्धियोंके राजा

विश्वप्रकाशितज्ञानयोगमोहतमित्रहा ।
 देवहूत्यात्मजः सिद्धः कपिलः कर्दमात्मजः ।।

704- विश्वप्रकाशितज्ञानयोगमोहतमित्रहा संसारमें ज्ञानयोगका प्रकाश करके मोहरूपी अन्धकारका नाश करनेवाले, 
705 -देवहूत्यात्मजः-मनुकुमारी देवहूतिके पुत्र. 
706 -सिद्धः-सब प्रकारको सिद्धियोंसे परिपूर्ण, 
707-कपिल:-कपिल नामसे प्रसिद्ध भगवान्के अवतार, 
708- कर्दमात्मजःकर्दम ऋषिके सुयोग्य पुत्र  

योगस्वामी ध्यानभङ्गसगरात्मजभस्मकृत् । 
धर्मों वृषेन्द्रः सुरभीपतिः  शुद्धात्मभावितः ॥ 

709 -योगस्वामी-सांख्ययोगके स्वामी, 
710 -ध्यानभङ्गसगरात्मजभस्मकृत्-ध्यान भङ्ग होनेसे सगर-पुत्रोको भस्म कर डालनेवाले, 
711-धर्म:जगत्को धारण करनेवाले धर्मके स्वरूप, 
712 -वृषेन्द्रः- श्रेष्ठ वृषभकी आकृति धारण करनेवाले, 
713 -सुरभीपतिः-सुरभी गौके स्वामी, 
714 -शुद्धात्मभावितः-शुद्ध अन्तःकरणमें चिन्तन किये जानेवाले 

शम्भु त्रिपुरदाहकस्थैर्यविश्वरथोद्वहः ।
भक्तशम्भुजितो दैत्यामृतवापीसमस्तपः ।। 

715 -शम्भु:-कल्याणकी उत्पत्तिके स्थानभूत, शिवस्वरूप, 
716 -त्रिपुरदाहकस्थैर्यविश्वरथोद्वहः-त्रिपुरका दाह करनेके समय एकमात्र स्थिर रहनेवाले और विश्वमय रथका वहन करनेवाले,
717 -भक्तशम्भुजितः-अपने भक्त शिवके द्वारा पराजित,
718 -दैत्यामृतवापीसमस्तपः-त्रिपुरनिवासी दैत्योंकी अमृतसे भरी हुई सारी बावलीको गोसपसे पी जानेवाले 

 महाप्रलयविश्वैकनिलयोऽखिलनागराट् ।
 शेषदेवः सहस्राक्षः सहस्रास्यशिरोभुजः ॥ 

719- महाप्रलयविश्वैकनिलयः-महाप्रलयके समय सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र निवासस्थान, 
720 -अखिलनागरा-सम्पूर्ण नागोंके राजा शेषनागस्वरूप, 
721 -शेषदेवः-प्रलयकालमें भी शेष रहनेवाले देवता,
722 -सहस्राक्षः-सहस्रों नेत्रवाले, 
723 -सहस्त्रास्यशिरोभुजः-सहस्रों मुख, मस्तक और भुजाओंवाले 

 फणामणिकणाकारयोजिताच्छाम्बुदक्षितिः ।
 कालाग्निरुद्रजनको मुशलाखो हलायुधः ।। 

724 -फणामणिकणाकारयोजिताच्छाम्बुदक्षितिः-फनोंकी मणियोंके कणोंके आकारसे पृथ्वीपर श्वेत बादलोंकी घटा-सी छा देनेवाले, 
725 -कालाग्निरुद्रजनकः-भयङ्कर कालाग्नि एवं संहारमूर्ति रुद्रको प्रकट करनेवाले.
726 -मुशलाख:-मुशलको अस्त्ररूपमें ग्रहण करनेवाले शेषावतार बलरामरूप, 
727 -हलायुधः-हलरूपी आयुधवाले 

नीलाम्बरो वारुणीशो मनोवाकायदोषहा।
 असंतोषदृष्टिमात्रपातितकदशाननः ॥

728-नीलाम्बर:-नीलवस्त्रधारी, 
729 -वारुणीश:-वारुणीके स्वामी, 
730 -मनोवाळायदोषहा-मन, वाणी और शरीरके दोष दूर करनेवाले, 
731 -असंतोषदृष्टिमात्रपातितकदशाननःअसंतोषपूर्ण दृष्टि डालनेमात्रसे ही पातालमें गये हुए रावणको गिरा देनेवाले शेषनागरूप 

बिलसंयमनो घोरो रौहिणेयः प्रलम्बहा।
 मुष्टिकनो द्विविदहा कालिन्दीकर्षणो बलः ॥ 

732 -बिलसंयमनः-सातों पाताललोकोंको काबूमें रखनेवाले, 
733 -घोर:-प्रलयके समय भयङ्कर आकृति धारण करनेवाले, 
734 -रौहिणेयःरोहिणीके पुत्र, 
735- प्रलम्बहा-प्रलम्ब दानवको मारनेवाले, 
736 -मुष्टिकनः-मुष्टिकके प्राण लेनेवाले, 
737- द्विविदहा-द्विविद नामक वीर वानरका वध करनेवाले, 
738 -कालिन्दीकर्षण:यमुनाकी धाराको खींचनेवाले, 
739 -बल:-बलके मूर्तिमान् स्वरूप 

रेवतीरमणः पूर्वभक्तिखेदाच्युताग्रजः । 
देवकीवसुदेवाहकश्यपादितिनन्दनः ॥

740 -रेवतीरमण:-अपनी पत्नी रेवतीके साथ रमण करनेवाले, 
741 -पूर्वभक्तिखेदाच्युताग्रजःपूर्वजन्ममें लक्ष्मणरूपसे भगवान्की निरन्तर सेवा करते-करते थके रहनेके कारण दूसरे जन्ममें भगवान्की इच्छासे उनके ज्येष्ठ बन्धुके रूपमें अवतार लेनेवाले बलरामरूप, 
742 -देवकीवसुदेवाहकश्यपादितिनन्दनः-वसुदेव और देवकोके नामसे प्रसिद्ध महर्षि कश्यप और अदितिको पुत्ररूपसे आनन्द देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण

वार्ष्णेयः सात्वतां श्रेष्ठः शौरियंदुकुलेश्वरः।
 नराकृतिः परं ब्रह्म सव्यसाचिवरप्रदः ॥ 

743-वार्ष्णेयः-वृष्णिकुलमें उत्पन्न, 
744 -सात्वतां श्रेष्ठः-सात्वत कुलमें सर्वश्रेष्ठ, 
745 -शौरिः-शूरसेनके कुलमें अवतीर्ण, 
746 -यदुकुलेश्वरः-यदुकुलके स्वामी,
447 -नराकृतिःमानव-शरीर धारण करनेवाले श्रीकृष्ण, 
748 -परं ब्रह्म-वस्तुतः परमात्मा, 
749 -सव्यसाचिवरप्रदःअर्जनको वर देनेवाले ॥

ब्रह्मादिकाप्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशवः ।
 पूतनाघ्रः शकटभिद्यमलार्जुनभञ्जक:  ।। 

750-ब्रह्मादिकाम्यलालित्यजगदाचर्यशैशव:-ब्रह्मा आदि भी जिन्हें देखनेकी इच्छा रखते हैं तथा जो सम्पूर्ण जगत्को आशयमें डालनेवाली है, ऐसी ललित बाललीलाओंसे युक्त श्रीकृष्ण,
751 - पूतनाघ्रः पूतनाके प्राण लेनेवाले, 
752 -शकटभित्-लातके हलके आपातसे छकड़ेको चकनाचूर कर देनेवाले, 
753-यमलार्जुनभञ्जक:- यमलार्जुन नामसे प्रसिद्ध दो जुड़ये वृक्षोको तोड़ डालनेवाले 

वातासुरारिः केशिनो धेनुकारिगवीश्वरः ।
 दामोदरो गोपदेवो यशोदानन्ददायकः ।।

754 -वातासुरारि:-तृणावर्तके शत्रु,
755- केशिनः-केशी नामक दैत्यको मारनेवाले, 
756 -धेनुकारिः-धेनुकासुरके शत्र, 
757  -गवीश्वरःगौओके स्वामी, 
758 -दामोदरः-उदरमें यशोदा मैयाद्वारा रस्सी बाँधी जानेके कारण दामोदर नाम धारण करनेवाले, 
759 -गोपदेवः-वालोंके इष्टदेव, 
760 -यशोदानन्ददायकः-यशोदा मैयाको आनन्द देनेवाले 

 कालीयमर्दनः सर्वगोपगोपीजनप्रियः । 
लीलागोवर्धनधरो गोविन्दो गोकुलोत्सवः ।। 

761- कालीयमर्दनः-कालिय नागका मान-मर्दन करनेवाले, 
762 -सर्वगोपगोपीजनप्रियः-समस्त गोपों और गोपियोंके प्रियतम, 
763 -लीलागोवर्धनधरः- अनायास ही गोवर्धन पर्वतको अँगुलीपर उठा लेनेवाले, 
764 -गोविन्दः-इन्द्रकी वर्षासे गौओंकी रक्षा करनेके कारण कामधेनुद्वारा 'गोविन्द' पदपर अभिषिक्त भगवान् श्रीकृष्णा, 
765 -गोकुलोत्सवः-गोकुलनिवासियोंको निरन्तर आनन्द प्रदान करनेके कारण उत्सवरूप  

 अरिष्टमथन: कामोन्मत्तगोपीविमुक्तिदः। 
सद्यःकुवलयापीडघाती  चाणूरमर्दनः  ॥ 

766 -अरिष्टमथन:-अरिष्टासुरको नष्ट करनेवाले, 
767 -कामोन्मत्तगोपीविमुक्तिदःप्रेमविभोर गोपीको मुक्ति प्रदान करनेवाले, 
768 -सद्यःकुवलयापीडघाती-कुवलयापीड नामक हाथीको शीघ्र मार गिरानेवाले, 
769 -चाणूरमर्दनःचाणूरनामक मल्लको कुचल डालनेवाले 

कंसारिरुपसेनादिराज्यव्यापारितामरः । 
 सुधर्माङ्किनभूलोकः जरासंधवलान्तकः ॥ 

770 -कंसारि:-मथुराके राजा कंसके शत्रु, 
771 -उग्रसेनादिराज्यव्यापारितामरः-राज्यसम्बन्धी कार्याम उप्रसेन आदिके रूपमें देवताओंको ही नियुक्त करनेवाले, 
772 -सुधर्माङ्किनभूलोकः देवोचित सुधर्मा नामक सभासे भूलोकको भी सुशोभित करनेवाले, 
773 -जरासंधबलान्तकः-जरासंघको सेनाका संहार करनेवाले

त्यक्तभनजरासंधो भीमसेनयशःप्रदः ।
 सांदीपनिमृतापत्यदाता कालान्तकादिजित् ॥ 

774- त्यक्तभनजरासंधः-युद्धसे भगे हुए जरासंधको जीवित छोड़ देनेवाले,
775 -भीमसेनयशःप्रदः-युक्तिसे जरासंघका वध कराकर भीमसेनको यश प्रदान करनेवाले, 
776 -सांदीपनिमृतापत्यदाता-अपने विद्यागुरु सांदीपनिके मरे हुए पुत्रको पुनः ला देनेवाले,
777 -कालान्तकादिजित्-- काल और अन्तक आदिपर विजय पानेवाले 

समस्तनारकत्राता सर्वभूपतिकोटिजित् ।
 रुक्मिणीरमणो रुक्मिशासनो नरकान्तकः ।। 

778 -समस्तनारकत्राता-शरणमे आनेपर नरकमे पड़े हुए समस्त प्राणियोका भी उद्धार करनेवाले, 
779 -सर्वभूपतिकोटिजित्-रुक्मिणीके विवाहमें करोड़ोंकी संख्यामें आये हुए समस्त राजाओंको परास्त करनेवाले.
780 -रुक्मिणीरमण:-रुक्मिणीके साथ रमण करनेवाले, 
781 -रुक्मिशासन:-रुक्मीको दण्ड देनेवाले, 
782 -नरकान्तकः-नरकासुरका विनाश करनेवाले ॥

समस्तसुन्दरीकान्तो मुरारिर्गरुडध्वजः।
 एकाकिजितरुद्रार्कमरुदाद्यखिलेश्वर:  ॥

783-समस्तसुन्दरीकान्तः-समस्त सुन्दरियाँ जिन्हें पानेकी इच्छा करती हैं, 
784 -मुरारि:-मुर नामक दानवके शत्रु, 
785 -गरुडध्वजः-गरुड़के चिह्नसे चिह्नित ध्वजावाले,
786-एकाकिजितरुद्रार्कमरुदाद्यखिलेश्वर:- अकेले ही रुद्र, सूर्य और वायु आदि समस्त लोकपालोको जीतनेवाले 

देवेन्द्रदर्पहा कल्पद्रुमालंकृतभूतलः । 
बाणबाहुसहस्वच्छिन्नन्द्यादिगणकोटिजित्  ॥

787 देवेन्द्रदर्पहा-देवराज इन्द्रका अभिमान चूर्ण करनेवाले, 
788 कल्पद्रुमालंकृतभूतल:कल्पवृक्षको स्वर्गसे लाकर उसके द्वारा भूतलको शोभा बढ़ानेवाले, 
789 बाणबाहुसहस्रच्छित्-बाणासुरकी सहस्र भुजाओंका उच्छेद करनेवाले, 
790 नन्द्यादिगणकोटिजित्-नन्दी आदि करोड़ों शिवगणोंको परास्त करनेवाले 

लीलाजितमहादेवो महादेवैकपूजितः। 
इन्द्रार्थार्जुननिर्भङ्गजयदः पाण्डवैकधक ।।

791 -लीलाजितमहादेवः-अनायास ही महादेवजीपर विजय पानेवाले, 
792-महादेवकपूजितः-महादेवजीके द्वारा एकमात्र पूजित,
793-इन्द्रार्थार्जुननिर्भङ्गजयदः-इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये अर्जुनको अखण्ड विजय प्रदान करनेवाले, 
794 -पाण्डवैकधकृ -पाण्डवोंके एकमात्र रक्षक 

काशिराजशिरश्छेत्ता रुद्रशक्त्येकमर्दनः ।
 विश्वेश्वरप्रसादाढयः काशिराजसुतार्दनः ।।

795 -काशिराजशिरश्छेत्ता-काशिराजका मस्तक काट देनेवाले, 
796 -रुद्रशक्त्येकमर्दनःरुद्रकी शक्तिके एकमात्र मर्दन करनेवाले,
797 -विश्वेश्वरप्रसादाढयः-काशीविश्वनाथकी प्रसन्नता प्राप्त करनेवाले,
798 -काशिराजसुतार्दनः - काशीनरेशके पुत्रको पीड़ा देनेवाले

शम्भुप्रतिज्ञाविध्वंसीकाशीनिर्दग्धनायकः । 
काशीशगणकोटिनो लोकशिक्षाद्विजार्चकः ।। 

799 -शम्भुप्रतिज्ञाविध्वंसी-शङ्करजीको प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, 
800-काशीनिर्दग्धनायकःजिन्होंने काशीको जलाकर अनाथ-सी कर दिया था, वे भगवान् श्रीकृष्ण,
801-काशीशगणकोटिनःकाशीपति विश्वेश्वरके करोड़ों गणोंका नाश करनेवाले
802 -लोकशिक्षाद्विजार्चक:-लोकको शिक्षा देनेके लिये सुदामा आदि ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले 

 शिवतीव्रतपोवश्यः पुराशिववरप्रदः ।
 शङ्करैकप्रतिष्ठाधक्स्वांशशङ्करपूजकः ॥

803-शिवतीव्रतपोवश्य:-शिवजीकी तीव्र तपस्याके वशीभूत होनेवाले, 
804 -पुराशिववरप्रदःपूर्वकालमें शिवजीको वरदान देनेवाले,
805 -शङ्करैकप्रतिष्ठाधृक्-भगवान् शङ्करकी एकमात्र प्रतिष्ठा करनेवाले,
 806-स्वांशशङ्करपूजकःअपने अंशभूत शङ्करकी पूजा करनेवाले 

शिवकन्याव्रतपतिः कृष्णरूपशिवारिहा। 
महालक्ष्मीवपुगौंरीत्राता वैदलवृत्रहा  ।।

807 -शिवकन्याव्रतपतिः-शिवको कन्याके व्रतकी रक्षा करनेवाले, 
808 -कृष्णरूपशिवारिहा कृष्णरूपसे शिवके शत्रु (भस्मासुर) का संहार करनेवाले, 
809 -महालक्ष्मीवपुगौरीत्राता महालक्ष्मीका शरीर धारण करनेवाली पार्वतीके रक्षक, 
810-वैदलवृत्रहा-वैदलवृत्र नामक दैत्यका वध करनेवाले 

 स्वधाममुचुकुन्दैकनिष्कालयवनेष्टकृत् ।
 यमुनापतिरानीतपरिलीनद्विजात्मजः ॥

811 -स्वधाममुचुकुन्दैकनिष्कालयवनेष्टकृत्- अपने तेजःस्वरूप राजा मुचुकुन्दके द्वारा केवल कालयवनका नाश कराकर उन्हें अभीष्ट वरदान देनेवाले,
812 -यमुनापतिः-सूर्यकन्या यमुनाको पत्नीरूपसे ग्रहण करनेवाले, 
813 -आनीतपरिलीनद्विजात्मजः- मरे हुए ब्राह्मण-पुत्रोंको पुनः लानेवाले  

श्रीदामरक्भक्तार्थभूण्यानीतेन्द्रवैभवः । 
 दुर्वत्तशिशुपालैकमुक्तिदो द्वारकेश्वरः ।। 

814- श्रीदामरक्भक्तार्थभूम्यानीतेन्द्रवैभव:अपने दीन भक्त श्रीदामा (सुदामा) के लिये पृथ्वीपर इन्द्रके समान वैभव उपस्थित करनेवाले,
815 -दुर्वत्तशिशुपालैकमुक्तिदः-दुराचारी शिशुपालको एकमात्र मोक्ष प्रदान करनेवाले,
816 -द्वारकेश्वर:-द्वारकाके स्वामी

आचाण्डालादिकप्राप्यद्वारकानिधिकोटिकत् । 
अकूरोद्धवमुख्यैकभक्तः स्वच्छन्दमुक्तिदः ॥ 

817 -आचाण्डालादिकप्राप्यद्वारकानिधिकोटिकृत्-द्वारकामें चाण्डाल आदितकके लिये सुलभ होनेवाली करोड़ों निधियोका संग्रह करनेवाले,
818 -अक्रूरोद्धवमुख्यैकभक्तः- अक्रूर और उद्धव आदि प्रधान भक्तोंके साथ रहनेवाले, 
819 -स्वच्छन्द मुक्तिदः-इच्छानुसार मुक्ति देनेवाले 

 सबालस्त्रीजलक्रीडामृतवापीकृतार्णव: । 
 ब्राह्माखदग्धगर्भस्थपरीक्षिजीवनककृत् ॥

820 -सबालस्त्रीजलक्रीडामृतवापीकृतार्णव:- बालकों और स्त्रियोंके जल-विहार करनेके लिये समुद्रको अमृतमयी बावलीके समान बना देनेवाले, 
821 -ब्रह्मास्वदग्धगर्भस्थपरीक्षिज्जीवनककृत्-अवस्थामाके ब्रह्मास्त्रसे दग्ध हुए गर्भस्थ परीक्षितको एकमात्र जीवन-दान देनेवाले 

परिलीनद्विजसुतानेतार्जुनमदापहः ।
 गूढमुद्राकृतिप्रस्तभीष्माद्यखिलकौरव:  ।। 

822 -परिलीनद्विजसुतानेता-नष्ट हुए ब्राह्मणकुमारोंको पुनः ले आनेवाले,
823-अर्जुनमदापहः-अर्जुनका घमंड दूर करनेवाले, 
824 -गूढमुद्राकृतिप्रस्तभीष्माद्यखिलकौरव:गम्भीर मुद्रावाली आकृति बनाकर भीष्म आदि समस्त कौरवोंको कालका ग्रास बनानेवाले

यथार्थखण्डिताशेषदिव्यास्त्रपार्थमोहहत् ।
 गर्भशापच्छलध्वस्तयादवोर्वीभरापहः ॥

825 -यथार्थखण्डिताशेषदिव्यास्त्रपार्थमोहहत्- समस्त दिव्यास्त्रोंका भलीभाँति खण्डन करनेवाले अर्जुनके मोहको हरनेवाले,
826 -गर्भशापच्छलध्वस्तयादवोर्वीभरापहः- स्त्रीरूप धारण करके गये हुए साम्बके गर्भको मुनियोंद्वारा शाप दिलानेके बहाने पृथ्वीके भारभूत समस्त यादवोका संहार करानेवाले 

जराव्याधारिगतिदः स्मृतमात्राखिलेष्टदः ।
 कामदेवो रतिपतिर्मन्मथः शम्बरान्तकः ।। 

827 -जराव्याधारिगतिदः-शत्रुका काम करनेवाले जरा नामक व्याधको उत्तम गति प्रदान करनेवाले,
828 -स्मृतमात्राखिलेष्टदः-स्मरण करनेमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थोको देनेवाले,
829 -कामदेवः-कामदेवस्वरूप,
830 -रतिपति:रतिके स्वामी, 
831 -मन्मथ:-विचारशक्तिका नाश करनेवाले कामदेवरूप, 
832 -शम्बरान्तकः शम्बरासुरके प्राणहन्ता  

अनङ्गो जितगौरीशो रतिकात्तः सदेप्सितः ।
 पुष्पेषुर्विश्वविजयी स्मरः कामेश्वरीप्रियः ।। 

833 -अनङ्गः-अङ्गरहित, 
834 -जितगौरीशः-गौरीपति शङ्करको भी जीतनेवाले, 
835 -रतिकान्तः–रतिके प्रियतम, 
836 -सदेप्सित:-कामी पुरुषोंको सदा अभीष्ट,
837 -पुष्पेषुः-पुष्पमय बाणवाले.
838 -विश्वविजयीसम्पूर्ण जगत्पर विजय पानेवाले, 
839 -स्मरः-विषयोंके स्मरणमात्रसे मनमें प्रकट हो जानेवाले, 
340 -कामेश्वरीप्रियः- कामेश्वरीरतिके प्रेमी 

ऊषापतिविश्वकेतुर्विश्वतृप्तोऽधिपूरुषः । 
चतुरात्मा चतुर्वृहश्चतुर्युगविधायकः ।।   

841 -ऊषापतिः-बाणासुरकी कन्या ऊषाके स्वामी अनिरुद्धरूप, 
842-विश्वकेतुः-विश्व में विजयपताका फहरानेवाले, 
843-विश्वतृप्तः-सब ओरसे तृप्त
844 -अधिपूरुषः-अन्तर्यामी साक्षी चेतन, 
845 -चतुरात्मा-मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तरूप चार अन्तःकरणवाले, 
846 -चतुष्यूहः- वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इन चार व्यूहोसे युक्त, 
847 -चतुर्युगविधायकः-सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग-इन चार युगोंका विधान करनेवाले ।। 

चतुर्वेदैकविश्वात्मा सर्वोत्कृष्टांशकोटिसूः ।    
आश्रमात्मा पुराणर्षिव्यासः शाखासहस्त्रकृत् ।।   

848-चतुर्वेदैकविश्वात्या-चारों वेदोद्वारा प्रतिपादित एकमात्र सम्पूर्ण विश्वके आत्मा, 
849 -सर्वोत्कृष्टांशकोटिसूः-सबसे श्रेष्ठ कोटि-कोटि अंशोको जन्म देनेवाले,
850 -आश्रमात्माआश्रमधर्मरूप, 
851-पुराणर्षिः-पुराणोंके प्रकाशक ऋषि, 
852 -व्यासः-वेदोंका विस्तार करनेवाले, 
853 -शाखासहस्त्रकृत्-सामवेदको सहल शाखाओंका सम्पादन करनेवाले 

महाभारतनिर्माता कवीन्द्रो बादरायणः ।
 कृष्णद्वैपायनः  सर्वपुरुषार्थैकबोधकः ।।  

854-महाभारतनिर्माता-महाभारत ग्रन्थके रचयिता,
855 -कवीन्द्रः-कवियोंके राजा,
856 -बादरायण:-बदरी-वनमें उत्पन्न भगवान् वेदव्यासरूप, 
857-कृष्णद्वैपायन:-द्वीपमें उत्पन्न श्याम वर्णवाले व्यासजी,
858 -सर्वपुरुषार्थैकबोधकःसमस्त पुरुषार्थोक एकमात्र बोध करानेवाले 

 वेदान्तकर्ता ब्रह्मैकव्यञ्जक: पुरुवंशकृत् । 
बुद्धो ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः  ।। 

859 -वेदान्तकर्ता-वेदान्तसूत्रोंके रचयिता, 
860 -ब्रह्मैकव्यञ्जक:-एक अद्वितीय ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करानेवाले,
 861 -पुरुवंशकृत्  पुरुष  वंश की परम्परा सुरक्षित रखनेवाले, 
862 -बुद्धः-भगवान्के अवतार बुद्धदेव, 
863-ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः-ध्यानके द्वारा समस्त देव-देवियोंको जीतकर जगत्के प्रियतम बननेवाले ।।  

   
निरायुधो जगजैत्रः श्रीधनो दुष्टमोहनः।
 दैत्यवेदबहिष्कर्ता वेदार्थश्रुतिगोपकः ॥ 

864 -निरायुधः-अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करनेवाले, 
865-जगजैत्रः-सम्पूर्ण जगत्को वशमें करनेवाले, 
866 -श्रीधनः-शोभाके धनी, 
867 -दुष्टमोहनः-दुष्टोंको मोहित करनेवाले,
868 -दैत्यवेदबहिष्कर्ता-दैत्योंको वेदसे बहिष्कृत करनेवाले, 
869 -वेदार्थश्रुतिगोपक:-वेदोंके अर्थ और श्रुतियोंको गुप्त रखनेवाले 

शौद्धोदनिर्दृष्टदिष्टः सुखदः सदसस्पतिः ।
 यथायोग्याखिलकृपः सर्वशून्योऽखिलेष्टदः ॥ 

870 -शौद्धोदनिः-कपिलवस्तुके राजा शुद्धोदनके पुत्र,
871 -दृष्टदिष्टः-दैवके विधानको प्रत्यक्ष देखनेवाले, 
872 -सुखदः-सबको सुख देनेवाले, 
873 -सदसस्पतिः-सत्पुरुषोंकी सभाके अध्यक्ष, 
874 - यथायोग्याखिलकृपः-यथायोग्य सम्पूर्ण जीवोंपर कृपा रखनेवाले, 
875 -सर्वशून्यः सम्पूर्ण पदार्थोको शून्यरूप ही माननेवाले,
876 -अखिलेष्टदः-सबको सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ देनेवाले 

चतुष्कोटिपृथक्तत्वप्रज्ञापारमितेश्वरः । 
पाखण्डवेदमार्गेशः पाखण्डश्रुतिगोपकः ।। 

877 -चतुष्कोटिपृथक्-स्थावर आदि चार श्रेणियोंमें विभक्त हुई सृष्टिसे पृथक्,
878 -तत्त्वप्रज्ञापारमितेश्वरः-तत्त्वभूत प्रज्ञापारमिता (बुद्धिको पराकाष्ठा) के ईश्वर, 
879 -पाखण्डवेदमागेंशःपाखण्ड-वेदमार्गके स्वामी, 
880 -पाखण्डश्रुतिगोपकः-पाखण्डके द्वारा प्रतिपादित वेदकी श्रुतियोंके रक्षक

कल्की विष्णुयशःपुत्रः कलिकालविलोपकः । 
समस्तम्लेच्छदुष्टानः सर्वशिष्टद्विजातिकृत् ॥ 

881 -कल्की-कलियुगके अन्तमें होनेवाला भगवान्का एक अवतार, 
882-विष्णुयशःपुत्रःश्रीविष्णुयशाके पुत्र भगवान् कल्कि, 
883-कलिकालविलोपकः-कलियुगका लोप करके सत्ययुगका प्रवेश करानेवाले,
884-समस्तम्लेच्छदुष्टतः-सम्पूर्ण म्लेच्छों और दुष्टोंका वध करनेवाले,
885 -सर्वशिष्टद्विजातिकृत्-सबको श्रेष्ठ द्विज बनानेवाले अथवा समस्त साधु द्विजातियोंके रक्षक 
  
सत्यप्रवर्तको देवद्विजदीर्घक्षुधापहः ।
 अश्ववारादिरेकान्तपृथ्वीदुर्गतिनाशनः ॥

886 -सत्यप्रवर्तकः-सत्ययुगकी प्रवृत्ति करानेवाले,
887 -देवद्विजदीर्घक्षुधापहः-[यज्ञ और ब्राह्मण भोजन आदिका प्रचार करके] देवताओं और ब्राह्मणोंकी बढ़ी हुई भूखको शान्त करनेवाले, 
888-अश्ववारादिः-घुड़सवारोंमें श्रेष्ठ, 
889 -एकान्तपृथ्वीदुर्गतिनाशन:-पृथ्वीकी दुर्गतिका पूर्णतया नाश करनेवाले 

सद्यःक्ष्मानन्तलक्ष्मीकृनष्टनिःशेषधर्मवित् ।
 अनन्तस्वर्णयागैकहेमपूर्णाखिलद्विजः ॥

890 -सद्यःक्ष्मानन्तलक्ष्मीकृत्-पृथ्वीको शीघ्र ही अनन्त लक्ष्मीसे परिपूर्ण करनेवाले,
891-नष्टनिःशेषधर्मवित्-नष्ट हुए सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता,
892 -अनन्तस्वर्णयागैकहेमपूर्णाखिलद्विजःअनन्त सुवर्णकी दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञोका अनुष्ठान कराकर सम्पूर्ण ब्राह्मणोंको स्वर्णसे सम्पन्न करनेवाले

असाध्यैकजगच्छास्ता विश्वबन्धो जयध्वजः । 
आत्मतत्त्वाधिपः कर्तृश्रेष्ठो विधिरुमापतिः   ।। 

893 -असाध्यैकजगच्छास्ता-किसीके वशमें न होनेवाले सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र शासक,
 894-विश्वबन्धः-समस्त विश्वको अपनी मायासे बाँध रखनेवाले,
895 -जयध्वजः-सर्वत्र अपनी विजयपताका फहरानेवाले, 
896 -आत्पतत्त्वाधिपःआत्मतत्त्वके स्वामी,
897-कर्तृश्रेष्ठः-कर्ताओंमें श्रेष्ठ, 
898- विधिः-शास्त्रीय विधिरूप, - 
899 -उमापतिः-उमाके स्वामी 

भर्तृश्रेष्ठः प्रजेशाग्र्यो मरीचिर्जनकापणीः।
कश्यपो देवराडिन्द्रः प्रह्लादो दैत्यराट् शशी ।।   

900 -भर्तृश्रेष्ठः-भरण-पोषण करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, 
901 -प्रजेशायः-प्रजापतियोंमें अप्रगण्य,
902- मरीचिः-मरीचि नामक प्रजापतिरूप, 
903 -जनकाग्रणी:-जन्म देनेवाले प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ, 
904 -कश्यपः-सर्वद्रष्टा कश्यप मुनिस्वरूप, 
905 -देवराट-देवताओंके राजा, 
906- इन्द्रः-परम ऐश्वर्यशाली इन्द्रस्वरूप,
907-प्रहादः-भगवद्भक्तिके प्रभावसे अत्यन्त आहादपूर्ण रानी कयाधूके पुत्ररूप,
908 -दैत्यराट् दैत्योंके स्वामी प्रहादरूप,
909 -शशी-खरगोशका चिह्न धारण करनेवाले चन्द्रमारूप 

 नक्षत्रेशो रविस्तेज:श्रेष्ठः शुक्रः कवीश्वरः।
 महर्षिराडृभृगुर्विष्णुरादित्येशो बलिस्वराट् ।। 

910-नक्षत्रेशः-नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमारूप, 
911 -रविः-सूर्यस्वरूप,
912 -तेजःश्रेष्ठःतेजस्वियोंमें सबसे श्रेष्ठ, 
913 -शुक्रः-भृगुके पुत्र शुक्राचार्यस्वरूप,
914 -कवीश्वरः-कवियोंके स्वामी,
915 महर्षिराट्-महर्षियोंमें अधिक तेजस्वी, 
916 भृगुः-ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति भृगुस्वरूप, 
917-विष्णु:-बारह आदित्योमेसे एक, 
918-आदित्येशः-बारह आदित्योंके स्वामी, 
919 -बलिवराट-बलिको इन्द्र बनानेवाले 

 वायुर्वह्निः शुचिश्रेष्ठः शङ्करो रुद्रराड्गुरू ।
विद्वतमश्चित्ररथो गन्धर्वाग्योऽक्षरोत्तमः ॥ 

920 -वायु:-वायुतत्त्वके अधिष्ठाता देवता, 
921 -वह्नि:-अग्नितत्त्वके अधिष्ठाता देवता, 
922-शुचिश्रेष्ठः-पवित्रोंमें श्रेष्ठ, 
923 -शङ्करः-सबका कल्याण करनेवाले शिवरूप, 
924 -रुद्रराट्-ग्यारह रुद्रोंके स्वामी, 
925 -गुरु:-गुरु नामसे प्रसिद्ध अङ्गिरापुत्र बृहस्पतिरूप, 
926 -विद्वत्तमः-सर्वश्रेष्ठ विद्वान्, 
927 -चित्ररथ:-विचित्र रथवाले गन्धर्वकि राजा, 
928 -गन्धर्वाभ्यः-गन्धर्वोमें अग्रगण्य चित्ररथरूप, 
929 -अक्षरोत्तमः-अक्षरोंमें उत्तम 'ॐ'कारस्वरूप 

वर्णादिरम्यस्त्री गौरी शक्त्यग्याे श्रीश्च नारदः। 
देवर्षिराट्पाण्डवाग्याेऽर्जुनो वादः प्रवादराट् ॥ 

930-वर्णादिः-समस्त अक्षरोके आदिभूत अकारस्वरूप, 
931-अग्र्यस्त्री-त्रियोंमें अप्रगण्य सती पार्वतीरूप, 
932 -गौरी-गौरवर्णा उमारूप, 
933 -शक्त्यग्र्या-भगवान्की अन्तरङ्गा शक्तियोंमें सर्वश्रेष्ठ भगवती लक्ष्मीरूप, 
934 -श्री:-भगवान् विष्णुका आश्रय लेनेवाली लक्ष्मी, 
935 -नारदःसबको ज्ञान देनेवाले देवर्षि नारदरूप,
936 -देवर्षिराट्-देवर्षियोंके राजा, 
937- पाण्डवायःपाण्डवोंमें अपने गुणोंके कारण श्रेष्ठ अर्जुनरूप,
938 -अर्जुन:-अर्जुन नामसे प्रसिद्ध कुन्तीके तृतीय पुत्र, 
939 -वादः-तत्त्वनिर्णयके उद्देश्यसे शुद्ध नीयतके साथ किये जानेवाले शास्वार्थरूप,
940- प्रवादराउत्तम वाद करनेवालोंमें श्रेष्ठ 

 पावनः पावनेशानो वरुणो यादसा पतिः ।
 गङ्गा तीर्थोत्तमो धूतं छलकाम्यं वरौषधम् ॥ 

941 -पावनः-सबको पवित्र करनेवाले, 
942 -पावनेशानः-पावन वस्तुओंके ईश्वर, 
943-वरुणःजलके अधिष्ठाता देवता वरुणरूप,
944- यादसा पतिःजल-जन्तुओके स्वामी, 
945 -गङ्गा-भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई परम पवित्र नदी, जो भूतलमें भागीरथीके नामसे विख्यात एवं भगवद्विभूति है, 
946 -तीर्थोत्तमःतीथोंमें उत्तम गङ्गारूप, 
947 -धूतं -छल करनेवालोंमें द्यूतरूप भगवान्की विभूति, 
948 -छलकागरयं   पराकाष्ठा जूआरूप,
949 -वरौषधम्- जीवनकी रक्षा करनेवाली श्रेष्ठ ओषधि- अत्ररूप

अन्नं सुदर्शनोऽस्वाम्यं वर्त्र प्रहरणोत्तमम्।
उचैःश्रवा वाजिराज ऐरावत इभेश्वरः ।। 

950 -अन्नम्-प्राणियोंकी क्षुधा दूर करनेवाला धरतीसे उत्पन्न खाद्य पदार्थ, 
951 -सुदर्शन:-देखनमें सुन्दर तेजस्वी अस्त्र-सुदर्शनचक्ररूप, 
952 -अस्त्रायम्-समस्त अस्त्रोंमें श्रेष्ठ सुदर्शन, 
953-वज्रम्-इन्द्रके आयुधस्वरूप,
954 -प्रहरणोत्तमम्प्रहार करनेयोग्य आयुधोंमें उत्तम वज्ररूप, 
955 -उचैःश्रवाः-ऊँचे कानोंवाला दिव्य अश्व, जो समुद्रसे उत्पन्न हुआ था, 
956 -वाजिराजः-घोड़ोंके राजा उच्चैःश्रवारूप, 
957 -ऐरावतः-समुद्रसे उत्पन्न इन्द्रका वाहन ऐरावत नामक हाथी, 
958-इभेश्वरः-हाथियोंके राजा ऐरावतस्वरूप ॥

अरुन्धत्येकपत्नीशो हश्वत्थोऽशेषवृक्षराट । 
अध्यात्मविद्या विद्याथ्यः प्रणवश्छन्दसा वरः ॥ 

959 -अरुन्धती-पतिव्रताओंमें श्रेष्ठ अरुन्धतीस्वरूप, 
960 -एकपत्नीश:-पतिव्रता अरुन्धतीके स्वामी महर्षि वसिष्ठरूप, 
961-अश्वस्थ:-पीपलके वृक्षरूप, 
962-अशेषवृक्षराट्-सम्पूर्ण वृक्षोंके राजा अश्वत्थरूप, 
963 -अध्यात्पविद्या-आत्मतत्त्वका बोध करानेवाली ब्रह्मविद्यास्वरूप, 
964 -विद्यायःविद्याओंमें अप्रगण्य प्रणवरूप, 
965 -प्रणवःओंकाररूप,
966 -छन्दसां वरः-वेदोंका आदिभूत ओकार, अथवा मन्त्रोंमें श्रेष्ठ प्रणव

मेरुर्गिरिपतिर्मागों मासायः कालसत्तमः।
 दिनाद्यात्मा पूर्वसिद्धः कपिल: साम वेदराट् ॥

967- मेरु:-मेरु नामक दिव्य पर्वतरूप, 
968 -गिरिपति:-पर्वतोंके स्वामी,
969- मार्ग:-मार्गशीर्ष (अगहन) का महीना, 
970-मासाय:-मासोंमें अग्रगण्य मार्गशीर्षस्वरूप, 
971 -कालसत्तमःसमयों में सर्वश्रेष्ठ-ब्रह्मवेला, 
972 -दिनाद्यात्मा-दिन
और रात्रि दोनोंका सम्मिलित रूप-प्रभात या ब्रह्मवेला,
973 -पूर्वसिद्धः-आदि सिद्ध महर्षि कपिलरूप, 
974 -कपिल:-कपिल वर्णवाले एक मुनि, जो भगवानके अवतार हैं. 
975 -साम-सहस्र शाखाओंसे विशिष्ट सामवेद. 
976 -वेदराट्-वेदोंके राजा सामवेदरूप ।। 

 तार्थ्यः खगेन्द्र  ऋत्वयो वसन्तः कल्पपादपः ।
 दातृश्रेष्ठः कामधेनुरार्तिघ्रायः सुहृत्तमः ।। 

977 -तार्थ्यः-तार्श (कश्यप) ऋषिके पुत्र गरुड़रूप, 
978 -खगेन्द्रः-पक्षियोंके राजा गरुड़, 
979 -ऋत्वयः-ऋतुओंमें श्रेष्ठ वसन्तरूप, 
980-वसत्तः-चैत्र और वैशाख मास,
981-कल्पपादप:-कल्पवृक्षस्वरूप, 
982 -दातृश्रेष्ठःमनोवाञ्छित वस्तु देनेवालोंमें श्रेष्ठ कल्पवृक्ष, 
983 -कामधेनुः-अभीष्ट पूर्ण करनेवाली गोरूप, 
984-आर्तिघ्नायः -पीड़ा दूर करनेवालोमे सर्वश्रेष्ठ, 
985- सुहृत्तमः-परम हितैषी 

 चिन्तामणिगुरुश्रेष्ठो माता हिततमः पिता। 
 सिंहो मृगेन्द्रो नागेन्द्रो वासुकिनूवरो नृपः ।। 

 986-चिन्तामणिः-मनमें चिन्तन की हुई - इच्छाको पूर्ण करनेवाली भगवत्स्वरूप दिव्य मणि, - 
987-गुरुश्रेष्ठः-गुरुओंमें श्रेष्ठ मातारूप, 
988 - माता-जन्म देनेवाली जननी, 
989 -हिततमः- सबसे बड़े हितकारी, 
990 -पिता-जन्मदाता, 
991 - सिंहः-मृगोंके राजा सिंहस्वरूप,  
992- मृगेन्द्रः-समस्त वनके जन्तुओंका स्वामी सिंहरूप, -
993 -नागेन्द्रः-नागोंके राजा, 
994-वासुकि:-नागराज वासुकिरूप,
995-नृवरःमनुष्योंमें श्रेष्ठ, 
996-नृपः-मनुष्योंका पालन - करनेवाले राजारूप  

.वर्णेशो ब्राह्मणश्चेतः करणाग्यमं नमो नमः।
 इत्येतद्वासुदेवस्य विष्णोर्नामसहस्त्रकम् ।। 

997-वर्णेशः-समस्त वर्गों के स्वामी ब्राह्मणरूप, 
998-ब्राह्मण:-ब्राह्मण माता-पितासे उत्पन्न एवं ब्रह्मज्ञानी, 
999-चेतः- परमात्मचिन्तनकी योग्यतावाले चित्तरूप, 
1000 -करणाग्र्यम् - इन्द्रियोंका प्रेरक होनेके कारण उनमें सबसे श्रेष्ठ चित्त-इस प्रकार ये सबके हृदयमें वास करनेवाले भगवान् विष्णुके सहस्त्र नाम हैं। इन सब नामोंको मेरा बारम्बार नमस्कार है 




                           विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र के पाठ  का महत्त्व 



 देवो के देव महादेव पार्वती से कहते है यह विष्णुसहस्रनामस्तोत्र समस्त अपराधोको शान्त करनेवाला, परम उत्तम तथा भगवान में भक्तिको बढ़ानेवाला है। इसका कभी नाश नहीं होता।  इसके सेवनसे सब दुःखोका नाश हो जाता है। यह सब सुखोंको देनेवाला तथा शीघ्र ही परम मोक्ष प्रदान करनेवाला है। काम, क्रोध आदि जितने भी अन्तःकरणके मल हैं. उन सबका इससे शोधन होता है। यह परम शान्तिदायक एवं महापातकी मनुष्योंको भी पवित्र बनानेवाला है। समस्त प्राणियोंको यह शीघ्र ही सब प्रकारके अभीष्ट फल दान करता है। समस्त विनोंकी शान्ति और सम्पूर्ण अरिष्टोंका विनाश करनेवाला है। इसके सेवनसे भयङ्कर दुःख शान्त हो जाते हैं। दुःसह दरिद्रताका नाश हो जाता है तथा तीनों प्रकारके ऋण दूर हो जाते हैं। यह परम गोपनीय तथा धन-धान्य और यशकी वृद्धि करनेवाला है। सब प्रकारके ऐश्वयों, समस्त सिद्धियों और सम्पूर्ण धर्मोको देनेवाला है। इससे कोटि-कोटि तीर्थ, यज्ञ, तप, दान और व्रतोंका फल प्राप्त होता है। सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवृत्ति करानेवाला है। जो राज्यसे भ्रष्ट हो गये हैं, उन्हें यह राज्य दिलाता और रोगियोंके सब रोगोंको हर लेता है। इतना ही नहीं, यह स्तोत्र वन्ध्या स्त्रियोंको पुत्र और रोगसे क्षीण हए परुषोंको तत्काल जीवन देनेवाला है। यह परम पवित्र, मङ्गलमय तथा आयु बढ़ानेवाला है। एक बार भी इसका श्रवण, पठन अथवा जप करनेसे अङ्गसहित सम्पूर्ण वेद, कोटि-कोटि मन्त्र, पुराण, शास्त्र तथा स्मृतियोंका श्रवण और पाठ हो जाता है। प्रिये । जो इसके एक श्लोक, एक चरण अथवा एक अक्षरका भी नित्य जप या पाठ करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथ तत्काल सिद्ध हो जाते हैं।   

                                                                  राधे राधे 







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