;

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की अद्भुत कथा जाने कैसे प्रकट हुए उज्जैन में महाकाल:Know the amazing story of Mahakaleshwar Jyotirlinga, how Mahakal appeared in Ujjain

 Mahakaleshwar-Jyotirlinga
  Mahakaleshwar-Jyotirlinga

 महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग 

भोलेनाथ का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग विश्व प्रसिद्ध धाम है यही पर भगवान श्री कृष्ण ने शिक्षा प्राप्त की थी  महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्प्रदेश के उज्जैन में स्थित है  प्राचीनकाल में यह धाम उज्जयिनी के नामसे विख्यात था महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भक्तों का बहुत ही प्यारा तीर्थ स्थान है और  क्षिप्रा पुण्यदायिनी नदी  महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग धाम की शोभा बढ़ाती है  इसे अवन्तिकापुरी भी कहते थे। यह भारतकी परम पवित्र सप्तपुरियोंमेंसे एक है।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा शिव पुराण में इस प्रकार बतायी गयी है
अवन्ति नामसे प्रसिद्ध एक रमणीय नगरी है, जो समस्त देहधारियों को मोक्ष प्रदान करने वाली है। अवन्ति भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय, परम पुण्यमयी और लोकपावनी है। उज्जैन पुरीमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शुभकर्मपरायण, वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न तथा वैदिक कर्मो के अनुष्ठान में सदा तत्पर रहनेवाले थे। वे घरमें अग्निकी स्थापना करके प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और शिवकी पूजामें सदा तत्पर रहते थे। वे ब्राह्मण देवता प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा किया करते थे। वेदप्रिय नामक वे ब्राह्मण देवतायों की सेवा में लगे रहते थे; इसलिये उन्होंने सम्पूर्ण कर्मों का फल पाकर वह सद्गति प्राप्त कर ली, जो संतोंको ही सुलभ होती है। उनके शिवपूजापरायण चार तेजस्वी पुत्र थे, जो पिता-माता से सद्गुणों में कम नहीं थे। उनके नाम थे- देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और   सुव्रत। उनके सुखदायक गुण वहाँ सदा बढ़ने लगे। उनके कारण अवन्ति-नगरी ब्रह्मतेज से परिपूर्ण हो गयी थी। उसी समय रत्नमाल पर्वतपर दूषण नामक एक धर्मद्वेषी असुरने ब्रह्माजी से वर पाकर वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण किया। अन्तमें उसने सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन)-के ब्राह्मणोंपर भी चढाई कर दी। उसकी आज्ञासे चार भयानक दैत्य चारों दिशाओंमें प्रलयाग्निके समान प्रकट हो गये, परंतु वे शिवविश्वासी ब्राह्मणबन्धु उनसे डरे नहीं। जब नगरके ब्राह्मण बहुत घबरा गये, तब उन्होंने उनको आश्वासन देते हुए कहा-'आपलोग भक्तवत्सल भगवान् शंकरपर भरोसा रखें।' यों कह शिवलिंगका पूजन करके वे भगवान् शिवका ध्यान करने लगे।  इतने में ही सेना सहित दूषण ने आकर -उन ब्राह्मणोंको देखा और कहा-'इन्हें मार डालो, बाँध लो।' वेदप्रियके पुत्र उन ब्राह्मणोंने उस समय उस दैत्यकी कही हुई - वह बात नहीं सुनी; क्योंकि वे भगवान् शम्भु के ध्यानमार्ग में स्थित थे। उस दुष्टात्मा दैत्यने ज्यों ही उन ब्राह्मणोंको मारनेकी " इच्छा की, त्यों ही उनके द्वारा पूजित पार्थिव शिवलिंगके स्थानमें बड़ी भारी - आवाज के साथ एक गड्ढा प्रकट हो गया। उस गड्डेसे तत्काल विकट रूप धारी भगवान् शिव प्रकट हो गये, जो महाकाल नामसे विख्यात हुए। वे दुष्टोंके विनाशक तथा सत्पुरुषोंके आश्रयदाता हैं। उन्होंने उन दैत्योंसे कहा-'अरे खल! मैं तुझ-जैसे दुष्टोंके लिये महाकाल प्रकट हआ हँ। तुम ' इन ब्राह्मणोंके निकटसे दूर भाग जाओ।' ऐसा कहकर महाकाल शंकरने सेनासहित दूषण को अपने हुंकार मात्र से तत्काल भस्म कर दिया। कुछ सेना उनके द्वारा मारी गयी और कुछ भाग खड़ी हुई। परमात्मा शिवने दूषण का वध कर डाला। जैसे सूर्यको देखकर सम्पूर्ण अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् शिवको देखकर उसकी सारी सेना अदृश्य हो गयी। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उन ब्राह्मणोंको आश्वासन दे सुप्रसन्न हुए स्वयं महाकाल महेश्वर शिवने उनसे कहा  "तुमलोग वर माँगो।' उनकी वह बात सुनकर वे सब ब्राह्मण हाथ जोड़ भक्तिभावसे भलीभाँति प्रणाम करके नतमस्तक हो बोले।
 महाकाल ! महादेव ! दुष्टों को दण्ड देनेवाले प्रभो ! शम्भो ! आप हमें संसार सागर से मोक्ष प्रदान करें। शिव ! आप जनसाधारण की रक्षाके लिये सदा यहीं रहें। प्रभो! शम्भो! अपना दर्शन करनेवाले मनुष्योंका आप सदा ही उद्धार करें। सूतजी कहते हैं-महर्षियो! उनके ऐसा कहनेपर उन्हें सद्गति दे भगवान् शिव अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये उस परम सुन्दर गड्डेमें स्थित हो गये। वे ब्राह्मण मोक्ष पा गये और वहाँ चारों ओरकी एक-एक कोस भूमि लिंगरूपी भगवान् शिवका स्थल बन गयी। वे शिव भूतलपर महाकालेश्वरके नामसे विख्यात हुए। ब्राह्मणो! उनका दर्शन करने से स्वज में भी कोई दुःख नहीं होता। जिस-जिस कामना को लेकर कोई उस लिंग की उपासना करता है, उसे वह अपना मनोरथ प्राप्त हो जाता है तथा परलोकमें मोक्ष भी मिल जाता है।    

 महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूसरी कथा  

 प्राचीनकाल में उज्जयिनी में राजा चन्द्रसेन राज्य करते थे। वह परम शिव-भक्त थे। एक दिन श्रीकर नामक एक पाँच वर्षका गोप-बालक अपनी माँके साथ उधरसे गुजर रहा था। राजाका शिवपूजन देखकर उसे बहुत विस्मय और कौतूहल हुआ। वह स्वयं उसी प्रकारकी सामग्रियों से शिवपूजन करनेके लिये लालायित हो उठा। सामग्रीका साधन न जुट पानेपर लौटते समय उसने रास्ते से एक पत्थरका टुकड़ा उठा लिया। घर आकर उसी पत्थरको शिवरूप में स्थापित कर पुष्प, चन्दन आदिसे परम श्रद्धापूर्वक उसकी पूजा करने लगा। माता भोजन करनेके लिये बुलाने आयी, किन्तु वह पूजा छोड़कर उठनेके लिये किसी प्रकार भी तैयार नहीं हुआ। अन्तमें माताने झल्लाकर पत्थरका वह टुकड़ा उठाकर दूर फेंक दिया। इससे बहुत ही दुःखी होकर वह बालक जोर-जोरसे भगवान् शिवको पुकारता हुआ रोने लगा। रोते-रोते अन्तमें बेहोश होकर वह वहीं गिर पड़ा। बालककी अपने प्रति यह भक्ति और प्रेम देखकर आशुतोष भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न हो गये। बालकने ज्यों ही होशमें आकर अपने नेत्र खोले तो उसने देखा कि उसके सामने एक बहुत ही भव्य और अति विशाल स्वर्ण और रत्नोंसे बना हुआ मन्दिर खड़ा है। उस मन्दिर के भीतर एक बहुत ही प्रकाशपूर्ण, भास्वर, तेजस्वी ज्योतिर्लिङ्ग खड़ा है। बच्चा प्रसन्नता और आनन्दसे विभोर होकर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगा। माताको जब यह समाचार मिला तब दौड़कर उसने अपने प्यारे लालको गलेसे लगा लिया। पीछे राजा चन्द्रसेनने भी वहाँ पहुँचकर उस बच्चेकी भक्ति और सिद्धिकी बड़ी सराहना की। धीरे-धीरे वहाँ बड़ी भीड़ जुट गयी। इतनेमें उस स्थानपर हनुमान्जी प्रकट हो गये। उन्होंने कहा-'मनुष्यो! भगवान् शङ्कर शीघ्र फल देनेवाले देवताओंमें सर्वप्रथम हैं। इस बालककी भक्तिसे प्रसन्न होकर उन्होंने इसे ऐसा फल प्रदान किया है, जो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि करोड़ों जन्मों की तपस्यासे भी प्राप्त नहीं कर पाते। इस गोप-बालककी आठवीं पीढ़ी में धर्मात्मा नन्दगोपका जन्म होगा। द्वापर युग में भगवान् विष्णु कृष्णावतार लेकर उनके वहाँ तरह-तरहकी लीलाएँ करेंगे।' हनुमानजी इतना कहकर अन्तर्धान हो गये। उस स्थानपर नियमसे भगवान् शिवकी आराधना करते हुए अन्तमें श्रीकर गोप और राजा चन्द्रसेन शिवधाम को चले गये।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा संपूर्ण 

                                                                                                   राधे राधे 

Post a Comment

0 Comments