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कार्तिक मास की महिमा एवं कृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पूर्व जन्म की:The glory of kartik maas and the former birth of Krishna's wife Satyabhama

कार्तिक मास की महिमा एवं कृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पूर्व जन्म की: The glory of  kartik maas and the former birth of Krishna's wife Satyabhama 

कार्तिक मास की महिमा एवं कथा 

 कार्तिक मास की महिमा एवं कृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पूर्व जन्म की:The glory of  kartik maas and the former birth of Krishna's wife Satyabhama
 कार्तिक मास की महिमा एवं कृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पूर्व जन्म की:The glory of  kartik maas and the former birth of Krishna's wife Satyabhama

श्री राधे 
कार्तिक मास को हिंदू धर्म में बड़ा ही पावन माना गया है कार्तिक मास की प्रशंसा हजारों वर्षों में भी नहीं हो सकती जो व्यक्ति कार्तिक मास में थोड़ा सा भी दान पुण्य करते है वह हजार गुना हो जाता है कार्तिक मास पापों को हरने वाला तथा सुख संपत्ति देने वाला है जो भक्त श्रद्ध भाव के साथ इस मास व्रत उपवास एवं दान पुण्य  करते है वे भगवान् विष्णु के धाम को जाते है  ऐसा पुराणों में कहा गया है 
जो भक्त कार्तिक मास में विष्णु के मंदिर में जागरण करते है मंदिर की साफ सफाई करवाते है एवं वहां दीपदान करते है और तुलसी वन की सेवा करे है वे धन्य है उनका यह जीवन सफल हो जाता है 
 कार्तिक मास में अगर जीव अनजाने में भी थोड़ा सा दान पुण्य करता है तो वह स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है फिर सोचने वाली बात है जो तन मन धन से कार्तिक मास में श्री हरि की पूजा पाठ करता है उसे कितने गुना फल नहीं मिलता होगा और इससे भी सहत्र गुना फल कार्तिक व्रत को करने से मिलता है  
कार्तिक मास के प्रसंग में पद्म पुराण में अनेक कथाएँ है जैसे गुणवती की जिन्होंने कार्तिक मास का व्रत रखा और वो कैसे अगले जन्म में कृष्ण भगवान की पत्नी बनी जो सत्य भामा कहलाई और भी कथाएं मिलती है  जैसे कार्तिक-माहात्म्य के प्रसंग में राजा चोल और विष्णुदास की कथा,पुण्यात्माओं के संसर्ग से पुण्यकी प्राप्तिके प्रसंगमें धनेश्वर ब्राह्मणकी कथा जो कार्तिक मास के महत्व को बताती है 

कार्तिक मास की महिमा एवं सत्यभामा के पूर्व जन्म की कथा 

एक समयकी बात है, देवर्षि नारद कल्पवृक्ष के दिव्य पुष्प लेकर द्वारका में भगवान् श्री कृष्णका दर्शन करने के लिये आये । श्रीकृष्ण ने स्वागत पूर्वक नारदजी का सत्कार करते हुए उन्हें पाद्य-अर्घ्य निवेदन करने के पश्चात् बैठने को आसन दिया। नारदजी ने वे दिव्य पुष्प भगवान को  भेंट कर दिये । भगवान्ने अपनी सोलह हजार रानियों में उन फूलोको बाँट दिया।
एक दिन सत्यभामा ने पूछा-'प्राणनाथ !  मैंने पूर्व जन्म में कौन-सा दान, तप अथवा व्रत किया था, 'जिससे मैं इस जन्म में   आपकी अर्धाङ्गिनी (पत्नी) हुई। भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-प्रिये ! एकाग्रचित्त होकर सुनो-तुम पूर्व जन्म में जो कुछ थीं और जिस पुण्यकारक व्रत का तुमने अनुष्ठान किया था, वह सब मैं बताता हूँ। 

कार्तिक मास की महिमा
सत्ययुग के अन्तमें मायापुरी (हरद्वार) के भीतर अत्रिकुलमें उत्पत्र एक ब्राह्मण रहते थे, जो देवशर्मा नामसे प्रसिद्ध थे। वे वेद-वेदाङ्गों के पारंगत विद्वान्, अतिथिसेवी, अग्रिहोत्रपरायण और सूर्यव्रतके पालनमें तत्पर रहनेवाले थे। प्रतिदिन सूर्यकी आराधना करनेके कारण वे साक्षात् दूसरे सूर्यकी भाँति तेजस्वी जान पड़ते थे। उनकी अवस्था अधिक हो चली थी। ब्राह्मण के कोई पुत्र नहीं था; केवल एक पुत्री थी, जिसका नाम गुणवती था। उन्होंने अपने चन्द्र नामक शिष्य के साथ उसका विवाह कर दिया। वे उस शिष्यको ही पुत्रकी भाँति मानते थे और वह जितेन्द्रिय शिष्य भी उन्हें पिताके ही तुल्य समझता था। एक दिन वे दोनों गुरु-शिष्य कुश और समिधा लानेके लिये गये और   और हिमालय के शाखाभूत पर्वत के वन में इधर-उधर भ्रमण करने लगे; 

कार्तिक मास की महिमा
इतने में ही उन्होंने एक भयङ्कर राक्षस को अपनी ओर आते देखा। उनके सारे अंग भय  से काँपने लगे। वे भागने में भी असमर्थ हो गये। तबतक उस कालरूपी राक्षस ने उन दोनों को मार डाला। उस क्षेत्र के प्रभाव से तथा स्वयं धर्मात्मा होने के कारण उन दोनों को मेरे पार्षदों ने वैकुण्ठ धाम में पहुँचा दिया। उन्होंने जो जीवनभर सूर्यपूजन आदि किया था, उस कर्मसे मैं उनके ऊपर बहुत संतुष्ट था। सूर्य, शिव, गणेश, विष्णु तथा शक्ति के उपासक भी मुझे ही प्राप्त होते हैं। जैसे वर्षा का जल सब ओरसे समुद्र में ही जाता है, उसी प्रकार इन पाँचों के उपासक मेरे ही पास आते हैं। मैं एक ही हूँ, तथापि लीलाके अनुसार भिन्न-भिन्न नाम धारण करके पाँच रूपों में प्रकट हुआ हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे कोई  एक ही व्यक्ति पुत्र-पिता आदि भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। 

कार्तिक मास की महिमा
जब गुणवती ने जब राक्षस के हाथ से उन दोनों के मारे जाने का हाल सुना, तब वह पिता और पति के वियोग-दुःखसे पीड़ित होकर करुण स्वर में विलाप करने लगी-'हा नाथ ! हा तात! आप दोनों मुझे अकेली छोड़कर कहाँ चले गये? मैं अनाथ बालिका आपके बिना अब क्या करूँगी। अब कौन घर में बैठी हुई मुझ कुशलहीन दुःखिनी स्त्रीका भोजन और वस्त्र आदिके द्वारा पालन करेगा। इस प्रकार वारंवार करुणाजनक विलाप करके वह बहुत देरके बाद चुप हुई। गुणवती शुभकर्म करनेवाली थी। उसने घरका सारा सामान बेंचकर अपनी शक्तिके अनुसार पिता और पतिका पारलौकिक कर्म किया।

 कार्तिक मास की महिमा
उसके बाद वह उसी नगरमें निवास करने लगी। शान्तभावसे सत्य-शौच आदि के पालन में तत्पर हो भगवान् विष्णु के भजन में समय बिताने लगी। उसने अपने जीवनभर दो व्रतोंका विधिपूर्वक पालन किया-एक तो एकादशीका उपवास और दूसरा कार्तिक मास का भलीभाँति सेवन । प्रिये ! ये दो व्रत मुझे बहुत ही प्रिय हैं। ये पुण्य उत्पत्र करनेवाले, पुत्र और सम्पत्तिके दाता तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। जो कार्तिक के महीने में सूर्य के तुला राशिपर रहते समय प्रातःकाल स्नान करते हैं, वे महापात की होनेपर भी मुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य कार्तिक में  स्नान , जागरण, दीपदान और तुलसीवनका पालन करते हैं, 

कार्तिक मास की महिमा
वे साक्षात् भगवान् विष्णु के स्वरूप हैं। जो लोग श्री विष्णु मन्दिर में झाड़ देते, स्वस्तिक आदि निवेदन करते और श्रीविष्णुको पूजा करते रहते हैं, वे जीवन्मुक्त हैं। जो कार्तिक में तीन दिन भी इस नियमका पालन करते हैं, वे देवताओंके लिये वन्दनीय हो जाते  फिर जिन लोगों ने जिंदगी भर इस कार्तिक व्रत का अनुष्ठान किया है, उनके लिये तो कहना ही क्या है। इस प्रकार गुणवती प्रतिवर्ष कार्तिकका व्रत किया करती थी। वह श्रीविष्णुको मे नित्य-निरन्तर भक्तिपूर्वक मन लगाये रहती थी। एक समय, जब  जरावस्था से उसके सारे अंग दुर्बल हो गये थे और वह स्वयं भी ज्वरसे पीड़ित थी, किसी तरह धीरे-धीरे चलकर गङ्गाके तटपर स्नान करने के लिये गयी।

कार्तिक मास की महिमा
ज्यों ही उसने जल के भीतर पैर रखा, त्यों ही वह शीत से पीड़ित हो काँपती हुई गिर पड़ी। उस घबराहट की दशा में ही उसने देखा, आकाशसे विमान उतर रहा है, जो शङ्ख,चक्र, गदा और पद्य धारण करनेवाले श्रीविष्णुरूपधारी पार्षदोंसे सुशोभित है और उसमें गरुड़चिह्न से अङ्कित ध्वजा फहरा रही है। विमान के निकट आनेपर वह दिव्यरूप धारण करके उसपर बैठ गयी। उसके लिये चैवर (पखें) डुलाया जाने लगा। मेरे पार्षद उसे वैकुण्ठ ले चले। विमानपर बैठी हुई गुणवती प्रज्वलित अग्निशिखा के समान तेजस्विनी जान पड़ती थी, कार्तिक व्रत के पुण्य से उसे मेरे निकट स्थान मिला।

कार्तिक मास की महिमा
 जब मैं ब्रह्मा आदि देवताओं की प्रार्थना से इस पृथ्वीपर आया, तब मेरे पार्षदगण भी मेरे साथ ही आये। भामिनि ! समस्त यादव मेरे पार्षदगण ही है। ये मेरे समान गुणोंसे शोभा पाने वाले और मेरे प्रियतम है। जो तुम्हारे पिता देवशर्मा थे, वे ही अब सत्राजित हुए हैं। शुभे! चन्द्रशर्मा ही अक्रूर हैं और तुम गुणवती हो। कार्तिकव्रतके पुण्यसे तुमने मेरी प्रसत्रताको बहुत बढ़ाया है। पूर्वजन्म में तुमने मेरे मन्दिर के द्वारपर जो तुलसीकी वाटिका लगा रखी थी, इसी से तुम्हारे आँगन में कल्पवृक्ष शोभा पा रहा है।

कार्तिक मास की महिमा
पर्वकाल में तुमने  जो कार्तिक में दीपदान किया था, उसी के प्रभाव से तुम्हारे घर में यह स्थिर लक्ष्मी प्राप्त हुई है तथा तुमने जो अपने व्रत आदि सब कर्मो को पतिस्वरूप श्री विष्णुको सेवा में निवेदन किया था, इसीलिये तुम मेरी पत्नी हुई हो। जीवन भर जो तुमने  कार्तिक व्रत  का अनुष्ठान किया है, उसके प्रभावसे तुम्हारा मुझ से कभी भी वियोग नहीं होगा। इस प्रकार जो मनुष्य कार्तिक मास में व्रतपरायण होते हैं, वे मेरे समीप आते हैं, जिस प्रकार कि तुम मुझे प्रसन्नता देती हुई यहाँ आयी हो। केवल यज्ञ, दान, तप और व्रत करने वाले मनुष्य कार्तिक व्रत  के पुण्य की एक कला भी नहीं पा सकते है 

कार्तिक मास की कथा संपूर्ण 
कार्तिक मास की महिमा को और विस्तार से जानने के लिए पद्मपुराण को देखे 
हम आशा करते है की आप सब को कार्तिक मास की महिमा एवं  कथा पसंद आई होगी  
                                                                                                                                  राधे राधे  

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