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सोमनाथ धाम की उत्पत्ति कैसे हुई क्षय रोगी व्यक्ति के लिय वरदान है सोमनाथ धाम

 

श्री सोमनाथ धाम 

 धाम  महादेव का विश्व प्रसिद्ध धाम है श्री सोमनाथ धाम  गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्रके किनारे स्थित है जो भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते है श्री सोमनाथ धाम को पुराणों में प्रभास क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता था यहीं भगवान् श्रीकृष्णने जरा नामक व्याधके बाणको निमित्त बनाकर अपनी लीलाका संवरण किया था।श्री सोमनाथ धाम की कथा बड़ी ही प्यारी है जिसको सुनने से क्षय रोग का नाश होता  है साथ ही जीव को पापों से मुक्ति मिलती है श्री सोमनाथ की कहानी का वर्णन शिव पुराण में इस प्रकार बताया गया है    
      
  सोमनाथ धाम की उत्पत्ति कैसे हुई क्षय रोगी व्यक्ति के लिय वरदान है सोमनाथ धाम
   सोमनाथ धाम  
                                
           श्री गणेशाय नमः ॐ नमः शिवाय ॐ सोमनाथ नमः

 श्री सोमनाथ की कथा 

सूत जी ब्राह्मणो! से श्री सोमनाथ की कथा इस प्रकार कहते है की उनके प्राकट्यका प्रसंग अपनी बुद्धिके अनुसार संक्षेपसे ही सुनाऊँगा। तुम सब लोग सुनो। मुने! ज्योतिर्लिंगोंमें सबसे पहले सोमनाथका नाम आता है। अतः पहले उन्हींके  महत्व को  सावधान होकर सुनो। मनीश्वरो! महामना प्रजापति दक्षने अपनी अश्विनी आदि सत्ताईस कन्याओंका विवाह चन्द्रमाके साथ किया था। चन्द्रमाको स्वामीके रूपमें पाकर वे दक्षकन्याएँ विशेष शोभा पाने लगीं तथा चन्द्रमा भी उन्हें पत्नी के रूपमें पाकर निरन्तर सुशोभित होने लगे। उन सब पलियों में भी जो रोहिणी नाम की  पत्नी थी, एकमात्र वही चन्द्रमाको जितनी प्रिय थी, उतनी दूसरी कोई पत्नी कदापि प्रिय नहीं हुई। इससे दूसरी स्त्रियोंको बड़ा दुःख हुआ। वे सब अपने पिताकी शरणमें गयीं। वहाँ जाकर उन्होंने जो भी  दुःख  था. उसे पिताको को बताया  यह  सब सुनकर दक्ष भी दुःखी हो गये और चन्द्रमाके पास आकर शान्ति पूर्वक बोले।
दक्षने कहा-कलानिधे! तुम निर्मल कुलमें उत्पन्न हुए हो। तुम्हारे आश्रयमें रहनेवाली जितनी स्त्रियाँ हैं, उन सबके प्रति तुम्हारे मनमें  भेद-भाव  क्यों है? तुम किसीको अधिक और किसीको कम प्यार क्यों करते हो? अबतक जो किया, सो किया, अब आगे फिर कभी ऐसा विषमतापूर्ण बर्ताव तुम्हें नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे नरक देनेवाला बताया गया है सूतजी कहते हैं-महर्षियो! अपने दामाद चन्द्रमासे स्वयं ऐसी प्रार्थना करके प्रजापति दक्ष घरको चले गये। उन्हें पूर्ण निश्चय हो गया था कि अब फिर आगे ऐसा नहीं होगा। पर चन्द्रमा ने  उनकी बात नहीं मानी वे रोहिणीमें इतने आसक्त हो गये थे कि दूसरी किसी पत्नीका कभी आदर नहीं करते थे। इस बातको सुनकर दक्ष दुःखी हो फिर स्वयं आकर चन्द्रमाको उत्तम नीतिसे समझाने तथा न्यायोचित बर्तावके लिये प्रार्थना करने लगे।
दक्ष बोले-चन्द्रमा! सुनो, मैं पहले अनेक बार तुमसे प्रार्थना कर चुका हूँ। फिर भी तुमने मेरी बात नहीं मानी। इसलिये आज शाप देता हूँ कि तुम्हें क्षयका रोग हो जाय।
सूतजी कहते हैं-दक्षके इतना कहते ही क्षणभरमें चन्द्रमा क्षयरोगसे ग्रस्त हो गये। उनके क्षीण होते ही उस समय सब ओर महान् हाहाकार मच गया। सब देवता और ऋषि कहने लगे कि 'हाय! हाय! अब क्या करना चाहिये, चन्द्रमा कैसे ठीक होंगे?' मुने! इस प्रकार दुःखमें पड़कर वे सब लोग विह्वल हो गये। चन्द्रमाने इन्द्र आदि सब देवताओं तथा ऋषियोंको अपनी अवस्था सूचित की। तब इन्द्र आदि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषि ब्रह्माजीकी शरण में गये। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा देवताओ ! जो हुआ, सो हुआ। अब वह निश्चय ही पलट नहीं सकता। अत: उसके निवारणके लिये मैं तुम्हें एक उत्तम उपाय बताता हूँ। आदरपूर्वक सुनो। चन्द्रमा देवताओंके साथ प्रभास नामक शुभ क्षेत्र में जायँ और वहाँ मृत्युंजय मन्त्र का विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए भगवान् शिवकी आराधना करें। अपने सामने शिवलिंगकी स्थापना करके वहाँ चन्द्रदेव नित्य तपस्या करें। इससे प्रसन्न होकर शिव उन्हें क्षयरहित कर देंगे। तब देवताओं तथा ऋषियोंके कहने से ब्रह्माजी की आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने वहाँ छ: महीने तक निरन्तर तपस्या की, मृत्युंजय मन्त्र से भगवान् वृषभध्वज का पूजन किया। दस करोड़ मन्त्रका जप और मृत्युंजयका ध्यान करते हुए चन्द्रमा वहाँ स्थिरचित्त होकर लगातार खड़े रहे। उन्हें तपस्या करते देख भक्तवत्सल भगवान्  महादेव प्रसन्न हो उनके सामने प्रकट हो गये और अपने भक्त चन्द्रमासे बोले।  महादेव जी ने कहा-चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह वर माँगो! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हें सम्पूर्ण उत्तम वर प्रदान करूंगा।  चन्द्रमा बोले-देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे लिये क्या  असंभव  हो सकता है; फिर भी  प्रभो! शंकर! आप मेरे शरीर के इस क्षय रोग का निवारण कीजिये। मुझसे जो अपराध बन गया हो, उसे क्षमा कीजिये।
 महादेव जी ने कहा-चन्द्रदेव! एक पक्ष में  प्रतिदिन तुम्हारी कला क्षीण हो और दूसरे पक्ष में फिर वह निरन्तर बढ़ती रहे। तदनन्तर चन्द्रमा ने भक्ति भावसे भगवान् शंकरकी स्तुति की। इससे पहले निराकार होते हुए भी वे भगवान् शिव फिर साकार हो गये। देवताओं पर प्रसन्न हो उस क्षेत्रके माहात्म्यको बढ़ाने तथा चन्द्रमाके यश का विस्तार करने के लिये भगवान् शंकर उन्हीं के नामपर वहाँ सोमेश्वर कहलाये और श्री सोमनाथ के नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात हुए। ब्राह्मणो! श्री सोमनाथ का पूजन करनेसे वे उपासक के क्षय तथा कोढ़ आदि रोगोंका नाश कर देते हैं। ये चन्द्रमा धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, जिनके नामसे तीनों लोकोंके स्वामी साक्षात् भगवान् शंकर भूतलको पवित्र करते हुए प्रभास क्षेत्र धाम  में विद्यमान हैं। वहीं सम्पूर्ण देवताओंने सोमकुण्डकी भी स्थापना की है, जिसमें शिव और ब्रह्माका सदा निवास माना जाता है। चन्द्रकुण्ड इस भूतलपर पापनाशन तीर्थके रूपमें प्रसिद्ध है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। क्षय आदि जो असाध्य रोग होते हैं, वे सब उस कुण्डमें छ: मासतक स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जिस फलके उद्देश्यसे इस उत्तम तीर्थका सेवन करता है, उस फलको सर्वथा प्राप्त कर लेता है-इसमें संशय नहीं है।चन्द्रमा नीरोग होकर अपना पुराना कार्य सँभालने लगे। इस प्रकार मैंने श्री सोमनाथ की उत्पत्तिका सारा प्रसंग सुना दिया। मुनीश्वरो! इस तरह सोमेश्वरलिंगका प्रादुर्भाव हुआ है। जो मनुष्य सोमनाथके प्रादुर्भावकी इस कथाको सुनता अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह सम्पूर्ण अभीष्टको पाता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इस सोमनाथ-ज्योतिर्लिङ्गकी महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कन्दपुराणादिमें विस्तारसे बतायी गयी है। चन्द्रमाका एक नाम सोम भी है, उन्होंने भगवान् शिवको ही अपना नाथ–स्वामी मानकर यहाँ तपस्या की थी। अतः इस ज्योतिर्लिङ्गको श्री  सोमनाथ कहा जाता है। इसके दर्शन, पूजन, आराधनसे भक्तोंके जन्म-जन्मान्तरके सारे पातक और दुष्कृत्य विनष्ट हो जाते हैं। वे भगवान् शिव और माता पार्वतीकी अक्षयकृपाका पात्र बन जाते हैं। मोक्षका मार्ग उनके लिये सहज ही सुलभ हो जाता है। उनके लौकिक-पारलौकिक सारे कृत्य स्वयमेव, अनायास सफल हो जाते हैं।

  सोमनाथ कथा संपूर्ण 


                                                                           राधे राधे 




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