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दशाश्वमेध तीर्थ एवं पैशाच तीर्थ : Dashashwamedh Tirtha and Paishach Tirtha

दशाश्वमेध तीर्थ एवं पैशाच तीर्थ : Dashashwamedh Tirtha and Paishach Tirtha
दशाश्वमेध तीर्थ एवं पैशाच तीर्थ


दशाश्वमेध तीर्थ

दशाश्वमेध तीर्थ का महिमा सुनो। उसके श्रवणमात्रसे अश्वमेधयज्ञ के फलकी प्राप्ति होती है। विश्वकर्माके पुत्र महाबली विश्वरूप हुए। विश्वरूपके प्रथम नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्रका नाम भौवन हुआ। महाबाहु भौवन सार्वभौम राजा हुए। उनके पुरोहित कश्यप थे, जो सब प्रकारके ज्ञानमें निपुण थे। एक दिन महाबाहु भौवनने अपने पुरोहितसे पूछा-'मुने! मैं एक ही साथ दस अश्वमेध-यज्ञ करना चाहता हूँ। वह यज्ञ कहाँ करूँ?' कश्यपने प्रयागका नाम लिया और उन-उन स्थानोंपर यज्ञ करनेको बताया, जहाँ श्रेष्ठ द्विजोंने पूर्वकालमें बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। राजाके यज्ञमें बहुत-से ऋषि ऋत्विज हुए। पुरोहितने एक ही साथ दस अश्वमेध-यज्ञ आरम्भ किये, किंतु उनमेंसे एक भी पूर्ण न हुआ। यह देखकर राजाको बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने प्रयाग छोड़कर अन्य स्थानोंमें उन यज्ञोंका आरम्भ किया, किंतु वहाँ भी विन-दोष आ पहुँचे। इस प्रकार अपने यज्ञोंको अपूर्ण देख राजाने पुरोहितसे कहा-'देश और कालके दोषसे अथवा मेरे और आपके दोषसे हमारे दस अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण नहीं हो पाते।  कहकर दुःखी हुए राजा भौवन अपने पुरोहित कश्यपके साथ बृहस्पतिजीके ज्येष्ठ भ्राता संवर्तके पास गये और इस प्रकार बोले-'भगवन् ! मुझे ऐसा कोई उत्तम प्रदेश बतलाइये, जहाँ एक ही साथ आरम्भ किये हुए दस अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण हो जाय।' तब मुनिश्रेष्ठ संवर्तने कुछ कालतक ध्यान करके महाराज भौवनसे कहा-'ब्रह्माजीके पास जाओ। वे ही उत्तम प्रदेश बतायेंगे।'महाबुद्धिमान् भौवन महात्मा कश्यपको साथ ले मेरे पास आ पहुँचे और मुझसे भी उत्तम देश | आदिके विषयमें प्रश्न करने लगे। उस समय मैंने भौवन और कश्यपसे कहा-'राजेन्द्र! तुम गोदावरीके तटपर जाओ। वही यज्ञके लिये पुण्यवान् प्रदेश है। वेदोंके पारगामी विद्वान् ये महर्षि कश्यप ही श्रेष्ठ गुरु हैं। इनकी कृपा और गौतमी गङ्गाके प्रसादसे एक ही अश्वमेधसे अथवा वहाँ सान करनेमात्रसे तुम्हारे दस अश्वमेध-यज्ञ सिद्ध हो जायेंगे।' यह सुनकर राजा भौवन कश्यपजीके | साथ गौतमीके तटपर आये और वहाँ अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ग्रहण की। वह महायज्ञ आरम्भ होकर जब पूर्ण हो गया, तब राजा इस पृथ्वीका | दान करनेको उद्यत हुए। उसी समय आकाशवाणी हुई-'राजन्! तुमने पुरोहित कश्यपजीको पर्वत,वन | और कानोंसहित पृथ्वी देनेकी कामना करके | सब कुछ दान कर दिया। अब भूमिदानकी अभिलाषा छोड़कर अत्रदान करो। वह महान् फल देनेवाला है। तीनों लोकोमें अन्नदानके समान दूसरा पुण्यकार्य नहीं है। विशेषतः गङ्गाजीके तटपर श्रद्धाके साथ किये हुए अन्नदानकी महिमा अकथनीय है। तुमने जो प्रचुर दक्षिणासे युक्त यह अश्वमेधयज किया है, इससे तुम कृतार्थ हो गये। अब इस विषयमें तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। तिल, गौ, धन, धान्य-जो कुछ भी गोदावरोके |तटपर दिया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है। यह सुनकर सम्राट् भौवनने ब्राह्मणोंको बहुतसा अत्रदान किया। तबसे वह तीर्थ दशाश्वमेधिकके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान करनेसे दस | अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। 

पैशाच तीर्थ 

उससे आगे पैशाचतीर्थ है, जो ब्रह्मवादी महर्षियोंद्वारा सम्मानित है। यह गोदावरीके दक्षिणतटपर स्थित है। अब मैं उसका स्वरूप बतलाता हूँ, सुनो। मुनिश्रेष्ठ नारद! ब्रह्मगिरिके पार्श्वभागमें अंजना  नामसे प्रसिद्ध एक पर्वत है। वहाँ एक सुन्दरी अप्सरा शापभ्रष्ट होकर उत्पन्न हुई। उसका नाम अंजना था। उसके सब अंग  बहुत सुन्दर थे, किंतु मुंह वानरीका था। केसरी नामक श्रेष्ठ वानर अंजना के पति थे। केसरीके एक दूसरी भी स्त्री थी, जिसका नाम अद्रिका था। वह भी शापभ्रष्ट अप्सरा ही थी। उसके भी सब अंग  सुन्दर थे। किंतु मुँह बिल्ली के समान था। अद्रिका भी अञ्जन पर्वतपर ही रहती थी। एक समय केसरी दक्षिणसमुद्रके तटपर गये थे। इसी बीचमें महर्षि अगस्त्य अञ्जन पर्वतपर आये। अंजना और अद्रिका दोनोंने महर्षिका यथोचित पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर महर्षिने कहा-'तुम दोनों वर माँगो।' वे बोलीं-'मुनीश्वर! हमें ऐसे पुत्र दीजिये, जो सबसे बलवान्, श्रेष्ठ और सब लोगोंका उपकार करनेवाले हों।"तथास्तु' कहकर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य दक्षिण दिशामें चले गये। कुछ कालके बाद अंजना ने वायुके अंशसे हनुमान्जी को जन्म दिया और अद्रिका के गर्भ से निर्ऋतिके अंशसे पिशाचौंका राजा अद्रि उत्पन्न हुआ। इसके बाद उन दोनों ने उक्त देवताओंसे कहा-'हमें मुनिके वरदानसे पुत्र तो प्राप्त हुए, किंतु इन्द्रके शापसे हमारा मुख कुरूप होनेके कारण सारा शरीर ही विकृत हो गया है। इसे दूर करनेके लिये हम क्या उपाय करें-इसे आप दोनों बतायें।' तब भगवान् वायु और नितिने कहा-'गोदावरीमें स्नान और दान करनेसे तुम्हें शापसे छुटकारा मिल जायगा।' यों कहकर वे दोनों वहीं अन्तर्धान हो गये। तब पिशाचरूपधारी अद्रिने अपने भाई हनुमान जी  को प्रसत्र करनेके लिये माता अंजना को लाकर गोदावरीमें नहलाया। इसी प्रकार हनुमानजी भी अद्रिकाको | लेकर बड़ी उतावलीके साथ गौतमी गङ्गाके | तटपर आये। तबसे वह पैशाच और अंजना तीर्थके नामसे विख्यात हुआ।वह समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला शुभ तीर्थ है। 

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