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कपोततीर्थ जिसे कबूतर तीर्थ भी कह सकते हैं Kapot Teerth which can also be called Pigeon Teerth

कपोततीर्थ जिसे कबूतर तीर्थ भी कह सकते हैं Kapot Teerth which can also be called Pigeon Teerth

कपोततीर्थ जिसे कबूतर तीर्थ भी कह सकते हैं Kapot Teerth which can also be called Pigeon Teerth
कपोततीर्थ जिसे कबूतर तीर्थ भी कह सकते हैं Kapot Teerth which can also be called Pigeon Teerth

कपोततीर्थ 

गोदावरी गौतमी गंगा का उत्तर में परम उत्तम कपोततीर्थ भी है,जिसे कबूतर तीर्थ भी कह सकते हैं जिसकी महिमा तीनों लोकों में प्रसिद्धि है।एक पतिव्रता पत्नी स्त्री कबूतरी और कपोत कबूतर कैसे एक व्याध ( शिकारी ) को भी पुण्यवान् बना देते है ब्रह्मा नारद से कहते है  मैं उस तीर्थका स्वरूप और महान् फल बतलाता हूँ, सुनो। ब्रह्मगिरिपर एक बड़ा भयंकर व्याध ( शिकारी ) रहता था। वह ब्राह्मणों, साधुओं, यतियों, गौओं, पक्षियों तथा मृगोंकी हत्या किया करता था। वह पापी  बड़ा ही क्रोधी और असत्यवादी था। उसके हाथ में सदा पाश और धनुष मौजूद रहते थे। उस महापापी शिकारी के मन में सदा पाप के ही विचार उठते थे। उसकी स्त्री और पुत्र भी उसी स्वभावके थे। एक दिन अपनी पत्नी की कहने  से वह घने जंगल में घुस गया।

कपोततीर्थ 
वहाँ उस पापीने अनेक प्रकारके मृगों और पक्षियों का वध किया। कितनोंको जीवित ही पकड़कर पिंजड़ेमें डाल दिया। इस प्रकार बहुत दूरतक घूम-फिरकर वह अपने घरकी ओर लौटा। तीसरे पहरका समय था। चैत्र और वैशाख बीत चुके थे। और तभी  आकाशमें मेघोंकी घटा छा गयी। हवा चली और पानी के साथ पत्थरोंकी वर्षा होने लगी। मूसलाधार वर्षा होनेके कारण बड़ी भयंकर अवस्था हो गयी। शिकारी राह चलते-चलते थक गया था। जलकी अधिकता के कारण मार्गका ज्ञान नहीं हो पाता था। जल, थल और गड्ढेकी पहचान असम्भव हो गयी थी। उस समय वह पापी सोचने लगा, 'कहाँ जाऊँ, कहाँ ठहरूँ, क्या करूँ? मैं यमराज की तरह  सब प्राणियों के प्राण लिया करता हूँ। आज मेरा भी प्राणान्त कर देनेवाली पत्थरोंकी वृष्टि हो रही है। 

कपोततीर्थ 
आसपास कोई ऐसी शिला अथवा वृक्ष नहीं दिखलायी देता, जहाँ मेरी रक्षा हो सके।' । इस प्रकार भाँति-भाँतिकी चिन्तामें पड़े हुए शिकारी ने थोड़ी ही दूरपर एक उत्तम वृक्ष देखा,  वह उसीकी छायामें आकर बैठ गया। उसके सब कपड़े  भीग गये थे। वह इस चिन्तामें पड़ा था कि मेरे स्त्री-बच्चे जीवित होंगे या नहीं। इसी समय सूर्यास्त भी हो गया। उसी वृक्षपर एक कबूतर अपनी स्त्री और पुत्र-पौत्रके साथ रहता था। वह वहाँ सुखसे निर्भय होकर पूर्ण तृप्त और प्रसन्न था। उस वृक्षपर रहते हुए उसके कई वर्ष बीत चुके थे। उसकी स्त्री कबूतरी बड़ी पतिव्रता थी। वह अपने पतिके साथ उस वृक्षके खोखलेमें रहा करती थी। वहाँ हवा और पानीसे पूरा बचाव था। 

कपोततीर्थ 
उस दिन दैववश कपोत और कपोती दोनों ही चारा चुगने के लिये गये थे, किंतु केवल कपोत ही लौटकर उस वृक्षपर आया। भाग्यवश कपोती भी वहीं व्याध के पिंजड़ेमें पड़ी थी। व्याधने उसे पकड़ लिया था, परंतु अभीतक उसके प्राण नहीं गये थे। कपोत अपनी संतानों को मातृहीन देखकर चिन्तित हुआ। भयानक वर्षा हो रही थी। सूर्य डूब चुका था, फिर भी वह वृक्षका खोखला कपोती से खाली ही रह गया-यह विचारकर कपोत विलाप करने लगा। उसे इस बातका पता नहीं था कि कपोती यहीं पिंजड़ेमें बंधी पड़ी है। कपोतने अपनी प्रिया के गुणोंका वर्णन आरम्भ किया-'हाय! मेरे हर्षको बढ़ानेवाली कल्याणमयी कपोती न जाने क्यों अभीतक नहीं आयी। 

कपोततीर्थ 
वही मेरे धर्मकी जननी है-उसके सहयोगसे ही मैं धर्मका सम्पादन कर पाता हूँ। मेरे इस शरीरको स्वामिनी भी वही है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिमें वही सर्वदा मेरी सहायता करती है। मुझे प्रसन्न देखकर वह हँसती है और खिन जानकर मेरे दुःखोंका निवारण करती है। उचित सलाह देनेमें वह मेरी सखी हैऔर सदा मेरी आज्ञाके ही पालनमें संलग्न रहती है। -सूर्य अस्त हो गया तो भी वह कल्याणी अभीतक नहीं आयी। वह पतिके सिवा दूसरा कोई व्रत, मन्त्र, देवता, धर्म अथवा अर्थ नहीं जानती। वह पतिव्रता है। पतिमें ही उसके प्राण बसते हैं। पति ही उसका मन्त्र और पति ही उसका प्रियतम है। मेरी कल्याणमयी भार्या अभीतक नहीं आयी। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? 

कपोततीर्थ 
मेरा यह घर उसके बिना आज जङ्गल-सा दिखायी देता है। उसके रहनेपर भयंकर स्थान भी शोभासम्पत्र और सुन्दर दिखायी देता है। जिसके रहनेपर यह घर वास्तवमें घर कहलाता है, वह मेरी प्रिय भार्या अबतक नहीं - आयी। मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकूँगा। अपने प्रिय शरीरको भी त्याग दूँगा। किंतु ये यले क्या करेंगे। ओह! आज मेरा धर्म लुप्त हो गया है।' इस प्रकार विलाप करते हुए स्वामीके वचन सुनकर पिंजड़ेमें पड़ी हुई कपोती बोली-'खगश्रेष्ठ! मैं यहाँ पिंजड़ेमें बंधी हुई बेबस हो गयी हूँ। महामते! यह शिकारी मुझे जालमें फँसाकर ले आया है। आज मैं धन्य हूँ और अनुगृहीत हूँ। क्योंकि पतिदेव मेरे गुणोंका बखान करते हैं। | मुझमें जो गुण हैं और जो नहीं हैं, उन सबका मेरे पतिदेव गान कर रहे हैं। इससे मैं निस्संदेह कृतार्थ हो गयी। 

कपोततीर्थ 
पतिके संतुष्ट होनेपर स्त्रियोंपर | सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं। इसके विपरीत यदि पति असंतुष्ट हो तो स्त्रियोंका अवश्य नाश हो जाता है। प्राणनाथ! तुम्हीं मेरे देवता, तुम्ही प्रभु, तुम्ही सुहृद्, तुम्ही शरण, तुम्हीं व्रत, तुम्ही स्वर्ग, तुम्ही परब्रह्म और तुम्ही मोक्ष हो। आर्य! मेरे लिये चिन्ता न करो। अपनी बुद्धिको धर्ममें स्थिर करो। तुम्हारी कृपासे मैंने बहुतेरै भोग भोग लिये हैं।' अपनी प्रिया कपोतीका यह वचन सुनकर कपोत उस वृक्षसे उतर आया और पिंजड़ेमें पड़ी हुई कपोतीके पास गया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा, मेरी प्रिया जीवित है और व्याध मृतककी भाँति निश्चेष्ट हो रहा है। तब उसने उसे बन्धनसे छुड़ानेका विचार किया। कपोतीने रोकते हुए कहा-'महाभाग! संसारका सम्बन्ध स्थिर रहनेवाला नहीं है,

कपोततीर्थ 
ऐसा जानकर मुझे बन्धनसे मुक्त न करो। इसमें मुझे शिकारी का अपराध नहीं जान पड़ता। तुम अपनी धर्ममयी बुद्धिको दृढ़ करो। ब्राह्मणों के गुरु अग्नि हैं। सब वर्गों का गुरु ब्राह्मण है। स्त्रियोंका गुरु उसका पति है और सब लोगोंका गुरु अभ्यागत है। जो लोग अपने घरपर आये हुए अतिथिको वचनोंद्वारा संतुष्ट करते हैं, उनके उन वचनोंसे वाणी की अधीश्वरी सरस्वती देवी तृप्त होती हैं। अतिथिको अन्न देनेसे इन्द्र तृप्त होते हैं। उसके पैर धोनेसे पितर, उसके भोजन करनेसे प्रजापति, उसकी | सेवा-पूजासे लक्ष्मीसहित श्रीविष्णु तथा उसके सुखपूर्वक शयन करनेपर सम्पूर्ण देवता तृप्त होते हैं। | अत: अतिथि सबके लिये परम पूजनीय है। यदि सूर्यास्तके बाद थका-माँदा अतिथि घरपर आ जाय तो उसे देवता समझे क्योंकि वह सब यज्ञोंका फलरूप है। 

कपोततीर्थ 
थके हुए अतिथिके साथ गृहस्थके घरपर सम्पूर्ण देवता, पितर और अग्नि भी पधारते हैं। यदि अतिथि तृप्त हुआ तो उन्हें भी बड़ी प्रसन्नता | होती है और यदि वह निराश होकर चला गया तो वे भी निराश होकर ही लौटते हैं। अत: प्राणनाथ!  आप सर्वथा दुःख छोड़कर शान्ति धारण कीजिये और अपनी बुद्धिको शुभमें लगाकर धर्मका सम्पादन कीजिये। दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकार और अपकार दोनों ही साधु पुरुषोंके विचारसे श्रेष्ठ हैं। उपकार करनेवालोंपर तो सभी उपकार करते हैं। अपकार करनेवालोंके साथ जो अच्छा बर्ताव करे, वही पुण्यका भागी बताया गया हैकपोत बोला-सुमुखि! तुमने हम दोनोंके योग्य ही उत्तम बात कही है; किंतु इस विषयमें मुझे कुछ और भी कहना है, उसे सुनो। कोई एक हजार प्राणियोंका भरण-पोषण करता है। 

कपोततीर्थ 
दूसरा दसका ही निर्वाह करता है और कोई ऐसा है, जो सुखपूर्वक केवल अपनी जीविकाका काम चला लेता है; किंतु हमलोग ऐसे जीवोंमें से हैं, जो अपना ही पेट बड़े कष्टसे भर पाते हैं। कुछ लोग खाई खोदकर उसमें अन भरकर रखते हैं। कुछ लोग कोठेभर धानके धनी होते हैं और कितने ही घड़ोंमें धान भरकर रखते हैं; परंतु हमारे पास तो उतना ही संग्रह होता है, जितना अपनी चोंचमें आ जाय। शुभे! तुम्हीं बताओ, ऐसी दशामें इस थके-माँद  अतिथिका आदर-सत्कार मैं किस प्रकार करूं? कपोतीने कहा-नाथ! अग्नि, जल, मीठी वाणी, तृण और काष्ठ आदि जो भी सम्भव हो, वह अतिथिको देना चाहिये। यहशिकारी सर्दीसे कष्ट पा रहा है। अपनी प्यारी स्त्रीका कथन सुनकर पक्षिराज कपोत ने पेड़पर चढ़कर सब ओर देखा तो कुछ दूरीपर उसे आग दिखायी दी। 

कपोततीर्थ 
वहाँ जाकर वह चोंचसे एक जलती हुई लकड़ी उठा लाया और व्याधके आगे रखकर अग्निको प्रज्वलित किया; फिर सूखे काठ, पत्ते और तिनके बार-बार आगमें डालने लगा। आग प्रज्वलित हो उठी। उसे देखकर सर्दीसे दुःखी व्याधने अपने जडवत् बने हुए अङ्गोंको तपाया। इससे उसको बड़ा आराम मिला। कपोतीने देखा व्याध क्षुधाकी आगमें जल रहा है, तब उसने अपने स्वामीसे कहा-'महाभाग! मुझे आगमें डाल दीजिये। मैं अपने शरीरसे इस दुःखी व्याधको तृप्त करूँगी। सुव्रत ! ऐसा करनेसे तुम अतिथि-सत्कार करनेवाले पुण्यात्माओंके लोकमें जाओगे।'कपोत बोला-शुभे। मेरे जीते-जी यह तुम्हारा धर्म नहीं है। मुझे ही आज्ञा दो। मैं ही आज अतिथि-यज्ञ करूँगा। 

कपोततीर्थ 
यों कहकर कपोतने सबको शरण देनेवाले भक्तवत्सल विश्वरूप चतुर्भुज महाविष्णुका स्मरण करते हुए अनिकी तीन बार परिक्रमा की; फिर व्याधसे यह कहते हुए अग्निमें प्रवेश किया कि 'मुझे सुखपूर्वक उपयोगमें लाओ।' कपोतने अपने जीवनको अग्निमें होम दिया, यह देख व्याध कहने लगा-'अहो! मेरे इस मनुष्यशरीरका जीवन धिक्कार देने योग्य है, क्योंकि मेरे ही लिये पक्षिराजने यह साहसपूर्ण कार्य | किया है।' यों कहते हुए व्याधसे कपोतीने कहा-'महाभाग! अब मुझे छोड़ दो। देखो, मेरे ये पतिदेव मुझसे दूर चले जा रहे हैं।' उसकी बात सुनकर व्याध सहम गया और तुरंत ही पिंजड़े में पड़ी हुई कपोतीको उसने छोड़ कहा-'महाभाग! मुझे आगमें डाल दीजिये। मैं अपने शरीरसे इस दुःखी व्याधको तृप्त करूँगी। सुव्रत  ऐसा करनेसे तुम अतिथि-सत्कार करनेवाले पुण्यात्माओंके लोकमें जाओगे।

कपोततीर्थ 
'कपोत बोला-शुभे। मेरे जीते-जी यह तुम्हारा धर्म नहीं है। मुझे ही आज्ञा दो। मैं ही आज अतिथि-यज्ञ करूँगा।यों कहकर कपोतने सबको शरण देनेवाले भक्तवत्सल विश्वरूप चतुर्भुज महाविष्णुका स्मरण करते हुए अनिकी तीन बार परिक्रमा की; फिर व्याधसे यह कहते हुए अग्निमें प्रवेश किया कि 'मुझे सुखपूर्वक उपयोगमें लाओ।' कपोतने अपने जीवनको अग्निमें होम दिया, यह देख व्याध कहने लगा-'अहो! मेरे इस मनुष्यशरीरका जीवन धिक्कार देने योग्य है, क्योंकि मेरे ही लिये पक्षिराजने यह साहसपूर्ण कार्य | किया है।' यों कहते हुए व्याधसे कपोतीने कहा-'महाभाग! अब मुझे छोड़ दो। देखो, मेरे ये पतिदेव मुझसे दूर चले जा रहे हैं।' उसकी बात सुनकर व्याध सहम गया और तुरंत ही पिंजड़े में पड़ी हुई कपोतीको उसने छोड़ दिया। 

कपोततीर्थ 
तब उसने भी पति और अग्निकी परिक्रमा | करके कहा- स्वामी के साथ चितामें प्रवेश करना स्त्रियोंके लिये बहुत बड़ा धर्म है। वेदमें इस मार्गका विधान है और लोकमें भी सबने इसकी प्रशंसा की है। जैसे साँप पकड़नेवाला | मनुष्य साँपको बिलसे बलपूर्वक निकाल लेता है,उसी प्रकार पतिका अनुगमन करनेवाली नारी पतिके साथ ही स्वर्गलोकमें जाती है।''यों कहकर कपोतीने पृथ्वी, देवता, गङ्गा तथा वनस्पतियोंको नमस्कार किया और अपने बच्चोंको सान्त्वना देकर व्याधसे कहा-'महाभाग! तुम्हारी ही कृपासे मेरे लिये ऐसा शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। मैं पतिके साथ स्वर्गलोकमें जाती हूँ।' यों कहकर वह पतिव्रता कपोती आगमें प्रवेश कर गयी। 

कपोततीर्थ 
इसी समय आकाशमें जय-जयकारकी ध्वनि गूंज उठी। तत्काल ही सूर्यके समान तेजस्वी अत्यन्त सुन्दर विमान उतर आया। दोनों दम्पति देवताके समान दिव्य शरीर धारण करके उसपर आरूढ़ हुए और आश्चर्यमें पड़े हुए व्याधसे प्रसन्न होकर बोले-'महामते! हम देवलोकमें जाते हैं और तुम्हारी आज्ञा चाहते हैं। तुम अतिथिके रूपमें हम दोनोंके लिये स्वर्गकी सीढ़ी बनकर आ गये। तुम्हें नमस्कार है।' उन दोनोंको श्रेष्ठ विमानपर बैठे देख शिकारी ने अपना धनुष और पिंजड़ा फेंक दिया और हाथ जोड़कर कहा-'महाभाग! मेरा त्याग न करो। मैं अज्ञानी हूँ। मुझे भी कुछ दो। मैं तुम्हारे लिये आदरणीय अतिथि होकर आया था, इसलिये मेरे उद्धारका उपाय बतलाओ।'

कपोततीर्थ 
उन दोनोंने कहा-व्याध! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भगवती गोदावरीके तटपर जाओ और उन्हींको अपना पाप भेंट कर दो। वहाँ पंद्रह दिनोंतक डुबकी लगानेसे तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे। पापमुक्त होनेपर जब पुनः गौतमी गङ्गामें स्रान करोगे, तब अश्वमेध-यज्ञका फल पाकर अत्यन्त पुण्यवान् हो जाओगे। नदियोंमें श्रेष्ठ गोदावरी ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजीके अंशसे प्रकट हुई हैं। उनके भीतर पुनः गोते लगाकर जब तुम अपने मलिन शरीरको त्याग दोगे, तब निश्चय ही श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकमें पहुँच जाओगे। उन दोनोंकी बात सुनकर व्याधने वैसा ही किया, फिर वह भी दिव्य रूप धारण करके एक श्रेष्ठ विमानपर जा बैठा। कपोत, कपोती और व्याध-तीनों ही गौतमी गङ्गाके प्रभावसे स्वर्गमें चले गये। तभीसे वह स्थान कपोततीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान, दान, पितरोंकी पूजा, | जप और यज्ञ आदि कर्म करनेपर वे अक्षय फलको देनेवाले होते हैं।
कपोततीर्थ की कथा संपूर्ण 
                                                                                                                 राधे राधे 

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