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अशून्य शयन व्रत की विधि ashoony shayan Fasting method


अशून्य शयन व्रत की विधि ashoony shayan Fasting method

अशून्य शयन व्रत की विधि 

अशून्य शयन व्रत की विधि ashoony shayan Fasting method
अशून्य शयन व्रत की विधि ashoony shayan Fasting method

अशून्य शयन व्रत को विधि पूर्वक करने से स्त्री विधवा नहीं होती और स्त्री-पुरुष का परस्पर वियोग भी नहीं होता। इसे  फलद्वितीया भी कहते 
हैं क्षीरसागर मे लक्ष्मी के साथ भगवान् विष्णु के शयन करने के समय यह व्रत होता है। भविष्य पुराण में इस व्रत विधि इस प्रकार बताई गई है श्रावण मास के कृष्णपक्ष की द्वितीया के दिन व्रतीय लोगों को सुबह से जल्दी उठकर नहा धोकर लक्ष्मी के साथ श्रीवत्सधारी भगवान् श्री विष्णुका पूजनकर हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये

श्रीवत्सधारिन् श्रीकान्त श्रीवत्स श्रीपतेऽव्यय  

गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम्  
गावश्च मा प्रणश्यन्तु मा प्रणश्यन्तु मे जनाः  
जामयो मा प्रणश्यन्तु पत्तो दाम्पत्यभेदतः 
लक्ष्या वियुज्येऽहं देव न कदाचिद्यथा भवान्  
 तथा कलत्रसम्बन्यो देव मा में विपुज्यताम्  
लक्ष्म्या न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा   
शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा तु मयुसूदन  

अर्थात  हे श्रीवास-चिह्नको धारण करनेवाले लक्ष्मी के स्वामी शाश्वत भगवान् विष्णु ! धर्म, अर्थ और काम को पूर्ण करने वाला मेरा गृहस्थ-आश्रम कभी नष्ट न हो। मेरी  गौएँ भी नष्ट न हो न कभी मेरे परिवार के लोग कष्टमे पड़े एवं न नष्ट हो । मेरे घरकी स्त्रियाँ भी कभी विपत्तियों में न पड़े और हम पति पत्नी में कभी मतभेद उत्पन्न न हो। हे देव ! मैं लक्ष्मीसे कभी वियुक्त न होऊ और पत्नीसे भी कभी मुझे वियोगको प्राप्ति न हो। प्रभो ! जैसे आपकी  शय्या कभी लक्ष्मीसे शून्य नहीं होती, उसी प्रकार मेरी शय्या भी कभी शोभारहित एवं लक्ष्मी तथा  पत्नी से  सूनी  न  हो।
इस प्रकार विष्णुकी प्रार्थना करके व्रत करना चाहिये। जो.
फल भगवान को  प्रिय हैं, उन्हें भगवान की  शय्यापर समर्पित करना चाहिये भगवान् विष्णुको खजूर, नारिल केला , मातुला अर्थात् बिजौरा आदि मधुर फलोंको समर्पित करना चाहिये। भगवान् मधुर फलोंसे प्रसन्न होते हैं।और कड़वे-कच्चे तथा खट्टे फल उनकी सेवामें नहीं चढ़ाने चाहिये। रात्रि के समय श्रीविष्णुकी पूजा करके स्वयं भी उन्हीं फलोको खाकर दूसरे दिन ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये।
दक्षिणा में 
ब्राह्मणों को  मधुर फल, वस्त्र, अत्र तथा सुवर्णका दान शय्या-दान उसके साथ दीप, अन्नसे भरे हुए पात्र, छाता, जूता, आसन, जलसे भरा कलश, श्रीहरिकी प्रतिमा तथा पात्र देना चाहिये। 

इस प्रकार जो पुरुष चार मासतक व्रत करता है, उसका तीन जन्मोतक गार्हस्थ्य जीवन नष्ट नहीं होता और न तो ऐश्वर्यकी कमी होती है। जो स्त्री इस व्रतको करती है वह तीन जन्मोतक विधवा नहीं होती है और नहीं ही उसका पति से वियोग होता है। इस व्रत को करने वाला भोग और मोक्षका भागी होता हैं इस व्रतके दिन अश्विनीकुमारों की भी पूजा करनी चाहिये। 
                                                                             राधे राधे 


 

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