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क्या आप जानते हैं गंगा माता का जन्म ब्रह्मा द्वारा हुआ था : Do you know Ganga Mata was born by Brahma

क्या आप जानते हैं गंगा माता का जन्म ब्रह्मा द्वारा हुआ था : Do you know Ganga Mata was born by Brahma
क्या आप जानते हैं गंगा माता का जन्म ब्रह्मा द्वारा हुआ था : Do you know Ganga Mata was born by Brahma
क्या आप जानते हैं गंगा माता का जन्म ब्रह्मा द्वारा हुआ था : Do you know Ganga Mata was born by Brahma


गंगा माता की कथाएं एवं महिमा सभी लोग जानते है लेकिन कमी लोगों ने सुना होगा की गंगा माता की उत्पत्ति भागीरथ के वरदान से पहले  ब्रह्मा के द्वारा हुई थी 
यह बात उस समय की है  जब महादैत्य राजा बलि देवताओं के अजेय शत्रु हुए; उन्होंने धर्म, यश, प्रजापालन, गुरुभक्ति, सत्यभाषण, बल, पराक्रम, त्याग और क्षमा के द्वारा वह सम्मान प्राप्त किया, जिसकी तीनों लोकोंमें कहीं उपमा नहीं है। 

उनकी बढ़ती हुई समृद्धि देखकर देवताओं को बड़ी चिन्ता हुई। वे आपस में सलाह करने लगे कि हम बलि को कैसे जीतें। राजा बलि के शासनकाल में तीनों लोक निष्कण्टक थे। कहींपर आधि-व्याधि अथवा शत्रुओंकी बाधा नहीं थी। अनावृष्टि और अधर्मका तो नाम भी नहीं था। स्वप्नमें भी किसीको दुष्ट पुरुषका दर्शन नहीं होता था। देवताओंको उनकी उन्नति बाणकी तरह चुभती थी।  अतः उन्हें कभी शान्ति नहीं मिलती थी। देवता उनसे द्वेष करने लगे। उनके यशरूपी अग्निसे जलने लगे। 

अतः वे व्याकुल होकर भगवान् विष्णुको शरणमें गये।देवता बोले-शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगन्नाथ! हम पीड़ित हैं। हमारी सत्ता छिन गयी है। आप हमारी ही रक्षाके लिये अस्त्र शस्त्र धारण करते हैं। आप-जैसे स्वामीके होते हुए हमपर ऐसा दुःख आ पड़ा है। हमारी जो वाणी आपको प्रणाम करती थी, वही एक दैत्यको कैसे नमस्कार करेगी। सुरेश्वर ! आपके ऐश्वर्यसे पुष्ट हो अपने ही पराक्रमसे तीनों लोकोंको जीतकर हम स्थिर होंगे। 

दैत्यको कैसे नमस्कार करें। देवताओंका यह वचन सुनकर दैत्योंका संहार | करनेवाले भगवान्ने देवकार्यकी सिद्धिके लिये इस प्रकार कहा श्री विष्णु भगवान् बोले-देवताओ! बलि मेरा भक्त है, उसे देवता और असुर कोई भी नहीं मार सकते। जैसे तुमलोग मेरे द्वारा पालन-पोषणके योग्य हो, वैसे बलि भी है। मैं बिना युद्धके ही स्वर्गमें बलिका राज्य छीन लूंगा और बलि को बाँधकर तुम्हारा राज्य तुम्हें लौटा दूंगा। फिर देवता 'बहुत अच्छा' कहकर देवता स्वर्गमें चले गये। 

भगवान् विष्णुने अदितिके गर्भमें प्रवेश किया। उनके जन्म के समय अनेक प्रकारके उत्सव होने लगे। यज्ञेश्वर यज्ञपुरुष स्वयं ही वामनरूप में अवतीर्ण हुए। इसी समय बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिने अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ली। प्रधान-प्रधान ऋषि तथा वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता पुरोहित शुक्राचार्यने उस यज्ञका आरम्भ कराया। स्वयं शुक्र ही यज्ञके आचार्य थे। उस यज्ञमें हविष्यका भाग लेनेके लिये जब सब देवता निकट आये, 'दान दो,' 'भोजन करो', सबका सत्कार करो,' 'पूर्ण हो गया', 'पूर्ण हो गया' इत्यादि शब्द यज्ञमण्डपमें गूंजने लगे, 

उसी समय विचित्र कुण्डल धारण किये साम-गान करते हुए वामनजी धीरे-धीरे यज्ञशालामें आये। आनेपर वे यज्ञकी प्रशंसा करने लगे।  शुक्राचार्यजीने वामनजीको पहचानकर तुरंत ही राजा बलिसे कहा-'राजन्! ये जो बौने शरीरवाले ब्राह्मण तुम्हारे यज्ञमें आये हैं, वे वास्तवमें ब्राह्मण नहीं, यज्ञवाहन यज्ञेश्वर विष्णु हैं। प्रभो! इसमें तनिक संदेह नहीं कि ये देवताओंका हित करनेके लिये बालकरूप धारणकर तुमसे कुछ याचना करने आये हैं। 

अत: पहले मुझसे सलाह लेकर पीछे इन्हें कुछ देना चाहिये।यह सुनकर शत्रुविजयी बलिने अपने पुरोहित शुक्राचार्यसे कहा-'मैं धन्य हूँ, जिसके घरपर साक्षात् यज्ञेश्वर मूर्तिमान् होकर पधारते और कुछ याचना करते हैं। अब इसमें सलाह लेनेके योग्य कौन-सी बात रह जाती है।' यों कहकर  राजाने हाथ जोड़कर पूछा-'भगवन्! बताइये, आप क्या चाहते हैं?' तब वामनजीने कहा'महाराज! केवल तीन पग भूमि दे दीजिये और किसी धनकी मुझे आवश्यकता नहीं है।

''बहुत अच्छा' कहकर राजा बलिने कलशसे जल लिया और वामनजीको भूमि संकल्प करके दे दी वामनजी ने धीरे से कहा-'राजन्! स्वस्ति, आप सुखी रहें। मुझे मेरी नापी हुई तीन पग भूमि दे दीजिये।' बलिने 'तथास्तु' कहकर ज्यों ही वामनजीकी ओर देखा, वे विराट्-रूप हो गये। चन्द्रमा और सूर्य उनकी छातीके सामने आ गये। उन्हें इस रूपमें देखकर स्त्रीसहित दैत्यराज बलिने विनयपूर्वक कहा-'जगन्मय विष्णो! आप अपनी शक्तिभर पैर बढ़ाइये!' विष्णु बोले-दैत्यराज! देखो, मैं पैर बढ़ाता हूँ। 

तब भगवान ने एक पग में पृथ्वी को नाप लिया  और दूसरे पग में स्वर्ग एवं  ब्रह्मलोक को नाप लिया फिर उन्होंने बलिसे कहा-'दैत्यराज! मेरा तीसरा पग रखनेके लिये तो स्थान ही नहीं है, कहाँ रखू? स्थान दो।'यह सुनकर बलि ने  भगवान  से कहा आप तीसरा पग मेरी पीठपर ही रखिये। भगवान् प्रसन्न होकर बोले-'दैत्यराज! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, कोई वर मांगो।' तब बलिने जगत के स्वामी भगवान् विष्णु से कहा-'अब मैं आपसे याचना नहीं करूँगा।' तब भगवान्ने स्वयं ही प्रसन्न होकर उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। 

वर्तमान समय में रसातलका राज्य, भविष्य में इन्द्रपद,आदि प्रदान किये। इस प्रकार  दैत्यराज बलिको यह सब कुछ देकर भगवान ने  उन्हें पुत्र और पत्नीसहित रसातल में भेज दिया और इन्द्रको देवताओं का राज्य अर्पित किया। इसी  बीच में उनका जो दूसरा पग  ब्रह्मलोक में पहुँचा था, उसे देखकर ब्रह्म ने सोचा, 'यह मेरे जन्मदाता भगवान् विष्णुका चरण है, जो सौभाग्यवश मेरे घरपर आ पहुंचा है। इसके लिये मैं क्या करूँ जिससे मेरा कल्याण हो? मेरे पास जो यह श्रेष्ठ कमण्डलु है, इसमें भगवान् शंकरका दिया हुआ पवित्र जल है।  ब्रह्म ने वह जल भगवान के चरणों में  चढ़ा दिया। वह जल भगवान् विष्णुके चरणों में गिरकर मेरुपर्वतपर पड़ा और चार भागों में बँटकर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर दिशामें पृथ्वीपर जा पहुँचा। दक्षिणमें गिरे हुए जलको भगवान् शंकरने जटाओं में रख लिया। वही माता गंगा के रूप में विख्यात हुआ 

पश्चिममें जो जल गिरा, वह फिर कमण्डलुमें ही चला आया। उत्तर में गिरे हुए जलको भगवान् विष्णुने ग्रहण किया तथा पूर्वमें जो जल गिरा, उसे देवताओं, पितरों और लोकपालों ने | ग्रहण किया  वा दक्षिण दिशामें गया हुआ जल, जो भगन् शंकरकी जटा में  स्थित हुआ,  उसके दो भेद हुए; क्योंकि उसे पृथ्वीपर उतार ने वाले दो व्यक्ति थे। उस जल के एक भागको तो व्रत, दान और समाधि में तत्पर रहनेवाले गौतम नामक ब्राह्मण ने भगवान् शिवको आराधना करके भूतलतक पहुँचाया, जो सम्पूर्ण लोक में गौतमी गंगा के नाम से  विख्यात हुआ; तथा दूसरा भाग बलवान् क्षत्रिय राजा भगीरथ ने इस पृथ्वीपर उतारा और अपने पूर्वजों का उद्धार किया  इस प्रकार एक ही गंगा माता  के दो स्वरूप हो गये।  

                                                              radhe radhe

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