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अनंत वासुदेव शिला की कथा :Story of Anant Vasudev Shila

अनंत वासुदेव शिला की कथा :Story of Anant Vasudev Shila

अनंत वासुदेव शिला की कथा 

अनंत वासुदेव शिला की कथा :Story of Anant Vasudev Shila
अनंत वासुदेव शिला की कथा :Story of Anant Vasudev Shila

अनंत वासुदेव शिला की कथा जो उत्तम में उत्तम है जिसको सुनने से जीवन सफल हो जाता है अनन्त वासुदेव एक शिला है जो स्वंम विष्णु भगवान है जिसका निर्माण ब्रह्मा ने विश्वकर्मा के द्वारा करवा था पूर्व काल की बात है 
ब्रह्मा जी ने देव शिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा को बुलाकर कहा-'तुम पृथ्वीपर भगवान् वासुदेवकी शिलामयी प्रतिमा बनाओ, जिसका दर्शन करके इन्द्र आदि देवता और मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् वासुदेवकी आराधना करें और उनकी कृपासे  निर्भय होकर रहें।' मेरी बात सुनकर विश्वकर्मा ने तत्काल ही एक सुन्दर और  प्रतिमा बनायी, जिसके हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्य शोभा पा रहे थे। भगवान का  वह विग्रह सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और अत्यन्त प्रभावशाली था। नेत्र कमलदल के समान विशाल थे। वक्ष:स्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। हृदयदेश वनमाला से  शोभित था। मस्तकपर मुकुट और भुजाओं में अङ्गद शोभा पाते थे। कंधे मोटे जान पड़ते थे। कानों में कुण्डल झिलमिला रहे थे। श्याम अंग पीताम्बर  धारण किय हुए थे । 

अनंत वासुदेव शिला की कथा 
इस प्रकार वह प्रतिमा दिव्य थी। स्थापनाका समय आने पर स्वयं ब्रह्मा उसे स्थापित  किया। उस समय देवराज इन्द्र ऐरावतपर सवार हो समस्त देवताओं के साथ मेरे लोकमें आये। उन्होंने सान-दान आदिके द्वाराभगवान प्रतिमा  को प्रसन्न किया और उसे लेकर वे अपनी अमरावती पुरीमें चले गये। वहाँ इन्द्रभवनमें उसे पधराकर उन्होंने मन, वाणी और शरीरको संयममें रखते हुए दीर्घकालतक भगवान की आराधना की और उन्हीं के प्रसादसे वृत्र एवं नमुचि आदि क्रूर राक्षसों तथा भयंकर दानवोंका संहार करके तीनों लोकोंका राज्य भोगा। द्वितीय युग त्रेता आनेपर महापराक्रमी राक्षसराज रावण बड़ा प्रतापी हुआ। उसने दस हजार वर्षातक निराहार और जितेन्द्रिय रहकर अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करते हुए भारी तपस्या की, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुष्कर थी। उस तपस्या से संतुष्ट होकर ब्रह्मा ने रावणको वरदान दिया, 'तुम्हें सम्पूर्ण देवताओं, दैत्यों, नागों और राक्षसोंमें से कोई नहीं मार सकेगा। शापके भयंकर प्रहार से भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी।

अनंत वासुदेव शिला की कथा 
तुम यमदूतों से भी अवध्य रहोगे।' ऐसा वर पाकर वह राक्षस सम्पूर्ण यक्षों और उनके राजा  कुबेर को भी परास्त करके इन्द्रको भी जीतनेके लिये उद्यत हुआ। उसने देवताओंके साथ बड़ा भयङ्कर संग्राम किया। उसके पुत्रका नाम मेघनाद था। मेघनादने इन्द्रको जीत लिया, अत: वह इन्द्रजित्के नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसके बाद  बलवान् रावणने अमरावतीपुरीमें प्रवेश करके देवराज इन्द्रके सुन्दर भवन में भगवान् वासुदेवकी प्रतिमा देखी, और  यहाँ रखे हुए ढेर-के-ढेर रनोंको तो छोड़ दिया और उस सुन्दर प्रतिमाको तुरंत ही पुष्पक विमानसे लंका में भेज दिया।
वहाँ रावण के छोटे भाई धर्मात्मा विभीषण  थे। वे सदा भगवान् नारायण के भजन में लगे रहते थे। देवराजकी भूमि से आयी हुई उस दिव्य प्रतिमाको देखकर उनके शरीर में रोमाश हो आया  विभीषणने प्रसन्नचित्तसे मस्तक झुकाकर भगवान को  प्रणाम किया और कहा-'आज मेरा जन्म सफल हो गया।

अनंत वासुदेव शिला की कथा 
आज मेरी तपस्याका फल मिल गया।' यों कहकर धर्मात्मा विभीषण बारंबार भगवान को प्रणाम करके अपने बड़े भाईके पास गये और हाथ जोड़कर बोले-'राजन्! आप वह प्रतिमा देकर मुझपर कृपा कीजिये। मैं उसकी आराधना करके भवसागरसे पार होना चाहता हूँ।' भाईकी बात सुनकर रावणने कहा-'वीर! तुम प्रतिमा ले लो, मैं उसे लेकर क्या करूंगा। मैं तो ब्रह्माजी की आराधना करके तीनों लोकोंपर विजय पा रहा हूँ।' विभीषण बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने वह कल्याणमयी प्रतिमा ले ली और उसके द्वारा एक सौ आठ वर्षातक भगवान् विष्णुको आराधना की। इससे उन्होंने अणिमा आदि आठों सिद्धियोंके साथ अजर-अमर रहनेका वरदान प्राप्त कर लिया।
रावण बड़ा पापी और क्रूर राक्षस था। उसने देवता, गन्धर्व, किंनर, लोकपाल, मनुष्य, मुनि और सिद्धोंको भी युद्ध में जीतकर उनकी स्त्रियों को | हर लिया और लंका  नगरीमें लाकर रखा। फिर सीताके लिये मोहित होकर उसने उनको भी हर लिया। इसका पता लगनेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामको बड़ा क्रोध आया

अनंत वासुदेव शिला की कथा 
उन्होंने रावणको मार डालनेका निश्चय किया। इस कार्यमें सुग्रीव सहायक हुए।  फिर हनुमान्, नल, नील, जाम्बवान्, पनस, गवय, गवाक्ष और पाठीन आदि असंख्य महाबली वानरोंके साथ कमलनयन श्रीरामने लंका की यात्रा की। उन्होंने समुद्र में पर्वतोंकी बड़ी-बड़ी चट्टानें डालकर पुल बंधाया और विशाल सेनाके साथ समुद्रको पार किया। रावणने राक्षसोंको साथ लेकर भगवान् श्रीरामके साथ घोर संग्राम किया। परम पराक्रमी श्री रघुनाथजीने महोदर, प्रहस्त, निकुम्भ, कुम्भ, नरान्तक, यमान्तक, मालाब्य, माल्यवान्, इन्द्रजित्, कुम्भकर्ण तथा रावणको मारकर और विभीषण को राज्य दे भगवान् वासुदेवकी प्रतिमा को साथ लेकर वे पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए और अयोध्या नगरी में जा पहुँचे। भक्तवत्सल श्रीरघुनाथजी ने अपने छोटे भाई भरत और शत्रुघ्न को भिन्न-भिन्न राज्यों पर अभिषिक्त किया और स्वयं सम्राट्की भाँति समस्त भूमण्डल के राज्यपर आसीन हुए। उन्होंने अपने पुरातन स्वरूप श्रीविष्णकी उस प्रतिमाका आराधन करते हुए पूथ्वी पर ग्यारह हजार वर्षांतक पालन किया। उसके बाद वे अपने वैष्णव धाम में प्रवेश कर गये। 

अनंत वासुदेव शिला की कथा 
उस समय श्रीराम ने वह प्रतिमा समुद्रको दे दी और कहा-'अपने जल और रत्नों के साथ तुम इस प्रतिमाकी भी रक्षा करना।' द्वापर आनेपर जब जगदीश्वर भगवान् विष्णु पृथ्वीको प्रार्थना से कंस आदिका वध करने के लिये बलभद्रजीके साथ वसुदेवजी के कुल में अवतीर्ण हुए. उस समय नदियों के स्वामी समुद्रने उस परम दुर्लभ पुण्यमय पुरुषोत्तमक्षेत्रमें सम्पूर्ण लोकों का हित करनेके लिये उक्त प्रतिमाको प्रकट किया, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाली थी। तबसे उस मुक्तिदायक क्षेत्रमें ही देवाधिदेव अनन्त वासुदेव विराजमान हैं, जो मनुष्योंकी समस्त कामनाएं पूर्ण करनेवाले हैं। जो लोग मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सर्वेश्वर भगवान् अनन्त वासुदेवकी भक्तिपूर्वक शरण लेते हैं, वे परमपदको प्राप्त होते हैं। भगवान् अनन्तका एक बार दर्शन, भक्तिपूर्वक पूजन और प्रणाम करके मनुष्य राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंसे दसगुना फल पाता है। वह समस्त भोग-सामग्रीसे सम्पन छोटी छोटी घंटियों से सुशोभित, सूर्यके समान तेजस्वी और इच्छानुसार चलनेवाले विमानसे वैकुण्ठधाम में जाता है। उस समय दिव्याङ्गनाएँ उसकी सेवामें रहती हैं और गन्धर्व उसके यशका गान करते हैं।  वह अपने साथ कुलकी इक्कीस पीढ़ियोंका भी उद्धार कर देता है। 

अनंत वासुदेव शिला की कथा संपूर्ण 

                                                                                                   राधे राधे 

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