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वराह तीर्थ विष्णु भगवान वराह रूप में यहाँ आये थे :madhurbhakti.com

वराह तीर्थ विष्णु भगवान वराह रूप में यहाँ आये थे Varaha Tirtha Vishnu came here in the form of Lord Varaha

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वराह तीर्थ विष्णु भगवान वराह रूप में यहाँ आये थे 


वराह तीर्थ

वराह तीर्थ के बारे में पुराणों में इस प्रकार बताया गया है   कश्यप ऋषि एवं दैत्य माता दिति का पुत्र हिरण्याक्ष पृथ्वी पर सर्वत्र आसुरी साम्राज्य की स्थापना का संकल्प ले चुका था। हिरण्याक्ष के आततायी व्यवहार से सम्पूर्ण त्रिलोक में हाहाकार मचा हुआ था। तब पृथ्वी के उद्धार हेतु तथा हिरण्याक्ष के वध के लिए समस्त देवगणों तथा ऋषि महर्षियों ने मिलकर ब्रह्मा का स्मरण किया। उसी समय ब्रह्मा की नासिका से अंगूठे के बराबर आकार का एक गौर वर्ण शिशु प्रकट हुआ और तदनन्तर वह आकार में विशाल हो गया। यह गौर वर्ण शिशु ही वस्तुतः भगवान विष्णु का वराह अवतार थे। सभी देवगण उसकी वन्दना करने लगे। वराह ने रसातल पहुंचकर दैत्य राज हिरण्याक्ष के द्वारा छिपाई गई भूदेवी को अपने दाढ़ों पर धारण कर उसका उद्धार किया। पृथ्वी का उद्धार होने से  सभी देव, ऋषि, महर्षि भगवान वराह के कृतज्ञ एवं ऋणी हुए।इस तीर्थ में विष्णु वराह रूप में विद्यमान हैं । 
यह तीर्थ बड़ा ही पावन एवं पवित्र है क्योंकि स्वयं विष्णु भगवान वराह रूप में यहां आये थे 
लेकिन ब्रह्म पुराण में ब्रह्म ने वराह तीर्थ की कथा इस प्रकार बताई है 
ब्रह्म नारद मुनि से कहते है  पूर्वकालकी बात है, सिन्धुसेन नामक राक्षस | देवताओंको परास्त करके यज्ञ छीनकर रसातल में जा पहुंचा। यज्ञ के रसातल चले जाने पर पृथ्वीपर। उसका सर्वथा अभाव हो गया। देवताओं ने सोचा, यज्ञ के बिना न तो यह लोक रह जायगा और न परलोक हो; अतः अपने शत्रुके पीछे उन्होंने रसातल में भी धावा किया। परंतु इन्द्र आदि देवता सिन्धु सेन को जीत न सके। तब उन्होंने  भगवान् विष्णुके पास जाकर यज्ञापहरण आदि राक्षसकी सब करतूत कह  सुनाई  भगवान्ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा-'मैं वाराहरूप धारण करके शङ्ख, चक्र और गदा हाथमें ले रसातलमें जाऊँगा और मुख्य-मुख्य राक्षसोंका संहार करके पुण्यमय यज्ञको लौटा लाऊँगा। देवताओ। तुम सब लोग स्वर्गमें जाओ। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये।'
गंगा जी जिस मार्गसे रसातलमें गयी थी, उसी मार्गसे पृथ्वी को छेदकर चक्रधारी भगवान् भी रसातल में पहुंच गये। उन्होंने वाराहरूप धारण करके रसातलवासी राक्षसों और दानवोंका वध किया तथा महायज्ञको मुखमें रखकर रसातलसे निकल आये। उस समय देवता ब्रह्मगिरिपर श्रीहरिकी प्रतीक्षा करते थे। उस मार्गसे निकलकर
भगवान् गंगास्रोत में आये और रक्त से लथपथ हुए अपने अङ्गोंको गङ्गाजीके जलसे धोया। उस स्थानपर वाराह नामक कुण्ड हो गया। इसके बाद भगवान्ने मुँहमें रखे हुए महायज्ञको दे दिया। इस प्रकार उनके मुखसे यज्ञका प्रादुर्भाव हुआ, इसलिये वाराहतीर्थ परम पवित्र और सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब यज्ञोंका फल देता है। जो पुण्यात्मा पुरुष वहाँ रहकर अपने पितरोंका स्मरण करता है, उसके पितर सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गमें चले जाते हैं।  वामन पुराण में इस तीर्थ का महत्त्व इस प्रकार वर्णित है :
वाराहं तीर्थमाख्यातं विष्णुना परिकीर्तितम्।
तस्मिन् स्नात्वा श्रद्दधानः प्राप्नोति परमं पदम् || 
अर्थात् इस तीर्थ में श्रद्धायुक्त चित्त से स्नान करने वाला मनुष्य परमपद का अधिकारी होता है । इस स्थान पर आने वाले तीर्थयात्री एवं श्रद्धालु जन स्नानादि करके भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करते हैं 
यह तीर्थ हरियाणा के जींद से लगभग 11कि.मी. दूर सफीदों-जींद मार्ग पर बारहकलां ग्राम मे स्थित है। भगवान विष्णु के वराह अवतार से सम्बन्धित होने से ही इस ग्राम का नाम वराह कलां हुआ। 
 प्रत्येक वर्ष आषाढ़ तथा फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मेला लगता है 






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