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अष्टमी तिथि के व्रत एवं महिमा







राधे राधे 

सनातन जी कहते हैं-नारद! चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भवानी का जन्म बताया जाता है। उस दिन सौ परिक्रमा करके उनकी यात्रा का महान् उत्सव मनाना चाहिये। उस दिन जगदम्बा का दर्शन मनुष्यों के लिये सर्वथा आनन्द देने वाला है। उसी दिन अशोक कलिका खाने का विधान है। जो लोग चैत्र मास के शुक्ल पक्षकी अष्टमी को पुनर्वसु नक्षत्र में अशोक की आठ कलिकाओं का पान करते हैं, वे कभी शोक नहीं पाते। उस दिन रात में देवीकी पूजाका विधान होने से वह तिथि 'महाष्टमी' भी कही गयी है।

वैशाख मास के शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथि को उपवास करके स्वयं जलसे स्रान करे और अपराजिता देवी को जटामांसी तथा उशीर (खस)-मिश्रित जल से स्नान कराकर गन्ध आदि से उनकी पूजा करे। फिर शर्करा से तैयार किया हुआ नैवेद्य भोग लगावे। दूसरे दिन नवमी को पारणा से पहले कुमारी कन्याओं को देवीका शर्करामय प्रसाद भोजन करावे। ब्रह्मन्! ऐसा करनेवाला मनुष्य देवीके प्रसादसे ज्योतिर्मय विमान में बैठकर प्रकाशमान सूर्य की भाँति दिव्य लोकों में विचरता है।

ज्येष्ठ मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमी को भगवान् त्रिलोचन की पूजा करके मनुष्य सम्पूर्ण देवताओं से वन्दित हो एक कल्पतक शिवलोक में निवास करता है। जो मनुष्य ज्येष्ठ शुक्ला अष्टमीको देवीको पूजा करता है, वह गन्धर्वो और अप्सराक साथ विमानपर विचरण करता है। आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी को हल्दी मिश्रित जल से नान करके वैसे ही जलसे देवीको भी स्नान करावे और विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। तदनन्तर शुद्ध जलसे स्नान कराकर कपूर और चन्दनका लेप लगावे। 

तत्पश्चात् शर्करायुक्त मैवेद्य अर्पण करके आचमन करावे। फिर ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें सुवर्ण और दक्षिणा दे। तदनन्तर उन्हें विदा करके स्वयं मौन होकर भोजन करे। इस व्रतका पालन करके मनुष्य देवीलोकमें जाता है। श्रावण शुक्ला अष्टमीको विधिपूर्वक देवीका यजन करके दूधसे उन्हें नहलावे और मिष्टात्र निवेदन करे, तत्पश्चात् दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करके व्रत समाप्त करे। यह संतान बढ़ानेवाला व्रत है। श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीको ‘दशाफल' नामका व्रत होता है। 

उस दिन उपवास-व्रतका संकल्प लेकर स्रान और नित्यकर्म करके काली तुलसी के दस पत्तोंसे 'कृष्णाय नमः', विष्णवे नमः', 'अनन्ताय
नमः', 'गोविन्दाय नमः', 'गरुडध्वजाय नमः', 'दामोदराय नमः', 'हृषीकेशाय नमः', 'पद्मनाभाय नमः', 'हरये नमः', 'प्रभवे नमः'-इन दस नामोंका उच्चारण करके प्रतिदिन भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करे। तदनन्तर परिक्रमापूर्वक नमस्कार करे। इस प्रकार इस उत्तम व्रतको दस दिनतक करता रहे। | इसके आदि, मध्य और अन्तमें श्रीकृष्ण-मन्त्रद्वारा चरुसे एक सौ आठ बार विधिपूर्वक होम करे। 

होम के अन्तमें विद्वान् पुरुष विधि के अनुसार भलीभाँति आचार्यकी पूजा करे। सोने, ताँबे, मिट्टी अथवा बाँसके पात्रमें सोनेका सुन्दर तुलसीदल बनवाकर रखे। साथ ही भगवान् श्रीकृष्णकी सुवर्णमयी प्रतिमा भी स्थापित करके उसकी विधिपूर्वक पूजा करे और वस्त्र तथा आभूषणोंसे विभूषित बछड़ेसहित गौका दान भी करे। दस दिनोंतक प्रतिदिन भगवान् श्रीकृष्णको दस-दस  पूरी अर्पण करे। उन परियोंको व्रती पुरुष विधिज्ञ ब्राह्मणको दे डाले अथवा स्वयं भोजन करे। द्विजोत्तम! दसवें दिन यथाशक्ति शय्यादान करे। तत्पश्चात् द्रव्यसहित सुवर्णमयी मूर्ति आचार्यको समर्पित करे। 

व्रतके अन्तमें दस ब्राह्मणोंको प्रत्येकके लिये दस-दस पूरियाँ देवे। इस प्रकार दस वर्षांतक उत्तम व्रतका पालन करके विधिपूर्वक उपवासका निर्वाह कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है और अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। यही 'कृष्ण-जन्माष्टमी तिथि है, जो मनुष्योंके सब पापों को हर लेनेवाली कही गयी है। श्रीकृष्ण के
जन्म के दिन केवल उपवास करने मात्र से मनुष्य सात जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। 

विद्वान् पुरुष उपवास करके नदी आदि के निर्मल जल में तिलमिश्रित जल से स्रान करे। फिर उत्तम स्थान में बने हुए मण्डप के भीतर मण्डल बनावे। मण्डल के मध्यभाग में ताँबे या मिट्टीका कलश स्थापित करे। । उसके ऊपर ताँबे का पात्र रखे। उस पात्र के ऊपर दो वस्त्रों से ढकी हुई श्रीकृष्ण की सुवर्णमयी सुन्दर प्रतिमा स्थापित करे। फिर वाद्य आदि उपचारोंद्वारा स्नेहपूर्ण हृदय से उसकी पूजा करे। कलश के सब ओर पूर्व आदि क्रमसे देवकी, वसुदेव, यशोदा, नन्द, व्रज, गोपगण, गोपीवृन्द तथा गोसमुदायकी पूजा करे। 

तत्पश्चात् आरती करके अपराध क्षमा कराते हुए भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। उसके बाद आधी राततक वहीं रहे। आधी रातमें पुनः श्रीहरिको पञ्चामृत तथा शुद्ध जलसे स्नान कराये और गन्ध-पुष्प आदिसे पुनः उनकी पूजा करे। नारद! धनिया, अजवाइन, सोंठ, खाँड़ और घीके मेलसे नैवेद्य तैयार करके उसे चाँदीके पात्रमें रखकर भगवान्को अर्पण करे। फिर दशावतारधारी श्रीहरिका चिन्तन करते हुए पुनः आरती करके चन्द्रोदय होनेपर चन्द्रमाको अर्घ्य दे। 

उसके बाद देवेश्वर श्रीकृष्णासे क्षमा-प्रार्थना करके व्रती पुरुष पौराणिक स्तोत्र-पाठ और गीत-वाद्य आदि अनेक कार्यक्रमाद्वारा रात्रिका शेष भाग व्यतीत करे। तदनन्तर प्रात:काल श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और उन्हें प्रसन्नतापूर्वक दक्षिणा देकर विदा करे। तत्पश्चा भगवान की सुवर्णमयी प्रतिमाको स्वर्ण, धेनु और भूमि सहित आचार्य को दान करे। फिर और भी दक्षिणा देकर उन्हें विदा करने के पश्चात् स्वयं भी स्त्री, पुत्र, सुहृद् तथा भृत्यवर्ग के साथ भोजन करे। 

इस प्रकार व्रत करके मनुष्य श्रेष्ठ विमानपर बैठकर साक्षात् गोलोक में जाता है। इस जन्माष्टमौके समान दूसरा कोई व्रत तीनों लोकोंमें नहीं है, जिसके करनेसे करोड़ों एकादशियोंका फल प्राप्त हो जाता है। भाद्रपद शुक्ला अष्टमीको मनुष्य 'राधावत' करे। इसमें भी पूर्ववत् कलशके ऊपर स्थापित श्रीराधाकी स्वर्णमयी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। मध्याह्नकालमें श्रीराधाजीका पूजन करके एकभुक्त व्रत करे। यदि शक्ति हो तो भक्त पुरुष पूरा उपवास करे। 

फिर दूसरे दिन भक्तिपूर्वक सुवासिनी स्त्रियोंको भोजन कराकर आचार्यको प्रतिमा दान करे। तत्पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार इस व्रतको समाप्त करना चाहिये। ब्रह्मा ! व्रती पुरुष विधिपूर्वक इस 'राधाष्टमीव्रत' के करनेसे व्रजका रहस्य जान लेता तथा राधा परिकरों में निवास करता है। इसी तिथिको 'दूर्वाष्टमीव्रत' भी बताया गया है। पवित्र स्थानमें उगी हुई दूबपर शिवलिङ्गकी स्थापना करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, दही, अक्षत और फल आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करे। 

पूजाके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर अर्घ्य दे। अर्घ्य देनेके पश्चात् परिक्रमा करके वहीं ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा, उत्तम फल तथा सुगन्धित मिष्टान्न देकर विदा करे; फिर स्वयं भी भोजन करके अपने घर जाय। विप्रवर! इस प्रकार यह 'दूर्वाष्टमी' मनुष्योंके लिये पुण्यदायिनी तथा उनका पाप हर लेनेवाली है। यह चारों वर्गों और विशेषतः स्त्रियों के लिये अवश्यकर्तव्य व्रत है। ब्रह्मन् ! जब वह अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्रसे संयुक्त हो तो उसे 'ज्येष्ठा अष्टमी' के नामसे जानना चाहिये। वह पूजित होनेपर सब पापोंका नाश करनेवाली है। इस तिथिसे लेकर सोलह दिनोंतक महालक्ष्मीका व्रत बताया गया है। पहले इस प्रकार संकल्प करे

करिष्येऽहं महालक्ष्मीव्रतं ते त्वत्परायणः। 
तदविलेन में यातु समाप्तिं त्वत्प्रसादतः।।

'देवि! मैं आपकी सेवा में तत्पर होकर आपके इस महालक्ष्मी व्रत का पालन करूंगा। आपकी कृपा से यह व्रत बिना किसी विघ्न-बाधाके परिपूर्ण हो।'
ऐसा कहकर दाहिने हाथमें सोलह तन्तु और सोलह गाँठोंसे युक्त डोरा बाँध ले। तबसे व्रती पुरुष प्रतिदिन गन्ध आदि उपचारोंद्वारा महालक्ष्मीकी पूजा करे। पूजाका यह क्रम आश्विन कृष्णाअष्टमीतक चलाता रहे। व्रत पूरा हो जानेपर विद्वान् पुरुष उसका उद्यापन करे। वस्त्र घेरकर एक मण्डप बना ले। उसके भीतर सर्वतोभद्रमण्डलकी रचना करे 

और उस मण्डल में कलशकी प्रतिष्ठा करके दीपक जला दे। फिर अपनी बाँहसे डोरा उतारकर कलशके नीचे रख दे। इसके बाद सोनेकी चार प्रतिमाएँ बनवावे, वे सब-की-सब महालक्ष्मीस्वरूपा हों। फिर पञ्चामृत और जलसे उन सबको स्नान करावे तथा षोडशोपचारसे विधिपूर्वक पूजा करके वहाँ जागरण करे। तदनन्तर आधी रातके समय चन्द्रोदय होनेपर श्रीखण्ड आदि द्रव्योंसे विधिपूर्वक अर्थ्य अर्पण करे । यह अर्घ्य चन्द्रमण्डलमें स्थित महालक्ष्मीके उद्देश्यसे देना चाहिये। 

अर्घ्य देनेके पश्चात् महालक्ष्मीकी प्रार्थना करे और फिर व्रत करनेवाली स्त्री श्रोत्रिय ब्राह्मणोंकी पवियोंका रोली, महावर और काजल आदि सौभाग्यसूचक द्रव्योंद्वारा भलीभाँति पूजन करके उन्हें भोजन करावे। तत्पश्चात् बिल्व, कमल और खीरसे अग्निमें आहुति दे। ब्रह्मन्! उक्त वस्तुओंके अभावमें केवल घौकी आहुति दे। ग्रहोंके लिये समिधा और तिलका हवन करे। सब रोगोंकी शान्तिके उद्देश्यसे भगवान् मृत्युञ्जयके लिये भी आहुति देनी चाहिये। 

चन्दन, तालपत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा | नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ-सबको नये सूपेमें रखे। प्रत्येक वस्तु सोलहकी संख्यामें हो। उन सब वस्तुओंको दूसरे सूपसे ढक दे। तदनन्तर व्रती पुरुष निम्राङ्कित मन्त्र पढ़ते हुए उपयुक्त सब वस्तुएँ महालक्ष्मीको समर्पित करे

क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्रसहोदरा।
 व्रतेनानेन संतुष्टा भवताद्विष्णुवासभा ।।
 'क्षीरसागरसे प्रकट हुई चन्द्रमाको सहोदर भगिनी श्रीविष्णुवल्लभा महालक्ष्मी इस व्रतसे सन्तुष्ट हों।'

पूर्वोक्त चार प्रतिमाएँ श्रोत्रिय ब्राह्मणको अर्पित करे। इसके बाद चार ब्राह्मणों और सोलह सुवासिनी स्त्रियोंको मिष्टान्न भोजन कराकर दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे। फिर नियम समाप्त करके इष्ट भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। विप्रवर! यह महालक्ष्मीका व्रत है। इसका विधिपूर्वक पालन करके मनुष्य इहलोकके इष्ट भोगोंका उपभोग करनेके बाद चिरकालतक लक्ष्मीलोकमें निवास करता है।

विप्रवर! आश्विन मासके शुक्लपक्षमें जो अष्टमी आती है, उसे 'महाष्टमी' कहा गया है। उसमें सभी उपचारोंसे दुर्गाजीके पूजनका विधान है। जो 'महाष्टमी को उपवास अथवा एकभुक्त व्रत करता है, वह सब ओरसे वैभव पाकर देवताकी भाँति चिरकालतक आनन्दमन रहता है। कार्तिक कृष्णपक्षमें अष्टमीको 'काष्टमी' नामक व्रत कहा गया है।

 उसमें यत्रपूर्वक उमासहित भगवान् शङ्करकी पूजा करनी चाहिये। जो सर्वगुणसम्पन्न पुत्र और नाना प्रकारके सुखकी अभिलाषा रखते हैं, उन व्रती पुरुषोंको चन्द्रोदय होनेपर सदा चन्द्रमाके लिये अयंदान करना चाहिये। कार्तिकके शुक्लपक्षमें गोपाष्टमी का व्रत व्रत' कहा गया है। उसमें अनेक पुत्रों से युक्त अनघ और अनघा-इन दोनों पति-पत्नी की कुशमयी प्रतिमा बनायी जाती है। उस युगल जोड़ीको गोबरसे लीपे हुए शुभ स्थानमें स्थापित करके गन्ध-पुष्प आदि विविध उपचारों से उनकी पूजा करे। 

फिर ब्राह्मण पति-पत्नीको | भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करे। स्त्री हो या पुरुष विधिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान  करके उत्तम लक्षणों से युक्त पुत्र पाता है। मार्गशीर्ष शुक्ला अष्टमीको कालभैरवके समीप उपवासपूर्वक जागरण करके मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। पौष शुक्ल अष्टमीको अष्टकासंज्ञक श्राद्ध पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति देनेवाला और कुल-संततिको बढ़ानेवाला है। 

उस दिन भक्तिपूर्वक शिवकी पूजा करके केवल भक्तिका आचरण करते हुए मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है। माघ मासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली भद्रकाली देवीकी भक्तिभावसे पूजा करे । जो अविच्छिन्न संतति और विजय चाहता हो, वह माघ मासके शुक्लपक्षकी अष्टमीको भीष्मजीका तर्पण करे। ब्रह्मन् ! फाल्गुन मासके कृष्णपक्षको अष्टमीको व्रतपरायण पुरुष समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये भीमादेवीको आराधना करे। 

फाल्गुन शुक्ला अष्टमीको गन्ध आदि उपचारोंसे शिव और शिवाकी भलीभाँति पूजा करके मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियों का अधीश्वर हो जाता है। सभी मासोंके दोनों पक्षों में अष्टमीके दिन विधिपूर्वक शिव और पार्वतीको पूजा करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल प्राप्त कर लेता है।

         अष्टमी तिथि  व्रत  संपूर्ण                                                                                                                                                     राधे राधे 

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