;

pratipada tithi vrat जाने प्रतिपदा तीथि व्रत की महिमा के बारे में

                                    प्रतिपदा तिथि व्रत 


राधे राधे 

श्रीसनातनजीने कहा-नारद! सुनो, अब मैं तुमसे तिथियोंके पृथक्-पृथक् व्रतका वर्णन करता हूँ। तिथियोंके जो स्वामी हैं, उन्हींके क्रमसे अलग अलग  व्रत बताया जाता है, जो सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्रासि करानेवाला है। चैत्रमास के शुक्ल पक्षमें प्रथम दिन सूर्योदयकाल में ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण जगत की सृष्टि की थी, इसलिये वर्ष और वसन्त ऋतु के आदिमें बलिराज्य-सम्बन्धी तिथि- अमावास्या को जो प्रतिपदा तिथि प्राप्त होती है, उसी में सदा विद्वानोंको व्रत करना चाहिये। प्रतिपदा तिथि पूर्वविद्धा होनेपर ही व्रत आदिमें ग्रहण करने योग्य है। उस दिन महाशान्ति करनी चाहिये। वह समस्त पापोंका नाश, सब प्रकारके उत्पातोंकी शान्ति तथा कलियुगके दुष्कर्मोंका निवारण करनेवाली होती है। साथ ही वह आयु देनेवाली, पुष्टिकारक तथा धन और सौभाग्यको बढ़ानेवाली है। वह परम मङ्गलमयी, शान्ति, पवित्र होनेके साथ ही इहलोक और परलोक में भी सुख देनेवाली है। उस तिथि को पहले अग्रिरूपधारी भगवान् ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये, फिर क्रमश: सब देवताओं की पृथक्-पृथक् पूजा करे। इस तरह पूजा और ॐ कारपूर्वक नमस्कार करके कुश, जल, तिल और अक्षत के साथ सुवर्ण और वस्त्रसहित दक्षिणा लेकर वेदवेत्ता ब्राह्मण को व्रतकी पूर्तिके लिये दान करना चाहिये। इस प्रकार पूजाविशेष से 'सौरि' नामक व्रत सम्पन्न होता है। ब्रह्मन् । यह मनुष्योंको आरोग्य प्रदान करनेवाला है। मुने! उसी दिन 'विद्याव्रत' भी बताया गया है तथा इसी तिथिको श्रीकृष्णने अजातशत्रु युधिष्ठिरको 'तिलकवत" करनेका उपदेश दिया है।
उसके बाद  ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाको सूर्योदयकालमें देवमन्दिरसम्बन्धी वाटिकामें उगे हुए मनोहर कनेरवृक्षका पूजन करे। कनेरके वृक्षमें लाल डोरा लपेटकर उसपर गन्ध, चन्दन, धूप आदि चढ़ावे, उगे हुए सप्तधान्यके अङ्कर, नारंगी और बिजौरा नीबू आदिसे उसकी पूजा करे। फिर अक्षत और जलसे उस वृक्षको सींचकर
 निम्राङ्कित मन्त्रसे क्षमा-प्रार्थना करे 
 'करवीर! आप धर्मके निवास स्थान और भगवान् सूर्यके पुत्र हैं। दुर्गादि देवताओंके मस्तकको विभूषित करनेवाले तथा उनके सदैव प्रिय हैं। | आपको नमस्कार है।'
तत्पश्चात् 'आ कृष्णेन ' इत्यादि वेदोक्त मन्त्रका उच्चारण करके इसी प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पूजन करके ब्राह्मणोंको  दक्षिणा दे और वृक्षकी परिक्रमा करके अपने घर  जाय। श्रावण शुक्ला प्रतिपदाको परम उत्तम 'रोटकव्रत" होता है, जो लक्ष्मी और बुद्धिको देनेवाला है तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षका कारण है। ब्रह्मन्! सोमवारयुक्त श्रावण शुक्ल प्रतिपदा या श्रावणके प्रथम सोमवारसे लेकर साढ़े तीन मासतक यह व्रत किया जाता है। इसमें | प्रतिदिन सोमेश्वर भगवान् शिवकी बिल्वपत्रसे
पूजा की जाती है। कार्तिक शुक्ला चतुर्दशीतक  इस नियमसे पूजा करके उस दिन उपवासपूर्वक
रहे और व्रतपरायण पुरुष पूर्णिमाके दिन पुनः | भगवान् शङ्करकी पूजा करे। फिर बाँसके पात्रमें
सुवर्णसहित पवित्र एवं अधिक वायन, जो देवताकी प्रसत्रताको बढ़ानेवाला हो, लेकर संकल्पपूर्वक ब्राह्मणको दान करे। मुनीश्वर! यह दान धनको वृद्धि करनेवाला है। भाद्रपदके शुक्ल पक्षको प्रतिपदाको कोई 'महत्तमव्रत ' एवं कोई 'मौनव्रतरे। बतलाते हैं। इसमें भगवान् शिवकी पूजा की जाती है। उस दिन मौन रहकर नैवेद्य तैयार करे। अड़तालीस फल और पूए एकत्र करके उनमेंसे सोलह तो ब्राह्मणको दे और सोलह देवताको भोग लगावे एवं शेष सोलह अपने उपयोगमें लावे।। सुवर्णमयी शिवकी प्रतिमाको विधानवेत्ता पुरुष कलशके ऊपर स्थापित करके उसकी पूजा करे। फिर वह सब कुछ एक धेनुके सहित आचार्यको दान कर दे। ब्रह्मन्! देवदेव महादेवके इस व्रतका चौदह वर्षोंतक पालन करके नाना प्रकारके भोग भोगनेके पश्चात् देहावसान होनेपर शिवलोकमें जाता है।
ब्रह्मन् ! आश्विन शुक्ला प्रतिप्रदाको 'अशोकव्रत' का पालन करके मनुष्य शोकरहित तथा धनधान्यसे सम्पन्न हो जाता है। उसमें नियमपूर्वक रहकर अशोक वृक्षकी पूजा करनी चाहिये। बारहवें वर्ष व्रतके अन्तमें अशोक वृक्षकी सुवर्णमयी मूर्ति बनाकर उसे भक्तिपूर्वक गुरुको समर्पित करनेपर मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रतिपदाको 'नवरात्रव्रत' आरम्भ करे। पूर्वाह्नकालमें कलशस्थापनपूर्वक देवीकी पूजा करे। गेहूँ और जौके बीजसे अंकुर आरोपण करके प्रतिदिन अपनी शक्तिके अनुसार उपवास, अयाचित अथवा एकभुक्त करके रहे और पूजा, पाठ, जप आदि करता रहे। ब्रह्मन्! मार्कण्डेयपुराणमें देवीके जो तीन चरित्र कहे गये हैं, उनका भोग
और मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाला पुरुष नौ  दिनोंतक पाठ करे। नवरात्रमें भोजन, वस्त्र आदिके द्वारा कुमारीपूजन उत्तम माना गया है। ब्रह्मन् ! इस प्रकार व्रतका आचरण करके मनुष्य इस पृथ्वीपर दुर्गाजीकी कृपासे सम्पूर्ण सिद्धियोंका आश्रय हो | जाता है। कार्तिक शुक्ला प्रतिपदाको नवरात्रमें बताये अनुसार नियमोंका पालन करे। विशेषतः अन्नकूट नामक कर्म भगवान् विष्णुको प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। उस दिन गोवर्धनपूजनके लिये सब तरहके पाक और सब गोरसोंका संग्रह करके सबको अन्नकूट करना चाहिये। इससे सब मनोरथोंकी सिद्धि होती है। सायंकालमें गौओंसहित श्रीगोवर्धन पर्वतका पूजन करके जो उसकी प्रदक्षिणा करता | है, वह भोग और मोक्ष पाता है। मार्गशीर्ष शुक्ला प्रतिपदाको परम उत्तम 'धनव्रत का पालन करना चाहिये। रातमें भगवान् | विष्णुका पूजन और होम करके अग्निदेवकी | सुवर्णमयी प्रतिमाको दो लाल वस्त्रोंसे आच्छादित | करके ब्राह्मणको दान दे। ऐसा करके मनुष्य इस पृथ्वीपर धन-धान्यसे सम्पत्र होता है। अग्निदेवके द्वारा उसके समस्त पाप दग्ध हो जाते हैं और वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पौष शुक्ला प्रतिपदाको भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी पूजा करके एकभुक्तव्रत करनेवाला मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है। माघ शुक्ला प्रतिपदाके दिन अग्निस्वरूप साक्षात् महेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य इस पृथ्वीपर समृद्धिशाली होता है। फाल्गुन शुक्ला । प्रतिपदाको धूलिधूसरित अङ्गोंवाले देवदेव दिगम्बर शिवको सब ओरसे जलद्वारा स्नान करावे। भगवान् महेश्वर इस लौकिक कर्मसे भी संतुष्ट होकर अपना सायुज्य प्रदान करते हैं। फिर भक्तिपूर्वक भलीभांति
पूजित होनेपर वे क्या नहीं दे सकते ! वैशाख शुक्ला  प्रतिपदाको विश्वव्यापक भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजा करके व्रती पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन करावे।
इसी प्रकार आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदाको जगगुरु ब्रह्मा एवं विष्णुका पूजन करके ब्राह्मण-भोजन करावे। ऐसा करनेसे विष्णुसहित सर्वलोकेश्वरेश्वर ब्रह्माजी अपना सायुज्य प्रदान करते हैं और वह सम्पूर्ण  सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है। द्विज श्रेष्ठ! बारह | महीनोंकी प्रतिपदा तिथियोंमें होनेवाले जो व्रत तुम्हें  बताये गये हैं, वे भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। इन सब व्रतोंमें ब्रह्मचर्य-पालनका विधान है। भोजनके लिये सामान्यत: हविष्यात्र  बताया गया है।  (नारद पुराण )    प्रतिपदा व्रत सपूर्ण 
                                                                                                                   राधे राधे 

Post a Comment

0 Comments