ब्रह्महत्या का पाप किसे लगेगा वैताल और विक्रमादित्य की कहानी : vikramaditya betal story in hindi

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वैताल ने कहा-राजन् विक्रमादित्य )  चूड़ापुरनामक एक रमणीय नगर में चूडामणि नामका एक राजा राज्य करता था। उसकी विशालाक्षी नामकी पतिव्रता पत्नी थी। रानी ने पुत्रकी कामना से भगवान् शंकर की आराधना की। उनकी कृपा से उसे कामदेव के समान एक सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ उसका नाम रखा गया हरिस्वामी। सभी सम्पत्तियों से सयुंक्त वह हरिस्वामी पृथ्वीपर देवता के समान सुख भोगने लगा। 

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देवल मुनि के शाप से एक देव अप्सरा  मनुष्य रूप में रूपलावण्यि का नामसे उत्पन्न होकर राजकुमार हरिस्वामी की पत्नी हुई। एक समय वह सुन्दरी अपने प्रासाद में आनन्द पूर्वक शय्यापर शयन कर रही थी। उस समय सुकल नामका एक गन्धर्व आया और उसने सोते  समय  उस रानीका अपहरण कर लिया। जब हरिस्वामी उठा, तब अपनी पत्नी को न देखकर उसे ढूँढ़ने लगा। उसके न मिलने पर वह व्याकुल हो गया और नगर छोड़कर वन में चला गया तथा सभी विषयों का परित्याग कर एकमात्र भगवान् श्रीहरि के ध्यानमें लीन हो गया और संन्यासी हो गया।

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एक दिन वह संन्यासी (राजा हरिस्वामी) भिक्षा मांगने के लिये एक ब्राह्मण के घर आया और ब्राह्मण ने प्रसत्रतापूर्वक खीर बनाकर उसको दी। खीर का पात्र लेकर वह वहाँसे स्नान करने चला आया। खीरका पात्र उसने वटवृक्षपर रख दिया और स्वयं नदी में स्नान करने लगा। उसी समय कहीं से एक सर्प आया और उसने उस खीर में अपने मुँह से विष उगल दिया। जब संन्यासी हरिस्वामी स्नान से आकर खीर खाने लगा तो विषके प्रभावसे वह बेहोश होने लगा 

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और उस ब्राह्मण के पास आकर कहने लगा-'अरे दुष्ट ब्राह्मण ! तुम्हारे द्वारा दिये गये विषमय खीर को खाकर अब मैं मर रहा है। इसलिये तुम्हें ब्रह्महत्याका पाप लगेगा।' यह कहकर वह संन्यासी मर गया और उसने अपनी तपस्या के प्रभावसे शिवलोक को प्राप्त किया।
वैताल ने राजा से पूछा-राजन् ( विक्रमादित्य )  इनमें ब्रह्महत्याका पाप किसको लगेगा? यह मुझे बताओ।

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राजाने कहा-नाग ने अज्ञानवश स्वभावतः उस खीर को विषमय कर दिया, अतः ब्रह्महत्याका पाप उस सर्प को  नहीं लगेगा 
संन्यासी भिक्षा मांगने ब्राह्मण के घर आया था, ब्राह्मणके लिये वह अतिथि देव-स्वरूप था। - अतः अतिथिधर्मका पालन करना उसके कुल-धर्मके अनुकूल ही था। उसने श्रद्धासे खीर बनाकर संन्यासी को निवेदित किया; ऐसे में वह कैसे ब्रह्महत्याका भागी बन सकता है ? 

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यदि वह विष मिलाकर अन्न देता, तभी ब्रह्महत्या उसे लगती, क्योंकि अतिथि का अपमान भी ब्रह्महत्या के समान ही है। अतः ब्राह्मण को ब्रह्महत्या नहीं लगेगी। शेष बच गया वह संन्यासी। चूँकि अपने किये गये शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है। 

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अतः वह संन्यासी अपने किसी पिछले जन्म कर्मवश काल की प्रेरणा से स्वतः ही मरा, उसकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से ही हुई। इसमें किसीका दोष नहीं। खीर का भोजन करना तो मरने में केवल कारण मात्र था। अतः उसे भी ब्रह्महत्या नहीं लगेगी। इस प्रकार इन तीनों में किसी को भी ब्रह्महत्या नहीं लगेगी।

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ब्रह्महत्या का पाप किसे लगेगा वैताल और विक्रमादित्य की कहानी : vikramaditya betal story in hindi ब्रह्महत्या का पाप किसे लगेगा वैताल और विक्रमादित्य की कहानी : vikramaditya betal story in hindi Reviewed by Sweet stories on November 17, 2019 Rating: 5

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