mahakaleshwar jyotirlinga कालों के काल महाकाल की katha hindi

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mahakaleshwar jyotirlinga कालों के काल महाकाल की  katha hindi
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा शिव पुराण में इस प्रकार बतायी गयी है
उज्जैन पुरी में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शुभकर्म परायण, वेदों के स्वाध्याय में संलग्न तथा वैदिक कर्मो के अनुष्ठान में सदा तत्पर रहनेवाले थे। वे घर में अग्नि की स्थापना करके प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और शिवकी पूजा में सदा तत्पर रहते थे। 

वे ब्राह्मण देवता प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा किया करते थे। वेदप्रिय नामक वे ब्राह्मण देवतायों की सेवा में लगे रहते थे; इसलिये उन्होंने सम्पूर्ण कर्मों का फल पाकर वह सद्गति प्राप्त कर ली, जो संतोंको ही सुलभ होती है। उनके शिवपूजा परायण चार तेजस्वी पुत्र थे, जो पिता-माता से सद्गुणों में कम नहीं थे। 

उनके नाम थे- देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और   सुव्रत। उनके सुखदायक गुण वहाँ सदा बढ़ने लगे। उनके कारण अवन्ति-नगरी ब्रह्मतेज से परिपूर्ण हो गयी थी। उसी समय रत्नमाल पर्वतपर दूषण नामक एक धर्मद्वेषी असुरने ब्रह्माजी से वर पाकर वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण किया। अन्तमें उसने सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन)-के ब्राह्मणों पर भी चढाई कर दी। 

उसकी आज्ञासे चार भयानक दैत्य चारों दिशाओंमें प्रलयाग्नि के समान प्रकट हो गये, परंतु वे शिवविश्वासी ब्राह्मण बन्धु उनसे डरे नहीं। जब नगरके ब्राह्मण बहुत घबरा गये, तब उन्होंने उनको आश्वासन देते हुए कहा-'आपलोग भक्तवत्सल भगवान् शंकरपर भरोसा रखें।' यों कह शिवलिंग का पूजन करके वे भगवान् शिवका ध्यान करने लगे। 

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 इतने में ही सेना सहित दूषण ने आकर -उन ब्राह्मणों को देखा और कहा-'इन्हें मार डालो, बाँध लो।' वेदप्रिय के पुत्र उन ब्राह्मणों ने उस समय उस दैत्यकी कही हुई - वह बात नहीं सुनी; क्योंकि वे भगवान् शम्भु के ध्यानमार्ग में स्थित थे। उस दुष्टात्मा दैत्य ने ज्यों ही उन ब्राह्मणों को मारनेकी " इच्छा की, त्यों ही उनके द्वारा पूजित पार्थिव शिवलिंग के स्थान में बड़ी भारी  आवाज के साथ एक गड्ढा प्रकट हो गया। 

उस गड्डेसे तत्काल विकट रूप धारी भगवान् शिव प्रकट हो गये, जो महाकाल नाम से विख्यात हुए। वे दुष्टों के विनाशक तथा सत्पुरुषोंके आश्रयदाता हैं। उन्होंने उन दैत्यों से कहा-'अरे खल! मैं तुझ-जैसे दुष्टों के लिये महाकाल प्रकट हआ हूँ । तुम ' इन ब्राह्मणों के निकट से दूर भाग जाओ।' ऐसा कहकर महाकाल शंकरने सेनासहित दूषण को अपने हुंकार मात्र से तत्काल भस्म कर दिया। 

कुछ सेना उनके द्वारा मारी गयी और कुछ भाग खड़ी हुई। परमात्मा शिवने दूषण का वध कर डाला। जैसे सूर्यको देखकर सम्पूर्ण अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् शिवको देखकर उसकी सारी सेना अदृश्य हो गयी। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उन ब्राह्मणों को आश्वासन दे सुप्रसन्न हुए स्वयं महाकाल महेश्वर शिवने उनसे कहा  "तुमलोग वर माँगो।' उनकी वह बात सुनकर वे सब ब्राह्मण हाथ जोड़ भक्तिभाव से भलीभाँति प्रणाम करके नतमस्तक हो बोले।


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महाकाल ! महादेव ! दुष्टों को दण्ड देनेवाले प्रभो ! शम्भो ! आप हमें संसार सागर से मोक्ष प्रदान करें। शिव ! आप जनसाधारण की रक्षा के लिये सदा यहीं रहें। प्रभो! शम्भो! अपना दर्शन करनेवाले मनुष्यों का आप सदा ही उद्धार करें। सूतजी कहते हैं-महर्षियो! उनके ऐसा कहनेपर उन्हें सद्गति दे भगवान् शिव अपने भक्तोंकी रक्षा के लिये उस परम सुन्दर गड्ढे में स्थित हो गये। 


वे ब्राह्मण मोक्ष पा गये और वहाँ चारों ओरकी एक-एक कोस भूमि लिंगरूपी भगवान् शिवका स्थल बन गयी। वे शिव भूतलपर महाकालेश्वर के नामसे विख्यात हुए। ब्राह्मणो! उनका दर्शन करने से स्वज में भी कोई दुःख नहीं होता। जिस-जिस कामना को लेकर कोई उस लिंग की उपासना करता है, उसे वह अपना मनोरथ प्राप्त हो जाता है तथा परलोक में मोक्ष भी मिल जाता है। 


mahakaleshwar jyotirlinga  की दूसरी कथा  



 प्राचीनकाल में उज्जयिनी में राजा चन्द्रसेन राज्य करते थे। वह परम शिव-भक्त थे। एक दिन श्रीकर नामक एक पाँच वर्ष का गोप-बालक अपनी माँ के साथ उधर से गुजर रहा था। राजा का शिवपूजन देखकर उसे बहुत विस्मय और कौतूहल हुआ।

 वह स्वयं उसी प्रकार की सामग्रियों से शिवपूजन करने के लिये लालायित हो उठा। सामग्री का साधन न जुट पानेपर लौटते समय उसने रास्ते से एक पत्थर का टुकड़ा उठा लिया। घर आकर उसी पत्थर को शिवरूप में स्थापित कर पुष्प, चन्दन आदि से परम श्रद्धापूर्वक उसकी पूजा करने लगा। माता भोजन करने के लिये बुलाने आयी, किन्तु वह पूजा छोड़कर उठनेके लिये किसी प्रकार भी तैयार नहीं हुआ। 

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अन्तमें माता ने झल्लाकर पत्थरका वह टुकड़ा उठाकर दूर फेंक दिया। इससे बहुत ही दुःखी होकर वह बालक जोर-जोर से भगवान् शिव को पुकारता हुआ रोने लगा। रोते-रोते अन्त में बेहोश होकर वह वहीं गिर पड़ा। बालक की अपने प्रति यह भक्ति और प्रेम देखकर आशुतोष भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न हो गये। बालक ने ज्यों ही होश में आकर अपने नेत्र खोले तो उसने देखा कि उसके सामने एक बहुत ही भव्य और अति विशाल स्वर्ण और रत्नोंसे बना हुआ मन्दिर खड़ा है। 

उस मन्दिर के भीतर एक बहुत ही प्रकाशपूर्ण, भास्वर, तेजस्वी ज्योतिर्लिङ्ग खड़ा है। बच्चा प्रसन्नता और आनन्द से विभोर होकर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगा। माता को जब यह समाचार मिला तब दौड़कर उसने अपने प्यारे लाल को गले से लगा लिया। पीछे राजा चन्द्रसेन ने भी वहाँ पहुँचकर उस बच्चे की भक्ति और सिद्धिकी बड़ी सराहना की। धीरे-धीरे वहाँ बड़ी भीड़ जुट गयी। 

इतने में उस स्थानपर हनुमान जी प्रकट हो गये। उन्होंने कहा-'मनुष्यो! भगवान् शंकर  शीघ्र फल देनेवाले देवताओं में सर्वप्रथम हैं। इस बालक की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हों ने इसे ऐसा फल प्रदान किया है, जो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि करोड़ों जन्मों की तपस्या से भी प्राप्त नहीं कर पाते। 

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इस गोप-बालक की आठवीं पीढ़ी में धर्मात्मा नन्दगोपका जन्म होगा। द्वापर युग में भगवान् विष्णु कृष्णावतार लेकर उनके वहाँ तरह-तरह की लीलाएँ करेंगे।' हनुमान जी इतना कहकर अन्तर्धान हो गये। उस स्थानपर नियम से भगवान् शिवकी आराधना करते हुए अन्त में श्रीकर गोप और राजा चन्द्रसेन शिवधाम को चले गये।

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mahakaleshwar jyotirlinga कालों के काल महाकाल की katha hindi mahakaleshwar jyotirlinga कालों के काल महाकाल की  katha hindi Reviewed by madhur bhakti on December 26, 2019 Rating: 5

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