श्री कृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पूर्व जन्म की कथा satyabhama story in hindi



satyabhama story in hindi

Story of Satyabhama's past life in Hindi

एक दिन सत्यभामा ने पूछा- श्री कृष्ण से   मैंने पूर्व जन्म में कौन-सा दान, तप अथवा व्रत किया था, 'जिससे मैं इस जन्म में   आपकी अर्धाङ्गिनी (पत्नी) हुई। भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-प्रिये ! एकाग्रचित्त होकर सुनो-तुम पूर्व जन्म में जो कुछ थीं और जिस पुण्यकारक व्रत का तुमने अनुष्ठान किया था, वह सब मैं बताता हूँ। 

सत्ययुग में मायापुरी (हरद्वार) के भीतर अत्रिकुल में उत्पत्र एक ब्राह्मण रहते थे, जो देवशर्मा नामसे प्रसिद्ध थे। वे वेद-वेदाङ्गों के पारंगत विद्वान्, अतिथि सेवी, अग्रिहोत्रपरायण और सूर्यव्रत के पालन में तत्पर रहने वाले थे। प्रतिदिन सूर्यकी आराधना करने के कारण वे साक्षात् दूसरे सूर्यकी भाँति तेजस्वी जान पड़ते थे। उनकी अवस्था अधिक हो चली थी। ब्राह्मण के कोई पुत्र नहीं था; केवल एक पुत्री थी, जिसका नाम गुणवती था। उन्होंने अपने चन्द्र नामक शिष्य के साथ उसका विवाह कर दिया। वे उस शिष्यको ही पुत्र की भाँति मानते थे और वह  शिष्य भी उन्हें पिता के ही तुल्य समझता था। एक दिन वे दोनों गुरु-शिष्य कुश और समिधा ( लकड़ियां )  लाने के लिये गये और   और हिमालय के शाखाभूत पर्वत के वन में इधर-उधर भ्रमण करने लगे; 

Story of Satyabhama's past life in Hindi

इतने में ही उन्होंने एक भयङ्कर राक्षस को अपनी ओर आते देखा। उनके सारे अंग भय  से काँपने लगे। वे भाग नहीं पाए और राक्षस ने उन दोनों को मार डाला। उस क्षेत्र के प्रभाव से तथा स्वयं धर्मात्मा होने के कारण उन दोनों को मेरे पार्षदों ने वैकुण्ठ धाम में पहुँचा दिया। उन्होंने जो जीवनभर सूर्यपूजन आदि किया था, उस कर्मसे मैं उनके ऊपर बहुत संतुष्ट था। सूर्य, शिव, गणेश, विष्णु तथा शक्ति के उपासक भी मुझे ही प्राप्त होते हैं। जैसे वर्षा का जल सब ओरसे समुद्र में ही जाता है, उसी प्रकार इन पाँचों के उपासक मेरे ही पास आते हैं। मैं एक ही हूँ, तथापि लीलाके अनुसार भिन्न-भिन्न नाम धारण करके पाँच रूपों में प्रकट हुआ हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे कोई  एक ही व्यक्ति पुत्र-पिता आदि भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। 

जब गुणवती ने जब राक्षस के हाथ से उन दोनों के मारे जाने का हाल सुना, तब वह पिता और पति के वियोग-दुःख से पीड़ित होकर करुण स्वर में विलाप करने लगी-'हा नाथ ! हा तात! आप दोनों मुझे अकेली छोड़कर कहाँ चले गये? मैं अनाथ बालिका आपके बिना अब क्या करूँगी। अब कौन घर में बैठी हुई मुझ कुशलहीन दुःखिनी स्त्रीका भोजन और वस्त्र आदिके द्वारा पालन करेगा। इस प्रकार वारंवार करुणाजनक विलाप  ( रोना ) करके वह बहुत देर के बाद चुप हुई। गुणवती शुभकर्म करनेवाली थी। उसने घरका सारा सामान बेंचकर अपनी शक्ति के अनुसार पिता और पति का पारलौकिक कर्म किया।


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उसके बाद वह उसी नगर में निवास करने लगी। शान्तभाव से सत्य-शौच आदि के पालन में तत्पर हो भगवान् विष्णु के भजन में समय बिताने लगी। उसने अपने जीवनभर दो व्रतोंका विधिपूर्वक पालन किया-एक तो एकादशीका उपवास और दूसरा कार्तिक मास का भलीभाँति सेवन । प्रिये ! ये दो व्रत मुझे बहुत ही प्रिय हैं। ये पुण्य उत्पत्र करनेवाले, पुत्र और सम्पत्तिके दाता तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। जो कार्तिक के महीने में सूर्य के तुला राशिपर रहते समय प्रातःकाल स्नान करते हैं, वे महापात की होनेपर भी मुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य कार्तिक में  स्नान , जागरण, दीपदान और तुलसीवनका पालन करते हैं, 

वे साक्षात् भगवान् विष्णु के स्वरूप हैं। जो लोग श्री विष्णु मन्दिर में झाड़ देते, स्वस्तिक आदि निवेदन करते और श्रीविष्णुको पूजा करते रहते हैं, वे जीवन्मुक्त हैं। जो कार्तिक में तीन दिन भी इस नियमका पालन करते हैं, वे देवताओंके लिये वन्दनीय हो जाते  फिर जिन लोगों ने जिंदगी भर इस कार्तिक व्रत का अनुष्ठान किया है, उनके लिये तो कहना ही क्या है। इस प्रकार गुणवती प्रतिवर्ष कार्तिकका व्रत किया करती थी। वह श्री विष्णु को मे नित्य-निरन्तर भक्तिपूर्वक मन लगाये रहती थी। एक समय, जब  जरावस्था से उसके सारे अंग दुर्बल हो गये थे और वह स्वयं भी ज्वरसे पीड़ित थी, किसी तरह धीरे-धीरे चलकर गङ्गा के तटपर स्नान करने के लिये गयी।

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ज्यों ही उसने जल के भीतर पैर रखा, त्यों ही वह शीत से पीड़ित हो काँपती हुई गिर पड़ी। उस घबराहट की दशा में ही उसने देखा, आकाश से विमान उतर रहा है, जो शङ्ख,चक्र, गदा और पद्य धारण करने वाले श्री विष्णुरूपधारी पार्षदों से सुशोभित है और उसमें गरुड़चिह्न से अङ्कित ध्वजा फहरा रही है। विमान के निकट आनेपर वह दिव्यरूप धारण करके उसपर बैठ गयी। उसके लिये चैवर (पखें) डुलाया जाने लगा। मेरे पार्षद उसे वैकुण्ठ ले चले। विमानपर बैठी हुई गुणवती प्रज्वलित अग्निशिखा के समान तेजस्विनी जान पड़ती थी, कार्तिक व्रत के पुण्य से उसे मेरे निकट स्थान मिला।

जब मैं ब्रह्मा आदि देवताओं की प्रार्थना से इस पृथ्वीपर आया, तब मेरे पार्षदगण भी मेरे साथ ही आये।  समस्त यादव मेरे पार्षदगण ही है। ये मेरे समान गुणों से शोभा पाने वाले और मेरे प्रियतम है। जो तुम्हारे पिता देवशर्मा थे, वे ही अब सत्राजित हुए हैं। शुभे! चन्द्रशर्मा ही अक्रूर हैं और तुम गुणवती हो। कार्तिक व्रत के पुण्य से तुमने मेरी प्रसत्रताको बहुत बढ़ाया है। पूर्वजन्म में तुमने मेरे मन्दिर के द्वारपर जो तुलसीकी वाटिका लगा रखी थी, इसी से तुम्हारे आँगन में कल्पवृक्ष शोभा पा रहा है।

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पर्वकाल में तुमने  जो कार्तिक में दीपदान किया था, उसी के प्रभाव से तुम्हारे घर में यह स्थिर लक्ष्मी प्राप्त हुई है जीवन भर जो तुमने  कार्तिक व्रत  का अनुष्ठान किया है, उसके प्रभाव से तुम्हारा मुझ से कभी भी वियोग नहीं होगा। तथा तुमने जो अपने व्रत आदि सब कर्मो को पतिस्वरूप श्री विष्णु की  सेवा में निवेदन किया था, इसीलिये तुम मेरी पत्नी हुई हो। 


श्री कृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पूर्व जन्म की कथा satyabhama story in hindi श्री कृष्ण की पत्नी  सत्यभामा के पूर्व जन्म की कथा satyabhama story in hindi Reviewed by madhur bhakti on December 13, 2019 Rating: 5

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