गंगा माता की कहानी संपूर्ण पापों को हरने वाली :The story of Ganga Mata defeating all sins


The story of Ganga Mata




The story of Ganga Mata spiritual story in Hindi



गंगा माता की कथा संपूर्ण कलेशों  का दमन करने वाली  सभी पापों को शांत करने वाली और गंगा माता की कथा तीर्थ स्नान का फल देने वाली है 
उनका नाम ही तो जीवों को तार देता है तो उनकी कथा  कितना पुण्य नहीं देगी  


श्री राधे 
एक बार की बात है नारद जी ने ब्रह्माजी से पूँछा पिता श्री गंगा माता का कैसे धरती पर आना हुआ तो 
ब्रह्माजी बोले-देवर्षे! वैवस्वत मनु के वंश में राजा इक्ष्वाकु के कुल में सगर नाम के एक अत्यन्त धार्मिक राजा हो गये हैं। वे यज्ञ करते, दान देते और सदा धार्मिक आचार-विचार से रहते थे। उनके दो पत्नियाँ थीं। वे दोनों ही पति भक्ति परायणा थीं, किंतु उनमें से किसी को भी संतान न हुई। 


इसलि ये राजा के मन में बड़ी चिन्ता थी। एक दिन उन्होंने महर्षि वसिष्ठ को अपने घर बुलाया और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके पूछा-'किस उपाय से मुझे संतान होगी?' उनकी यह बात सुनकर महर्षि वसिष्ठ ने कुछ समय तक ध्यान किया। उसके बाद राजा से कहा-'राजन्! तुम पत्नी सहित सदा ऋषि-महर्षियों का सेवन करते रहो।' यों कहकर महर्षि वसिष्ठ अपने आश्रम को चले गये। एक समय की बात है-राजर्षि सगर के घरपर एक तपस्वी महात्मा

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पधारे। राजा ने उन महर्षि का पूजन किया। इससे संतुष्ट होकर वे बोले-'महाभाग! वर माँगो।' यह सुनकर राजा ने पुत्र होने के लिये प्रार्थना की। मुनि बोले-'तुम्हारी एक पत्री के गर्भ से एक ही पुत्र होगा, किंतु वह वंशधर होगा; और दूसरी स्त्री के गर्भ से साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे।' वरदान देकर जब मुनि चले गये, तब उनके कथनानुसार यथासमय राजाके हजारों पुत्र हुए। राजा सगरने राजा सगर ने  फिर एक अश्वमेधयज्ञ के लिये उन्हों ने विधिपूर्वक दीक्षा ग्रहण कीऔर अश्व ( घोड़े )  की रक्षाके लिये सेनासहित 

अपने पुत्रों को नियुक्त किया। अश्व ( घोड़े ) पृथ्वीपर भ्रमण करने लगा। इसी बीच में कहीं अवसर पाकर इन्द्र ने उस अश्व ( घोड़े ) को हर लिया और रक्षकों को सौंप दिया। राजकुमार घोड़े को इधर-उधर ढूँढ ने लगे, परंतु कहीं भी वह उन्हें दिखायी न दिया। तब उन्होंने देवलोक में जाकर ढूँढ़ा, पर्वतों और सरोवरों में खोजा और कितने ही जंगल छान डाले; मगर कहीं भी उसका पता न लगा। इसी समय आकाशवाणी हुई-'सगर पुत्रो! तुम्हारा घोड़ा रसातल (धरती के नीचे)  में बंधा है और कहीं नहीं है।' यह सुनकर वे 

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रसातल में जाने के लिये सब ओर से पृथ्वी को खोदने लगे और  वे शीघ्र ही रसातल में जा पहुंचे। सगर के बलवान् पुत्रोंको वहाँ आया सुनकर रक्षक थर्रा उठे और उनके वध का उपाय करने लगे। वे बिना युद्ध किये ही भयभीत हो उस स्थानपर आये, जहाँ महामुनि कपिल सो रहे थे। कपिलजी का क्रोध बड़ा प्रचण्ड था। रक्षकों ने वह घोड़ा ले जाकर  तुरंत कपिल जी के सिरहाने की ओर बाँध दिया और स्वयं चुपचाप दूर खड़े होकर देखने लगे कि अब क्या होता है। इतने में ही सगरके पुत्र रसातल में घुसकर देखते हैं कि घोड़ा बँधा है और पास ही कोई पुरुष सो रहा है। 

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उन्होंने कपिलजी को ही घोड़ा  चुराकर यज्ञ में विघ्न डालनेवाला माना और यह निश्चय किया कि इस महापापीको मारकर हमलोग अपना घोड़ा महाराज के निकट ले चलें। कोई बोले-'अपना पशु बंधा है, इसे ही खोलकर ले चलें। इस सोये हुए पुरुषको मारने से क्या लाभा' यह सुनकर दूसरे बोल उठे-'हम शूरवीर राजा हैं, शासक हैं। इस पापीको उठायें और  इसका वध कर डालें।' फिर क्या था, 


वे मुनिको कटु वचन सुनाते हुए लातोंसे मारने लगे। इससे मुनिश्रेष्ठ कपिलको बड़ा क्रोध आया । उन्होंने सगरपुत्रों की ओर क्र्रोध  पूर्ण दृष्टि से देखा और भस्म कर डाला। वे सब-के-सब जलकर राख हो गये। नारद! जब   महाराज सगरको इन सब बातोंका पता न लगा। उस समय तुम ने ही जाकर सगर को यह सब समाचार सुनाया। इससे राजाको बड़ी चिन्ता हुई। अब क्या करना चाहिये, यह बात उनकी समझमें न आयी। राजा सगरके एक दूसरा पुत्र भी था, जिसका नाम असमञ्जा था। वह मूर्खतावश नगरके बालकोंको उठाकर पानीमें फेंक देता था।

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तब गांव ने एकत्रित होकर राजा सगरको इस बातकी सूचना दी। पुत्रका यह अन्याय जानकर महाराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने कहा-'यह असमञ्जा बालकोंकी हत्या करनेवाला तथा क्षत्रियधर्मका त्यागी है। अत: यह इस देशका त्याग कर दे। असमञ्जा वनमें चला गया। अब राजा सगर चिन्ता करने लगे कि 'हमारे सब पुत्र ब्राह्मणके शापसे रसातलमें नष्ट हो गये। एक बचा था, वह भी वनमें चला गया। इस समय मेरी क्या गति होगी?' | असमञ्जा के एक पुत्र था, 


जो अंशुमान् नाम से विख्यात हुआ। यद्यपि अंशुमान् अभी बालक था तो भी राजाने उसे बुलाकर अपना कार्य बतलाया। अंशुमान्ने भगवान् कपिल की आराधना की और घोड़ा ले आकर राजा सगरको दे दिया। इससे वह यज्ञ पूर्ण हुआ। अंशुमान के  तेजस्वी पुत्रका नाम दिलीप था। दिलीप के पुत्र परम बुद्धिमान् भगीरथ हुए। भगीरथ ने जब अपने समस्त पितामहोंकी दुर्गतिका हाल सुना, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने नृपश्रेष्ठ सगरसे विनयपूर्वक पूछा-'महाराज! उन सबका उद्धार कैसे होगा?' राजाने उत्तर दिया-'बेटा! यह तो भगवान् कपिल ही जानते हैं।' 

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यह सुनकर बालक भगीरथ रसातलमें गये और कपिलको नमस्कार करके अपना सब मनोरथ उन्हें कह सुनाया। कपिल मुनि बहुत देरतक ध्यान करके बोले-'राजन्! तुम तपस्याद्वारा भगवान् शंकर की आराधना करो और, उनकी जटा में स्थित गङ्गाके जलसे अपने पितरोंकी भस्मको आप्लावित ( स्न्नान ) करो। इससे तुम तो कृतार्थ होगे ही, तुम्हारे पितर भी कृतकृत्य हो जायेंगे।' यह सुनकर भगीरथने कहा-'बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। मुनिश्रेष्ठ! बताइये, मैं कहाँ जाऊँ और कौन-सा कार्य करूँ?' | 


कपिलजी बोले-नरश्रेष्ठ! कैलासपर्वतपर जाकर महादेवजीकी स्तुति करो और अपनी शक्तिके अनुसार तपस्या करते रहो। इससे तुम्हारे अभीष्टकी सिद्धि होगी।मुनिका यह वचन सुनकर भगीरथ ने उन्हें | प्रणाम किया और कैलासपर्वतकी यात्रा की। वहाँ पहुँचकर पवित्र हो बालक भगीरथने तपस्याका निश्चय किया और भगवान् शंकरको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा-'प्रभो! मैं बालक हूँ, मेरी बुद्धि भी बालक की ही है और आप भी अपने मस्तकपर बाल चन्द्रमाको धारण करते हैं। मैं कुछ भी नहीं जानता। 

The story of Ganga Mata 

आप मेरे इस अनजानपनसे ही प्रसन्न होइये। अमरेश्वर! जो लोग वाणीसे, मनसे और क्रियासे कभी मेरा उपकार करते हैं तथा हितसाधनमें संलग्न रहते हैं, उनका कल्याण करनेके लिये मैं उमासहित आपको प्रणाम करता हूँ। आप देवता आदिके लिये भी पूज्य हैं। जिन पूर्वजोंने मुझे अपने सगोत्र और समानधर्माक रूपमें उत्पन्न किया और पाल-पोसकर बड़ा बनाया, भगवान् शिव उनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करें। मैं बालचन्द्रका मुकुट धारण करनेवाले | भगवान् शंकरको नित्य प्रणाम करता हूँ।'

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 भगीरथ के यों कहते ही भगवान् शिव उनके सामने प्रकट हो गये और बोले-'महामते ! तुम   निर्भय होकर कोई वर माँगो। जो वस्तु देवताओं के | लिये भी सुलभ नहीं है, वह भी मैं तुम्हें निश्चय | ही दे दूंगा।' यह आश्वासन पाकर भगीरथने | महादेवजीको प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कहा-'देवेश्वर! आपकी जटामें जो सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा जी विराजमान हैं, उन्हें ही मेरे पितरोंका उद्धार करने के लिये दे दीजिये। इससे मुझे सब कुछ मिल जायगा।' तब महेश्वरने हँसकर कहा-'बेटा! मैंने तुम्हें गंगा  दे दी।


अब तुम उनकी स्तुति करो।' महादेवजीका वचन सुनकर भगीरथ ने गंगा माता जी की प्राप्ति के लिये भारी तपस्या की और मनको संयम में रखकर भक्तिपूर्वक गंगा का स्तवन किया। और गंगा जी की भी कृपा प्राप्त की। महादेवजी से प्राप्त हुई गंगा को पाकर उन्होंने उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर . कहा-'देवि! महामुनि कपिल के शाप से मेरे पितर दुर्गतिमें पड़े हुए हैं। माता! आप उनका | उद्धार करें।'देवनदी गंगा  सबका उपकार करनेवाली  हैं। वे स्मरणमात्रसे सब पापोंका नाश कर देती हैं। 

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उन्होंने भगीरथकी प्रार्थना सुनकर 'तथास्तु' कहा और लोकोंका उपकार एवं पितरोंका | उद्धार करनेके लिये भगीरथके कथनानुसार सब कार्य किया। राजा सगरके जो पुत्र भस्म होकर रसातलमें पड़े थे, उन्हें अपने जल से आप्लावित (स्न्नान) करके गंगा जीने उनके खोदे हुए गड्ढेको भर दिया। महामुने ! इस प्रकार तुम्हें  गंगा की कथा को  सुनाया। ये माहेश्वरी, वैष्णवी, ब्राह्मी, पावनी, भागीरथी, देवनदी तथा हिमगिरिशिखराश्रया (हिमालयकी चोटीपर रहनेवाली) आदि नामोंसे पुकारी जाती हैं।  जो सभी के मनोरथों को पूर्ण करती है 

                                                                                  राधे राधे 
गंगा माता की कहानी संपूर्ण पापों को हरने वाली :The story of Ganga Mata defeating all sins गंगा माता की कहानी संपूर्ण पापों को हरने वाली :The story of Ganga Mata defeating all sins Reviewed by madhur bhakti on December 11, 2019 Rating: 5

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