nageshwar jyotirlinga की कथा विस्तार से

nageshwar jyotirlinga story in hindi  

nageshwar jyotirlinga 

 nageshwar jyotirlinga की कहानी



आज आप सभी nageshwar jyotirlinga की कथा को सुनेंगे यह nageshwar jyotirlinga की महिमा विश्वभर में प्रसिद्ध है और इस jyotirlinga की कथा को पढ़ने से आप सभी की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होगी   तो जरूर पढ़े nageshwar jyotirlinga की कहानी 


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भगवान् शिवका यह प्रसिद्ध nageshwar jyotirlinga  गुजरात प्रान्त में द्वारकापुरी में  स्थित है। nageshwar jyotirlinga के बारे में पुराणों में यह कथा कही गई है-सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था। वह भगवान् शिवका अनन्य भक्त था। वह निरन्तर उनके आराधन, पूजन और ध्यान में लीन रहता था। अपने सारे कार्य वह भगवान् शिव को अर्पित करके करता था। मन, वचन, कर्म से वह पूर्णतः शिव में ही लीन रहता था। उसकी इस शिव भक्ति से दारुक नामक एक राक्षस बहुत क्रुद्ध रहता था।

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उसे भगवान् शिवकी यह पूजा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं लगती थी। वह निरन्तर इस बात का प्रयत्न किया करता था कि उस सुप्रिय की पूजा अर्चना में विघ्न पहुँचे। एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने यह उपयुक्त अवसर देखकर उस नौकापर आक्रमण कर दिया। उसने नौका में सवार. सभी यात्रियों को पकड़कर अपनी 
राजधानी में ले जाकर कैद कर दिया। 

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सुप्रिय कारागार में भी अपने नित्य नियम के अनुसार भगवान् शिवकी पूजा आराधना करने लगा। अन्य बन्दी लोगों को भी वह शिवभक्ति की प्रेरणा देने लगा। दारुक ने जब अपने सेवकों से सुप्रिय के विषय में यह समाचार सुना तब वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस कारागर में आ पहुँचा। सुप्रिय उस समय भगवान् शिव के चरणों में ध्यान लगाये हए दोनों आँखें बन्द किये बैठा था।

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उस राक्षस ने उसकी यह मुद्रा देखकर अत्यन्त भीषण स्वर में उसे डाँटते हुए कहा-'अरे दान वैश्य! तू आँखें बन्दकर इस समय यहाँ कौन-से उपद्रव और षड्यन्त्र करने की बातें सोच रहा है?' उसके यह कहनेपर भी धर्मात्मा शिवभक्त सुप्रिय वैश्य की समाधि भङ्ग नहीं हुई। अब तो वह दारुण नामक महाभयानक राक्षस क्रोध से एकदम बावला हो उठा। 

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उसने तत्काल अपने अनुचर राक्षसों को सुप्रिय वैश्य तथा अन्य सभी बन्दियों को मार डालनेका आदेश दे दिया। सुप्रिय उसके इस आदेश से जरा भी विचलित और भयभीत नहीं हुआ। वह एकनिष्ठ भाव और एकाग्र मनसे अपनी और अन्य बन्दियों की मुक्तिके लिये भगवान् शिवको पुकारने लगा। उसे यह पूर्ण विश्वास था कि मेरे आराध्य भगवान् शिवजी इस विपत्ति से मुझे अवश्य ही छुटकारा दिलायेंगे। 

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उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शंकर  जी तत्क्षण उस कारागार में एक ऊँचे स्थान में एक चमकते हुए सिंहासनपर स्थित होकर ज्योतिर्लिङ्ग के रूपमें प्रकट हो गये। उन्होंने इस प्रकार सुप्रिय को दर्शन देकर उसे अपना पाशुपत-अस्त्र भी प्रदान किया। उस अस्त्र से राक्षस दारुक तथा उसके सहायकों का वध करके सुप्रिय शिवधाम को चला गया। भगवान् शिव के आदेशानुसार ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा। 

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इस पवित्र nageshwar jyotirlinga के दर्शन की शास्त्रों में बड़ी महिमा बतायी गयी है। कहा गया है कि जो श्रद्धापूर्वक इसकी उत्पत्ति और माहात्म्यकी कथा सुनेगा वह सारे पापोंसे छुटकारा पाकर समस्त सुखोंका भोग करता हुआ अन्त में भगवान् शिवके परम पवित्र दिव्य धामको प्राप्त होगा। 
              nageshwar jyotirlinga की कथा संपूर्ण 

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nageshwar jyotirlinga की कथा विस्तार से nageshwar jyotirlinga की कथा विस्तार से Reviewed by madhur bhakti on January 03, 2020 Rating: 5

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